योग में ‘समाधि’ किस अवस्था को कहते हैं?
बुद्धि के सम हो जाने को समाधि कहते हैं, ‘सम’ कर ‘बुद्धि’ । सुख दुख मान अपमान लाभ हानि इत्यादि जितने स्थितियों में भेद है, जो जीवन की असमानताएं हैं, जिनके बीच में व्यक्ति खींचा जाता है। इन समस्त असमानताओ से समता को प्राप्त होना यानि कि समाधि को प्राप्त होना।
समाधि का अर्थ केवल किसी एक अवस्था में बैठ जाना या बाहरी रूप से स्थिर हो जाना नहीं है, बल्कि यह भीतर की चेतना का वह संतुलन है जहाँ व्यक्ति हर प्रकार के द्वंद्व से ऊपर उठ जाता है।
जहाँ मन किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, चाहे वह सुख हो या दुख, लाभ हो या हानि, सम्मान हो या अपमान। इन सभी विरोधी अनुभवों के बीच जो समभाव स्थापित होता है, वही वास्तविक समाधि है। यह अवस्था व्यक्ति को भीतर से स्थिर, शांत और एकरस बना देती है, जहाँ कोई आंतरिक संघर्ष शेष नहीं रहता।
इसे श्री कृष्ण भगवत गीता के दूसरे अध्याय सांख्ययोग में ऐसा कहा है कि “सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥” अर्थात “अर्जुन तुम जय और पराजय में समभाव हो क्योंकि समभाव ही योग हैं।
यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं है, बल्कि भगवत गीता से जीवन जीने की सीख है। यहाँ स्पष्ट किया गया है कि सफलता और असफलता दोनों ही स्थितियाँ बाहरी घटनाएँ हैं, लेकिन योग या समाधि का संबंध इन घटनाओं के प्रति हमारे आंतरिक दृष्टिकोण से है।
जब व्यक्ति सिद्धि और असिद्धि दोनों में समान भाव रखता है, तब वह वास्तव में योग में स्थित होता है। यही समत्व धीरे-धीरे मन को स्थिर करता है और अंततः समाधि की ओर ले जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति किसी भी परिणाम से बंधा नहीं रहता।
अगर मैं या कोई समाधिस्थ है तो कैसा हैं?
अगर आप समाधि में स्थित हैं यानी आप जागरूकता वह रूप हैं; जो परम और पवित्र हैं, जो शुद्धतम हैं, आपकी सारी भीतरी अशुद्धियां आत्मज्ञान रूपी अग्नि ने भस्म कर दी हैं।
समाधि में स्थित व्यक्ति की चेतना साधारण मानसिक अवस्था से ऊपर उठ जाती है। वहाँ व्यक्ति केवल सोचने वाला मन नहीं रहता, बल्कि स्वयं जागरूकता का अनुभव बन जाता है।
इस अवस्था में भीतर की अशुद्धियाँ, जैसे अज्ञान, भ्रम, आसक्ति और अहंकार, धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। यह सब ज्ञान की अग्नि में जलकर समाप्त हो जाता है, और शुद्ध चेतना शेष रह जाती है। यह शुद्धता केवल विचारों की नहीं होती, बल्कि अस्तित्व की गहराई में होती है।
इसही बात को दूसरे शब्दों में ऐसा कहेंगे कि जोभी अज्ञान और अंधविश्वास आपने अपने भीतर बसा रखे थे साफ हो गए हैं, जिससे परम ज्ञान का साक्षात्कार हुआ हैं,
समाधिस्थ व्यक्ति को क्या बोध होता हैं?
जब व्यक्ति इस अवस्था में पहुँचता है, तो उसके भीतर जमा हुआ अज्ञान स्वतः समाप्त होने लगता है। जो धारणाएँ केवल भ्रम या परंपरा पर आधारित होती हैं, वे टिक नहीं पातीं।
मन की धुंध छँट जाती है और वास्तविकता स्पष्ट दिखाई देने लगती है। यही वह क्षण है जहाँ व्यक्ति केवल विश्वासों पर नहीं जीता, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य से असत्य मिथ्या पहचानने लगता है।
जो समाधिस्थ है; उसे स्वयं की प्रकृति का बोध है वो भ्रम से परे स्थापित हो गया हैं, उसने स्वयं को इतना जान लिया कि उसने इस रहस्य को पकड़ लिया कि वास्तव में वह अहंकार से मोहित होकर स्वयं को शरीर का अंतिम स्वामी मानता था, परन्तु वह स्वामी देहाभिमानी नहीं है, बल्कि त्रिगुणामयि प्रकृति हैं।
समाधिस्थ व्यक्ति अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान लेता है। वह यह समझ जाता है कि जो “मैं” वह पहले मान रहा था, वह केवल शरीर और मन तक सीमित एक पहचान थी। यह पहचान अहंकार से निर्मित थी।
लेकिन जब यह भ्रम टूटता है, तो व्यक्ति को अनुभव होता है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर से परे है। वह प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम से प्रभावित होते हुए भी उनसे पृथक साक्षी चैतन्य है। यह समझ उसे भीतर से अत्यंत स्थिर कर देती है।
उसने उस उधार से शरीर से तादात्म्य त्याग दिया हैं, आध्यात्मिक मुक्ति को उपलब्ध हुआ हैं। देहि के दुखों से निकल कर परमानंद को उपलब्ध हुआ हैं।
जब व्यक्ति शरीर को “मैं” मानने का तादात्म्य छोड़ देता है, तब उसके भीतर एक गहरी मुक्ति का अनुभव होता है। अब वह शरीर के सुख-दुख को अपने वास्तविक स्वरूप पर आरोपित नहीं करता।
शरीर की पीड़ा होती है, पर वह स्वयं को पीड़ित नहीं मानता। यही स्थिति उसे आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाती है। धीरे-धीरे वह उन बंधनों से मुक्त हो जाता है जो उसे संसार से जोड़कर रखते हैं, और स्थायी आनंद शांति प्राप्त होने लगता है ।
सामान्य व्यक्ति जो साधारणतः माया से भ्रमित होता हैं उसे बोध नहीं होता कि जिस भ्रम में वो जी रहा है और सांसारिक दुखों को भोग रहा हैं, वो दुखदाई संसार उसके ही गुणों द्वारा बना हैं।
सामान्य अवस्था में व्यक्ति बाहरी संसार को ही वास्तविक मानता है और उसी में सुख की खोज करता है। वह यह नहीं समझ पाता कि जिस संसार को वह बाहरी रूप में देख रहा है, उसका अनुभव वास्तव में उसके अपने मन और गुणों के माध्यम से निर्मित हो रहा है।
इसलिए जब तक दृष्टि भीतर की ओर नहीं मुड़ती, तब तक यह भ्रम बना रहता है कि दुख और सुख बाहर से आते हैं।
देहधारी इस इंद्रियों से बने संसार से मुक्त भी तभी हो सकता है जब वो ध्यानस्थ हो जाएं अर्थात समाधि में स्थापित हो जाएं इसे हमने अन्य लेख में बताया है कि ध्यान आपके जीवन जीने के लिए कितना महत्वपूर्ण हैं?
इस दृष्टि से देखा जाए तो मुक्ति का मार्ग केवल बाहरी परिवर्तन से नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण से ही संभव है। जब व्यक्ति ध्यान में स्थित होता है, तब उसका मन धीरे-धीरे शांत होकर अपनी वास्तविक अवस्था को पहचानने लगता है।
यही स्थिति आगे चलकर समाधि में स्थापित होने का आधार बनती है, जहाँ व्यक्ति इंद्रियों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है और अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।