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अहंकार क्या होता है, इसे कैसे जाने और त्यागे?

अहंकार क्या होता है?

यह मूल रूप से संस्कृत भाषा का शब्द है जो ‘अहम’ और ‘कार’ से बना है, अहम और कार यानी निर्माण करना। जब व्यक्ति अपने अहम का निर्माण करता है तब उसे अहंकार कहते हैं।

संसार को जानने वाला और शरीर को अनुभव करने वाला अपनी एक विशेष पहचान बनाता है, जिसका आधार मान्यता होती है, केवल मान्यता। लेकिन व्यक्ति उसे मान्यता की तरह भी नहीं जानता, वह इसे ज्ञान का रूप समझ बैठता है।

यही मूल भूल है कि जो केवल एक धारणा है, एक विश्वास है, उसे वास्तविकता मान लिया जाता है। और एक बार जब मान्यता को ज्ञान समझ लिया जाता है तो फिर उस पर प्रश्न उठाना भी असंभव सा हो जाता है, क्योंकि व्यक्ति को लगता है कि वह जो जानता है वही यथार्थ है, उसमें संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं।

इसी कारण अहंकार इतना दृढ़ और स्थायी प्रतीत होता है, जबकि वास्तव में वह मान्यताओं की एक शृंखला मात्र है जिसे समय के साथ शरीर और मन ने इंद्रियों के अनुभवों से गढ़ा है।

इस अहंकार को कैसे पहचाना जाए?

अहंकार चित्त वृत्तियों के आधार पर बनने वाली पहचान होती है। महर्षि पतंजलि का योगदर्शन जो योग चित्तवृत्ति-निरोध का सूत्र देता है, उसमें अहं-वृत्ति का निरोध भी सम्मिलित है, क्योंकि यहीं से आगे चलकर अहंकार उत्पन्न होता है। वृत्तियों का यह निरोध इसीलिए आवश्यक बताया गया है क्योंकि जब तक वृत्तियाँ शांत नहीं होतीं, तब तक अहंकार की जड़ें भी नहीं कट सकतीं। वृत्ति ही वह बीज है जिससे अहंकार का वृक्ष पनपता है।

जब आप संसार को देखते हैं, अपनी इंद्रियों से अनुभव करते हैं, तब भीतर एक वृत्ति उठती है कि जो मुझे अनुभव हो रहा है वही मैं हूं। और अहंकार केवल इतने में ही सीमित नहीं रहता, वह आगे भी बढ़ता चला जाता है।

यह आत्म-अज्ञानी के इंद्रियों से संसार को जानकर और उसे समझने के बाद बनता है। जैसे एक उदाहरण है कि अगर कोई किसी समुदाय का अनुयायी है और कोई उस समुदाय के बारे में कुछ ऐसा बोलता है जो उसे ठीक नहीं लगता, तो वह इसे अपना अपमान मान लेता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि समुदाय के विषय में कही गई बात का उस व्यक्ति के अपने अस्तित्व से कोई सीधा संबंध नहीं, फिर भी वह इसे अपने ऊपर आरोपित कर लेता है, क्योंकि उसने अपनी पहचान को उस समुदाय से जोड़ लिया है।

यही जुड़ाव अहंकार का स्वभाव है, वह जिस किसी बाहरी से स्वयं को बाँध लेता है, उस पर हुए किसी भी आघात को अपने ऊपर हुआ आघात मान बैठता है।

यानी पहले आत्म-अज्ञान, उससे फिर भौतिक संसार को जानकर बनाई गई पहचान अर्थात अहंकार, और फिर भावना यानी इससे भ्रमित होने के कारण भीतर उत्पन्न होने वाली पीड़ा। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, जो अज्ञान से आरंभ होकर पीड़ा तक पहुँचती है, और यह चक्र निरंतर चलता रहता है जब तक कि मूल अज्ञान को न पहचाना जाए।

अहंकार का स्वरूप हमेशा एक जैसा भी नहीं रहता, वह बदलता रहता है, दिन भर में पचासों बार बनता है, पचासों चीजों से जुड़ता है। कभी वह शरीर से जुड़ जाता है, कभी विचारों से, कभी संबंधों से, कभी उपलब्धियों से, तो कभी किसी वस्तु के स्वामित्व से।

लेकिन सबसे मूल में यही समझ होती है कि इंद्रियों से जो ज्ञान हो रहा है संसार का, वही वास्तविक है, और इस संसार में मैं एक शरीर के नाते हूं। यह मूल मान्यता ही अहंकार की समस्त शाखाओं का आधार है, चाहे वह किसी भी रूप में प्रकट हो।

