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आध्यात्मिक मुक्ति क्या है?

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साधकों, आध्यात्मिक मुक्ति कोई ऐसी अवधारणा नहीं है जिसे केवल पढ़कर या समझकर प्राप्त किया जा सके। यह अपने बंधनों, माया और अज्ञान को पहचानकर उनसे मुक्त रहने की कला है।

इस लेख में मुक्ति के स्वरूप, उसके मार्ग, उसके लक्षण तथा मुक्त व्यक्ति की पहचान पर विस्तार से चर्चा की गई है। यह सारांश AI की सहायता से तैयार किया गया है; अतः विषय को गहराई से समझने के लिए पूरा नीचे का लेख अवश्य पढ़ें।

क्या मैं ‘आध्यात्मिक मुक्ति क्या है’ इसे जान सकता हूं?

हमें आध्यात्मिक मुक्ति को जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि हम पर बंधन क्या हैं। तभी तो आप कह पाएँगे कि, “हाँ, मुझ पर यह ऐसा बंधन था जिससे मैं दुखी था, जिसने मुझे ऐसे अंधकार में रखा था, जिस अंधकार को मैं अपनी आँखों से देख भी नहीं सकता था।”

क्योंकि वह अंधकार प्रकाश के न होने के कारण नहीं था, बल्कि आत्मज्ञान के अप्रकट होने के कारण मुझ पर और मुझसे ही मेरे चारों ओर के संसार में छाया हुआ था।

यहाँ ज्यादातर लोगों को यह तक पता नहीं है कि वे दुखी हैं। वे बस भ्रमित हैं, या कहें कि स्वप्न में हैं। वास्तविकता उनके लिए अप्रकट है क्योंकि वे माया के तले दबे हुए हैं।

माया अर्थात् वह जो नहीं है, जो वास्तविक नहीं है, सत्य नहीं है; लेकिन फिर भी वह समग्र संसार के रूप में प्रतीत होती है। माया कैस भ्रमित करती इस विषय पर हमारा अन्य लेख हैं जिन्हें आप पढ़ सकते हैं।

देखिए, मुक्ति कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जिसे आप अपने मस्तिष्क में प्रकट कर सकें। जैसे कोई वैज्ञानिक आपको अपने विज्ञान के क्षेत्र की किसी भौतिक पदार्थ के बारे में बता रहा हो, तो आप सबसे पहले उसे सुनकर अपने मस्तिष्क में ही उसका चित्र बनाते हैं।

जैसे कोई तारा हो, कोई ग्रह हो या कुछ और। वह जैसे-जैसे बताता जाता है, आप वैसे-वैसे उसे अपने भीतरी संसार में निर्मित करते जाते हैं, और अंततः वह बनकर तैयार भी हो जाती है।

लेकिन मुक्ति कोई ऐसी घटना नहीं है कि आप उसका पूरी प्रक्रिया को उत्पन्न कर ले, अगर किया है तो उसे आपका अंधविश्वास जानिए वो क्योंकि अंधविश्वास ही है कि “कोई आत्मा परमात्मा के साथ एकाकार हो जाएंगी जैसे बूंद समुद्र में गिरकर समुद्र हो जाती हैं। कही उड़ेगी कहींसे निकलेंगी इत्यादि।

लेकिन यह बात जान लीजिए कि आध्यात्मिक मुक्ति या जीवनमुक्ति आपसे संबंधित है। जीवन इस पूरे ब्रह्मांड में केवल आपका चल रहा है, तो उससे मुक्ति भी आपकी ही होगी; आपके पड़ोसी की नहीं, या किसी दूसरी चीज़ से नहीं, जिसे आपने अपने आप से अलग समझ रखा है।

तो आपको मुक्ति को नहीं जानना है। आप यहाँ यह पूछकर आए हैं कि “आध्यात्मिक मुक्ति क्या है?” इसका कोई ऐसा उत्तर नहीं है जिसे आप पढ़कर या सुनकर अपने मस्तिष्क में संग्रहीत कर लें।

यदि आपको कोई गुरु यह कहे कि उसने आपको मुक्ति समझा दी, तो वह गुरु नहीं बल्कि एक ढोंगी और झूठा व्यक्ति होगा। यह समझने-समझाने की बात ही नहीं है। जो समझा दिया गया है और जो समझ में आ गया है, वह झूठ है।

लेकिन सच्चा गुरु यह अवश्य बता सकता है कि आप पर बंधन क्या हैं, आप स्वतंत्र क्यों नहीं हैं, आप इस संसार के गुलाम क्यों हैं, और आप हर समय उदास क्यों रहते हैं। मुक्ति संभव है, यदि आप उसे प्रथम स्थान देते हैं।

यदि आप सच्चे अर्थ में आध्यात्मिक मुक्ति को जानना चाहते हैं, तो आप उसे तब तक नहीं जान सकते जब तक कि आप स्वयं उसे प्राप्त नहीं हो जाते।

आपको मुक्ति को जानने से पहले मुक्त होना पड़ता है।

और मुक्त होने के लिए पहले अपने बंधनों को जानना पड़ता है, ताकि आप उनसे दूरी बना सकें, वैराग्य विकसित कर सकें।

