‘ओम नमो भगवते रुद्राय’ मंत्र
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः
ॐ : ओम
नमो: नमन करना
भगवते रुद्राय: भगवान रुद्र को
नमः: पुनः नमन
अर्थ: भगवान रुद्र को बारम्बार नमन या
‘अहंकार को भयभीत करने वाले’ भगवान को मेरा बारम्बार नमन।
‘ओम नमो भगवते रुद्राय‘ का जाप किस लिए?
भगवान शिव को समर्पित यह मंत्र ‘ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः‘ बहुत प्रभावी है क्योंकि यह साधक को भगवान शिव के प्रचंड, भयंकर रूप रुद्र का नमन कराता है। यह नमन कोई साधारण औपचारिकता नहीं है, बल्कि साधक के भीतर छुपे उस अहंकार के प्रति एक सीधा सामना है जो उसे सत्य से दूर रखता है।
रुद्र यह भगवान शिव का नाम है जो मूलतः वेदों से प्राप्त होता है। इसका अर्थ होता है कि जो भयभीत करने वाला हो या रुलाने वाला हो, वही रुद्र है। यह भय कोई बाहरी भय नहीं, बल्कि वह भय है जो अहंकार को उसके झूठ के उजागर होने से लगता है।
अगर आपको पता है कि आपके भीतर ऐसा क्या है जो भयभीत होता है, तो आप रुद्र का ही आवाहन करेंगे। इसलिए नहीं कि आप भयभीत हो जाएं, बल्कि इसलिए कि रुद्र के उस भय के माध्यम से आप आत्म-समर्पण को उपलब्ध हो। तभी उस भय का सच्चा निवारण संभव है, क्योंकि निर्भय कोई जन्म से ही पैदा नहीं होता निर्भय होना पड़ता है। और निर्भय बनने के लिए भीतर के उस अहंकार को टूटना ही होगा, क्योंकि वही आपके सभी भय का मूल कारण है।
देखिए, इंसान के भीतर वह डर होना चाहिए जो झूठ है, उसे सत्य के सामने खड़ा होकर देखना चाहिए। असत्य का सत्य से सामना होना चाहिए तभी यह मंत्र सिद्ध होता है।
जब तक अहंकार अपने ही निर्मित भ्रमों में सुरक्षित बैठा रहता है, तब तक कोई साधना गहराई तक नहीं पहुँच पाती। रुद्र का आह्वान वस्तुतः उस सुरक्षा-कवच को तोड़ने का आह्वान है, ताकि साधक उस सत्य के सामने खड़ा हो सके जो अहंकार को सबसे अधिक भयभीत करता है।
‘ओम नमो भगवते रुद्राय‘ जाप के जीवन में अतुलनीय लाभ क्या हैं?
साधना में उतरने पर जीवन को प्रभावित करने वाले वे लाभ होते हैं जो आपको योग के सिवा कहीं नहीं मिलेंगे। अगर आप जानते हैं कि ध्यान या योग का जीवन में क्यों महत्व है, तो आप अध्यात्म को जीवन में सबसे पहला स्थान देने से चूकेंगे नहीं।
माया के बंधनों से मुक्ति: माया मनुष्य जीव पर इस तरह से शासन करती है कि वह अपने जीवन को नर्क बनाने से भी पीछे नहीं हटता, क्योंकि मनुष्य पैदा होने के साथ ही अज्ञानी होता है। अगर आप खुद को नहीं जानते, यानि आत्म-बोध में स्थित नहीं हैं, तो आप माया के भ्रमों में पड़े हो सकते हैं, क्योंकि माया कैसे आप से ही उत्पन्न होती है, इस पर हम चर्चा कर चुके हैं।
माया के बंधनों से मुक्ति तभी होगी जब व्यक्ति असत्य अहंकार से हटकर सत्य, परम पवित्र आत्म-स्वरूप रुद्र की ओर बढ़ने लगेगा। यह यात्रा एक दिन में नहीं होती यह धीरे-धीरे, जाप के निरंतर अभ्यास से, भीतर की परतें एक-एक करके उतरती जाती हैं, और व्यक्ति उस भ्रम से बाहर आने लगता है।
योग में सिद्धि: यह भी तभी होगा जब व्यक्ति वियोग से योग की ओर बढ़ने लगेगा, क्योंकि सामान्य स्थिति में ज्यादातर लोग संसार के आकर्षण के कारण वियोग की ओर ही जाते हैं। ‘ओम नमो भगवते रुद्राय‘ का जाप करके योग में सिद्धि का अर्थ है कि आपका मन संसार की असमताओं से ऊपर उठने का अभ्यास कर रहा है। अन्यथा वह सुख और दुख, लाभ और हानि इन्हीं के बीच खिंचता रहता है।
समता से ही समाधि और समाधिस्थ अवस्था तक पहुँचा जाता है, और यही वैराग्य को विकसित करने में यह मंत्र-जाप सहायता करता है। जो साधक नियमित रूप से इस मंत्र का उच्चारण करता है, उसके भीतर धीरे-धीरे यह भाव जागृत होने लगता है कि संसार की घटनाएं आती-जाती रहती हैं, परन्तु स्वरूप अप्रभावित रहता है।
भय से मुक्ति: हमने आपको पहले भी समझाया कि भयभीत वही होता है जिसका अस्तित्व मिथ्या होता है। भगवान शिव सत्-स्वरूप हैं, और हृदय में उनके आवाहन से उस अहमभाव का निवारण होता है जो भय का कारण है।
जब साधक बार-बार रुद्र का स्मरण करता है, तो वह धीरे-धीरे यह पहचानने लगता है कि उसके भीतर जो डर बैठा है, वह वास्तव में अहंकार के मिथ्या अस्तित्व की रक्षा का ही एक रूप है। जैसे-जैसे यह पहचान गहरी होती जाती है, वैसे-वैसे भय की जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं, क्योंकि जिस चीज़ का आधार ही झूठ हो, वह सत्य के सामने टिक नहीं सकती।
‘ओम नमो भगवते रुद्राय‘ जाप का अन्य लाभ
- भीतरी स्वस्थता और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होगी। जीवन में शांति, संतुलन और आंतरिक सामंजस्य बढ़ेगा।
- जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के द्वार खुलेंगे। आत्म अवलोकन आत्मबोध और सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त होगी।
- शिव के परमानंद, चिदानंद स्वरूप और सत् स्वरूप का साक्षात्कार होगा। परम चैतन्य स्वरूप शिव शाश्वत सत्य का बोध होने लगेगा।
- आध्यात्मिक मुक्ति अर्थात् ब्रह्म-निर्वाण की उपलब्धि संभव होगी। अहमभाव के बंधनों से मुक्त होने की दिशा स्पष्ट होगी।
- मानव जीवन का सही उद्देश्य और वास्तविक सार्थकता समझ में आएगी। मन को नियंत्रण में रखने से जीवन के प्रति दृष्टिकोण अधिक जागरूक और विवेकपूर्ण बनेगा।
- शुद्ध बुद्धि और निर्मल मन की प्राप्ति होगी। विचारों में स्पष्टता तथा अंतःकरण में पवित्रता का विकास होगा।