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माया कैसे बनती है? क्या माया आपसे ही उत्पन्न होती है?

माया कैसे बनती है?
क्या माया आपसे ही उत्पन्न होती है?

माया का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। उसका अपना कोई अलग स्वरूप नहीं होता कि वह आपसे पृथक कहीं विद्यमान हो। वह आपके ही साथ जुड़ी हुई होती है। वह आपकी ही परछाई की तरह होती है।

जिस प्रकार परछाई का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार माया का भी अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

परछाई भी तभी बनती है, जब कोई देहधारी खड़ा होता है। यदि वहाँ कोई देह ही न हो, तो परछाई भी नहीं बनती। उसी प्रकार अहंकार के होने पर माया होती है। यदि अहंकार नहीं, तो माया भी नहीं।

माया का अर्थ क्या है?

माया का अर्थ ऐसा होता है कि ‘वह जो नहीं है।’ ‘नहीं है’ का अर्थ उसके लिए नहीं है, जो अपने अहंकार से ऊपर उठ चुका है। जो अपने वास्तविक स्वरूप को और मिथ्या के यथार्थ को जान चुका है, जो स्वयं को शरीर और मन तक सीमित नहीं मानता, उसके लिए माया का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। वह ज्ञानी है।

लेकिन माया उसके लिए है, जो देहाभिमानी है। जो स्वयं को केवल शरीर मानता है, जो अपने शरीर, मन, विचारों और अनुभवों को ही स्वरूप समझता है, उसके लिए माया ही सत्य प्रतीत होती है।

और देहाभिमानी के लिए केवल माया ही है; उसी का प्रभाव है, उसी का अनुभव है और उसी को वह सत्य मानकर जीवन जीता है। उसके लिए माया ही सत्य है।

माया कब प्रकट होती है?

माया तब प्रकट होती है, जब व्यक्ति अपनी इंद्रियों के सामने उपस्थित संसार को ही सत्य मान लेता है। जो कुछ आँखों से दिखाई देता है, जो कानों से सुनाई देता है, जो स्पर्श, रस और गंध के रूप में अनुभव होता है, वही यदि उसे सम्पूर्ण सत्य प्रतीत होने लगे, तो वहीं से माया का आरम्भ हो जाता है।

उसका शरीर, उसके अनुभव और उसके समस्त इंद्रिय-विषय—ये सभी इंद्रियों के विषय हैं। किन्तु व्यक्ति इन्हीं को स्वरूप मान लेता है। वह शरीर को ही ‘मैं’ कहने लगता है और मन में उठने वाले विचारों तथा भावनाओं को भी स्वरूप समझ बैठता है।

लेकिन आत्मा इंद्रियों के आगे नहीं होती; वह इंद्रियों के पीछे होती है। आत्मा न तो आँखों से दिखाई देती है, न कानों से सुनी जा सकती है और न ही किसी अन्य इंद्रिय का विषय बन सकती है। आत्मा इंद्रियों का अविषय है और मन का भी अविषय है। इसलिए जो इंद्रियों से ज्ञात हो जाए, वह आत्मा नहीं हो सकती।

आत्म-अज्ञान और माया का संबंध क्या है?

जो अनात्मा है, उसे अनात्मा जानना ही आत्म-बोध है। अर्थात जो वास्तव में आत्मा नहीं है, उसे अनात्मा  जानना । जब यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीर, मन, विचार और अनुभव आत्मा नहीं हैं।

लेकिन आत्म-अज्ञान के कारण व्यक्ति भौतिक शरीर और मन को ही आत्मा बनाने लगता है। वह अपने वास्तविक स्वरूप को न जान पाने के कारण उसी से अपनी पहचान बना लेता है, जो वास्तव में उसका स्वरूप नहीं है। यही भूल आगे चलकर उसके सम्पूर्ण जीवन का आधार बन जाती है।

इसी आत्म-अज्ञान के कारण वह संसार में विचरण करता है। उसके सभी कर्म, इच्छाएँ, भय, मोह और संघर्ष उसी भ्रांति से उत्पन्न होते हैं। इसी कारण उसका माया के जाल में प्रवेश हो जाता है। यह प्रवेश बाहर से नहीं कराया जाता, बल्कि स्वयं ही उसमें प्रवेश करता है।

माया व्यक्ति को कैसे भ्रमित करती है?

माया भ्रांति है। उसका कार्य ही भ्रम उत्पन्न करना है। वह व्यक्ति को इस प्रकार भ्रमित करती है कि व्यक्ति आजीवन खोजता रहता है।

उसका सम्पूर्ण जीवन किसी न किसी खोज में व्यतीत होता रहता है। उसे ऐसा लगता है कि जिसे वह ढूँढ़ रहा है, वह कहीं बाहर है और उसे प्राप्त करने पर ही पूर्णता मिलेगी।

किन्तु वह किसे खोजता है? वास्तव में वह स्वयं को ही खोजता है। उसकी प्रत्येक खोज, प्रत्येक इच्छा और प्रत्येक प्रयास के मूल में स्वयं को पाने की ही आकांक्षा होती है।

माया उसे स्वयं से ही दूर कर देती है। जब तक व्यक्ति स्वयं को शरीर और मन मानता रहता है, तब तक वह अपने स्वरूप से दूर बना रहता है। यही दूरी उसे निरन्तर खोज में लगाए रखती है।

आत्म-अज्ञान व्यक्ति को कैसे भटकाता है?

आत्म-अज्ञान का अर्थ ही है कि व्यक्ति स्वयं से दूर हो गया। उसने अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया तब वह स्वयं को पाने के लिए ही संसार में भटकता है। उसे लगता है कि सुख और आनंद किसी वस्तु में है, किसी व्यक्ति में है, किसी उपलब्धि में है, किसी पद में है या किसी परिस्थिति में है। वह निरन्तर बाहर खोजता रहता है।

यही वह स्थिति है, जब माया अपने को आपके सामने प्रकट कर देती है। वह किसी बाहरी शक्ति के रूप में नहीं आती, बल्कि आपकी दृष्टि की भ्रांति के रूप में प्रकट होती है। वह बनी भी इसलिए है, क्योंकि आप स्वयं को पाना चाहते हैं। अपने से दूर हैं, तभी तो अपने को पाना चाहते हैं। यदि स्वयं से दूरी न होती, तो खोज की भी आवश्यकता न होती।

अपने को पाने का अर्थ क्या है? अपने को पाने का अर्थ यह नहीं कि आप केवल आध्यात्मिक मुक्ति के लिए ही साधना करेंगे। ऐसा आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को पाने की खोज को आध्यात्मिक साधना के रूप में ही करे।

अपने को पाने के लिए अज्ञानी कुछ भी कर सकता है। उसकी खोज का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किन्तु मूल में वही अधूरापन है। वह पैसे भी कमा सकता है इसे भरने के लिए। उसे लग सकता है कि धन प्राप्त हो जाने पर उसे वह मिल जाएगा जिसकी उसे तलाश है। या वह किसी से झगड़ा भी कर सकता है। किन्तु इन सभी प्रयासों के पीछे भी वही मूल खोज कार्य कर रही होती है। स्वयं को पाने की खोज, पूर्णता को खोज।

जब तक अज्ञान का नाश नहीं होता, तब तक यह खोज संसार की विभिन्न दिशाओं में चलती रहती है।

लेकिन माया का प्रभाव तभी समाप्त हो जाता है, जब सांसारिक अहंकार ही समाप्त हो जाता है।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.

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