वे लोग जो सुबह 9 बजे से 9:30 बजे तक मुक्त रहना चाहते हैं और उसके बाद पूरे दिन बंधन में जीते हैं, वे मुक्त नहीं हैं।और यह कोई ध्यान भी नहीं है जो केवल आधा घंटा चलता हो। लोगों ने लोगों को मूर्ख बना दिया है, और वे बन गए हैं।

मुक्ति जीवन का कोई क्षण नहीं होती; यही जीवन होता है। और केवल उनका नहीं जो मुक्त हैं, बल्कि उनका भी जो बंधन में हैं। बस अंतर इतना है कि एक जीवन से विमुख होकर मृत्यु की ओर जा रहा है, और योगी उसी जीवन की ओर मुख करके परम मुक्ति, परमानंद और अमरत्व की ओर।

मुक्ति का अर्थ है अपने सांसारिक बंधनों के प्रति सजग रहना और उनका निरसन करना। उनसे जुड़ना नहीं, बल्कि उन्हें देखना कि वे कैसे मन में उठते हैं; और फिर मैं, जो विशुद्ध चैतन्य में निष्ठित है, उन्हें नष्ट कर देता हूँ।

मुक्ति की कामना ही मुक्ति है, बंधन की कामना बंधन है, और संसार की कामना पिंजरा है। और मुक्ति की कामना का अर्थ है उसकी कामना जिसे मैं जान नहीं सकता, जिसे मैं प्राप्त नहीं कर सकता; जिसमें मैं विलीन हो जाऊँ, मैं मिट जाऊँ उसे चाहते-चाहते।

मैं आध्यात्मिक मुक्ति को कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

देखिए, विधियाँ तो लाखों हैं; लेकिन उनमें सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आपको अपने सांसारिक बंधनों को जानना है, ताकि उन्हें जानकर मन से नष्ट कर सको। यदि उनसे जुड़ गए, तो माया के दास बन गए।

यदि आपके लिए संसार ही प्रथम है, वही आपकी प्रमुख कामना है, तो मुक्ति मिलने से रही। क्योंकि संसार से मुक्ति, संसार के साथ नहीं आती।

जो मुक्ति को प्राप्त हो चुके हैं, उन्होंने अनेक विधियाँ दी हैं, जिनके बारे में हमने अन्य लेखों में विस्तार से चर्चा की है। उनमें से एक है “नेति-नेति”, अर्थात् “यह नहीं, वह नहीं”।

जो कुछ भी आपके मन के क्षेत्र में आता है, जहाँ भी मन टिक जाता है, यह जानो कि वह वह नहीं है जो मुझे चाहिए। उसे पहचानो और उस विचार या वृत्ति का अतिक्रमण करो।

“नेति-नेति” के माध्यम से आप अपने बंधनों को कैसे नष्ट कर सकते हैं, नेति – नेति इस विषय पर हमारा एक अन्य लेख प्रकाशित है, जिसे आप पढ़ सकते हैं।

मन ऐसा है कि वह विकारों को ग्रहण करता रहता है। इसे जानना आवश्यक है, ताकि इससे ऊपर उठा जा सके।

मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं मुक्त हूँ?

आपको पता चल जाता है जब आप मुक्त होते हैं, क्योंकि जीवनमुक्ति कोई बेहोशी में घटित होने वाली घटना नहीं है। मुक्ति उसी की होती है जो पूर्णतः जागरूक और होश में है।

वह इन सांसारिक बंधनों को जानता है। वह इस शरीर और प्रकृति-तत्त्व का साक्षी मात्र होता है, परंतु उनसे पृथक रहता है।

आध्यात्मिक व्यक्ति की पहचान क्या हैं, जिसने मुक्ति को प्राप्त कर लिया है?

एक अज्ञानी के जीवन में केवल सांसारिक सुखों की कामना होती है, क्योंकि वह स्वयं को शरीर मानता है। शरीर का सुख ही उसका जीवन होता है। वह धन कमाता है ताकि भोग कर सके।

वह समाज में अपना नाम बड़ा करना चाहता है; अर्थात् उसे शक्ति, प्रतिष्ठा और मान चाहिए। अपमान मिल जाए तो वह व्याकुल हो जाता है। वह शारीरिक सुखों का आकांक्षी होता है।

लेकिन आध्यात्मिक व्यक्ति जीवन में एक महान लक्ष्य उठाता है। वह मान-अपमान, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु और धन को तुच्छ समझता है। उसका जीवन पशु के समान नहीं होता, भले ही स्थूल रूप से वह भी एक जीव ही हो।

वह प्रेम की मूर्ति होता है। करुणावान होता है। निर्भय होता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात, वह जागरूक होता है। वह भ्रमित नहीं होता। किसी मान्यता, अंधविश्वास या मायाजगत के तले दबा हुआ नहीं होता।

वह अधर्म का कट्टर विरोधी होता है। यदि उसका कोई सगा-संबंधी भी अधर्म का आचरण करता हो, तो वह उसका साथ नहीं देता। परिणाम कुछ भी हो, वह सत्य का पक्ष नहीं छोड़ता।

ABOUT THE AUTHOR

Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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