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पूर्ण समर्पण के लिए क्या तुम तैयार हों?

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पूर्ण समर्पण क्या है?

पूर्ण समर्पण का अर्थ केवल बाहरी क्रिया नहीं है। यह केवल कुछ छोड़ देने या किसी के प्रति भक्ति दिखाने का नाम नहीं है।

पूर्ण समर्पण का अर्थ है – अपने अहंकार, अपने स्वयं के स्वार्थ और अपने आत्मिक संकल्प को पूरी तरह त्याग देना, ताकि आप उस परम सत्य, उस ईश्वर या उस उच्चतम चेतना के प्रति अपने भीतर से समर्पित हो सकें।

जब तक आप अपने अहं को त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं, तब तक आपका मुक्त होना असंभव है। सोचिए – आप अपने हाथ में एक केकड़ा पकड़े हैं और वह लगातार आपके हाथ को काट रहा है। अब सवाल यह है कि आप क्या करेंगे? क्या आप उसे और पकड़ेंगे, या उसके काटने से पीड़ित होते रहेंगे? यदि आप वास्तव में मुक्ति चाहते हैं, तो आपको उसे छोड़ देना होगा। उसे जाने देना होगा। आप क्यों उसे पकड़कर रखें, जबकि वह स्वाभाविक रूप से आपको चोट पहुँचाता है? वह अपना मार्ग स्वयं खोज लेगा नदी, तालाब या पानी की ओर चलेगा, जहाँ उसका होना आवश्यक है।

लेकिन समस्या यह है कि अक्सर हम केकड़ा छोड़ना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि वह हमारे हाथ को काटे भी नहीं, और फिर भी हम उसे छोड़ना भी नहीं चाहते। यह संभव नहीं है। केकड़ा है, उसका स्वभाव यही है कि वह काटेगा। यही स्थिति जीवन में भी है। हम चाहते हैं कि प्रिय वस्तुएँ हमारे पास हमेशा बनी रहें, हमें सुख दें, और दुख कभी न पहुँचाएँ। यह असंभव है।

जब हम कहते हैं “पूर्ण समर्पण”, तो इसका अर्थ यह है कि आप अपने सभी प्रिय और अप्रिय वस्तुओं, सुख-दुख और अहंकार को ईश्वर के प्रति पूरी तरह सौंप दें। अप्रिय वस्तुओं को छोड़ना सहज है – किसी चीज़ से पीड़ा हो रही हो, उसका त्याग करना आसान है। लेकिन जो प्रिय है, जिसे हम अपने जीवन का हिस्सा मानते हैं, उसका त्याग करना कठिन होता है। यही चुनौती है।

इस संसार की सारी वस्तुएँ – शरीर, परिवार, संबंध, संपत्ति – हमें प्रिय हैं। हम इनसे सुख प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन यदि आप ध्यान से देखो, तो वही वस्तुएँ अपने भीतर ही दुख को समेटे हुए हैं। सुख केवल आभास है, वास्तविकता में वे क्षणिक हैं और अनिश्चित। जब तक आपको यह बोध नहीं होगा कि जिन्हें आपने पकड़ रखा है, उनमें सुख नहीं है बल्कि दुख ही छुपा है, तब तक तुम उनके पीछे भागते रहोगे। दुख को तुम पकड़ने की कोशिश कर रहे हो, जबकि दुख तो बस आपसे दूर होना चाहता है।

पूर्ण समर्पण का अर्थ है – भगवान या सत्य के लिए स्वयं को समर्पित करना, अपने स्वार्थ, लालसा और वस्तुओं से ऊपर उठना। इसका अर्थ यह भी है कि तुम्हारे जीवन में भगवत्ता या आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख स्थान हो। तुम्हारे जीवन में जो सौ चीज़ें हैं, उन सब पर तुम्हारा नियंत्रण और अधिकार केवल आभास है। सबसे पहले तुम्हें अपने शरीर पर अहंकार त्यागना होगा। फिर धीरे-धीरे संसार की वस्तुओं से दूरी बनानी होगी।