अहंकार ऐसा होता है कि इससे मोहित हुआ व्यक्ति अपने विचारों के आधार पर जीवन व्यतीत करता है, क्योंकि उसकी पहचान उसके मस्तिष्क में उत्पन्न हुई होती है। वह अपने ही विचारों को सत्य मानकर उन्हीं के अनुसार निर्णय लेता है, उन्हीं के अनुसार सुख-दुख का अनुभव करता है, और यह भूल जाता है कि यह पहचान स्वयं उसी के मन की उपज है, कोई शाश्वत सत्य नहीं।

वेदांत में इस अहंकार को मिथ्या कहा गया है, लेकिन साधारण व्यक्ति इसे सत्य मानता है क्योंकि अहंकार का आधार बाहरी संसार होता है, और बाहरी संसार इंद्रियों के माध्यम से इतना प्रत्यक्ष और ठोस प्रतीत होता है कि उस पर संदेह करना असंभव सा लगता है।

जो ज्ञानी होता है वह जानता है कि अहंकार वास्तव में आत्म-ज्ञान के अभाव कारण ही बुद्धि पर छा रहा है, यह कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं बल्कि अज्ञान की ही एक छाया है जो बुद्धि पर पड़ती है और उसे आवृत्त कर देती है।

अहंकार संसार का अनुभवकर्ता होने के नाते स्वयं ही संसार से आसक्त होता है, और इसी जुड़ाव के कारण भीतर विकार उत्पन्न होते हैं। सबसे पहले तो खोज शुरू होती है पूर्णता की, क्योंकि अहंकार से मोहित व्यक्ति हमेशा अधूरा होता है। यह अधूरापन उसके स्वभाव में इतना गहरा बैठा होता है कि वह जीवन भर किसी न किसी रूप में उसे भरने का प्रयास करता रहता है। लेकिन अज्ञानी होने के कारण वह खोज संसार की ओर ही बढ़ती है और वहीं तक सीमित रह जाती है।

ऐसे आत्मज्ञान के अभाव से जो माया सामने आती है, उसे जीवन कहते हैं। यह माया भी अपने ही अज्ञान से ही भासती है।

बुद्ध जब कहते हैं कि जीवन दुख है, तब वे इसी अहंकारी के जीवन की बात करते हैं, उस जीवन की जो निरंतर अधूरेपन से उपजी खोज में उलझा रहता है और कभी भी सच्ची तृप्ति नहीं पाता।

क्या मैं अहंकार को त्याग सकता हूं?

अहंकार को आप त्याग सकते हैं, लेकिन एक बात ध्यान में रखिए, अहंकार को त्यागना किसी भौतिक वस्तु के त्यागने के समान नहीं होता, जैसे आप स्नान करने जाते हैं और वस्त्रों को त्याग देते हैं। अहंकार कोई वस्त्र नहीं होता जिसे उतार कर एक ओर रख दिया जाए। यह उससे कहीं अधिक सूक्ष्म और गहरा विषय है। अहंकार एक भ्रम के जैसा होता है,

ऐसा हों के कारण इसे त्यागने के लिए केवल इसे जानना होता है, बस इतने से ही आप पाते हैं कि अहंकार वास्तव में क्या है, या क्या था।

इसके लिए आत्म-अवलोकन चाहिए होता है। जिस प्रकार अंधकार को हटाने के लिए उसे बलपूर्वक निकालने की आवश्यकता नहीं होती, केवल प्रकाश ला देने से ही अंधकार स्वतः मिट जाता है, उसी प्रकार अहंकार को भी जबरन त्यागने का प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल यथावत जान लेना, उसका सूक्ष्म निरीक्षण कर लेना ही पर्याप्त है।

जब यह ज्ञान हो जाता है कि जिसे मैं अपनी पहचान समझ रहा था वह वास्तव में मान्यताओं और वृत्तियों का एक जाल मात्र है, तब वह अपने आप शिथिल पड़ने लगता है। यह ज्ञान कोई एक क्षण की घटना नहीं बल्कि निरंतर आत्म-अवलोकन का परिणाम है, जिसमें बार-बार यह देखना होता है कि किस क्षण, किस अनुभव पर, किस विचार पर अहंकार अपनी पकड़ बना रहा है, और यह पहचानना होता है कि यह पकड़ मान्यता के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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