तुम चाहते हो बंधन भी और मुक्ति भी। परंतु बंधन में रहकर मुक्ति प्राप्त नहीं होती। यदि तुम्हें मुक्ति चाहिए, तो उन सौ चीज़ों से थोड़ा ऊपर उठना होगा, उनके प्रति अपने आत्म-संलग्नता को घटाना होगा। मुक्ति किसी एक वस्तु, किसी संबंध या किसी अनुभव में नहीं है; यह उन सभी से परे जाकर, आत्मा की वास्तविकता में समर्पण करने से मिलती है।

तुम्हारे हाथ में जो कुछ भी है, क्या वह सच में तुम्हारा है? क्या तुम बिना किसी सहायता के, बिना इस संसार की वस्तुओं के, जीवित रह सकते हो? तुम्हारे शरीर का निर्माण तुम्हारे द्वारा हुआ है या यह प्रकृति का उपहार है? तुम किसकी वस्तुओं को अपना मानकर घूम रहे हो? वह, जिसका तुमने अधिकार जमाया है, एक दिन वह तुमसे छीन भी सकता है। यदि वह अभी तुम्हारे सामने आए और कहे – “यह मेरी वस्तुएँ वापस दो”, क्या तुम देने के लिए तैयार हो?

अधिकांश लोग डरते हैं। डर भी उनका अपना नहीं होता; यह भी बाहर की वस्तुओं और परिस्थितियों से आता है। पूर्ण समर्पण का अर्थ है – तुम्हें यह डर भी त्यागना है, और इसके लिए तैयार होना है कि तुम्हारा “स्वयं का” कुछ भी वास्तविक नहीं है। यहां तक कि शून्यता भी तुम्हारी नहीं है; वह भी परम सत्ता की है। तुम जिसे “मैं” कहते हो, वह भी तुम्हारा नहीं है।

यदि यह सब सच है, तो फिर तुम क्यों मूर्ख की तरह “मैं-मैं, मेरा-मेरा” करते रहते हो? क्यों अपने अहंकार में फँसे रहते हो? अपने आप से यह सवाल पूछो – क्या मेरे पास वास्तव में कोई अधिकार है? क्या मेरे पास वास्तविक सुख है? क्या मैं किसी चीज़ को हमेशा अपने पास रख सकता हूँ?

पूर्ण समर्पण का वास्तविक अर्थ यही है – सब कुछ भगवान को सौंप देना, अपने अहंकार, लालसा, भय और प्रिय वस्तुओं को छोड़ देना। इसका मतलब यह नहीं कि तुम शरीर, परिवार या संबंधों का त्याग कर दो; इसका मतलब है कि उनका मोह और उनका स्वामित्व छोड़ दो। जब तुम यह करोगे, तब तुम्हारे भीतर शांति और असली मुक्ति का अनुभव होगा।

जैसे केकड़ा छोड़ने पर वह अपने मार्ग पर चला जाएगा, वैसे ही तुम्हें भी उन सभी बंधनों, भय और मोह से ऊपर उठना होगा। यही पूर्ण समर्पण है – अपने मन और आत्मा को ईश्वर या उच्चतम सत्य के प्रति पूरी तरह खोल देना, बिना किसी अपेक्षा के।

पूर्ण समर्पण का मार्ग कठिन है, लेकिन यह सबसे शुद्ध और निश्चित मार्ग है। जब तुम पूरी तरह से समर्पित हो जाते हो, तब तुम्हारा जीवन अपने आप सरल और स्वतंत्र हो जाता है। यह समर्पण तुम्हें जीवन के हर दुःख से मुक्त करता है और तुम्हें उस अजर-अमर चेतना से जोड़ता है जो हमेशा अटूट और शाश्वत है।

ABOUT THE AUTHOR

Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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