अगर आप जीना चाहते हैं, जीवन मात्र के अतुलनीय आनंद को उपलब्ध होना चाहते हैं, तो आपके जीवन में ध्यान अवश्य होना चाहिए।
देखिए, जीते तो सभी लोग हैं, लेकिन सभी अपने जीवन से सुखी नहीं होते। वे जीवित तो हैं, लेकिन दुःख, तनाव और चिंता में अपना जीवन काट रहे हैं।
बिना ध्यान के जीवन दुःखमय क्यों है?
अधिकांश लोग जीवन में परेशान हैं, लेकिन यह परेशानी ही जीवन नहीं होती। यह उनके द्वारा ही बनाई गई होती है। अर्थात जिस दुःख में वे जी रहे हैं, वह दुःख उन्होंने स्वयं ही बनाया है।
मनुष्य इतनी नासमझी करता है कि वह स्वयं दुःख को जन्म देता है और स्वयं ही उसे भोगता है।
इस सत्य को समझना इतना आसान नहीं है कि जिस दुःख को मैं भोग रहा हूँ, उसे मैंने ही बनाया है। मनुष्य संसार को अपनी इंद्रियों के माध्यम से जानता है और किसी सांसारिक वस्तु पर मोहित हो जाता है। फिर वह मानने लगता है कि उससे बढ़कर कुछ नहीं है और वही मुझे चाहिए।
वह वस्तु कुछ भी हो सकती है। किसी के लिए दौलत, किसी के लिए कोई भौतिक वस्तु, किसी के लिए किसी स्त्री या पुरुष से संबंध, तो किसी के लिए आराम, आलस्य, भय या शरीर का स्वास्थ्य आदि।
लेकिन जब बाहरी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं होतीं कि उसकी कोई कामना पूरी हो जाए, या उसका पूरा होना असंभव-सा प्रतीत होता है, तब दुःख तनाव, चिंता या अवसाद के रूप में प्रकट होता है। कभी-कभी यह इतना गंभीर हो जाता है कि व्यक्ति अपने जीवन का ही अंत कर देता है।
तो जीवन में दुःख किसने बनाया? निश्चित ही उसी ने, जो जी रहा है। कामना किसकी है? संसार की माया किसे चाहिए?
ऐसे लोग स्वयं को कभी नहीं जानते। वे आध्यात्मिक नहीं होते। वे इस संसार और अपनी इंद्रियों से प्राप्त समझ को ही इतना वास्तविक मान बैठते हैं कि आध्यात्मिक ज्ञान उन्हें विश्वास करने योग्य भी नहीं लगता।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप किसी शास्त्र पर विश्वास करें या अविश्वास। लेकिन एक बार निरपेक्ष होकर देख तो लीजिए कि कृष्ण हों, बुद्ध हों या अष्टावक्र—वे क्या कह रहे हैं।
ध्यान से इस दुःख का निवारण कैसे होता है?
जिस कामना के पीछे मन भाग रहा है, उसे बनाने वाला भी वही मन है। इसलिए पहला कार्य यह होगा कि मैं सबसे पहले मन को ही जानूँ कि उसमें यह कामना क्यों उठी और वह उस कामना की ओर क्यों खिंचा चला जा रहा है।
मैं इस लेख में आपको यह नहीं बताने वाला कि ध्यान क्या है या ध्यानस्थ कैसे हुआ जाए। इन विषयों पर आप अन्य लेख पढ़ सकते हैं।
देखिए, ध्यान कोई ऐसा कार्य नहीं है कि आपको किसी चिन्ह पर एकाग्र होना है, अपने मन में किसी मूर्ति, धार्मिक चिन्ह या किसी नाम की कल्पना करके उसी पर मन को टिकाना है। यह ध्यानावस्था तक पहुँचने की एक विधि हो सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति पर समान रूप से कार्य नहीं करती।
नास्तिक या किसी अन्य समुदाय के व्यक्ति पर यह कैसे कार्य करेगी? संभव है कि वह इससे चिढ़ जाए। लेकिन उसका भी तो अधिकार है कि वह अपने जीवन को सुखी बनाए।
लेकिन ध्यान आपके दुःख को समाप्त कर सकता है। आप कोई भी हों, किसी भी समुदाय या किसी भी देश के रहने वाले हों, आस्तिक हों या नास्तिक।
आप चेतन हैं। इसलिए अपने मन की दशा और उसकी दिशा को जानकर उससे उत्पन्न होने वाले दुःख को समाप्त कर सकते हैं। यहाँ तक कि उसके आने से पहले भी। क्योंकि दुःख संसार से तभी आता है, जब उसका आवाहन करने वाला भीतर बैठा हो। यदि उसके अस्तित्व को ही समाप्त कर दें, तो आप दुःख से बच जाएँगे।
विद्यार्थियों के लिए ध्यान क्यों महत्वपूर्ण है?
विद्यार्थी का कार्य होता है सीखना और जानना। लेकिन बहुत कम विद्यार्थी ऐसा कर पाते हैं। कारण वही है—उनका मन संसार की व्यर्थ बातों में उलझा रहता है।
जो विद्यार्थी कक्षा में बैठा है और उसका मन किसी वीडियो गेम में या शरीर के उस आकर्षण में लगा है, जो सभी प्राणियों में स्वाभाविक होता है, वह कैसे जान पाएगा कि उसके सामने क्या पढ़ाया जा रहा है?
वह कैसे आगे बढ़ेगा? वह पीछे ही रह जाएगा। मैंने ऐसे बहुत से युवाओं को देखा है, जो कहते हैं कि उन्होंने शिक्षा पर ध्यान न देकर बहुत बड़ी गलती की। अब उन्हें पछतावा होता है।
भटका हुआ मन विद्यार्थी का सबसे बड़ा नुकसान कर देता है।
क्योंकि यह उसके जानने और सीखने का समय है, और यह बार-बार नहीं आता। लोग कहते हैं कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती, लेकिन आपने कितने ऐसे लोगों को देखा है, जो आधी उम्र के बाद पढ़ाई कर रहे हों? क्या सभी अनपढ़ लोग पढ़ने जाते हैं? लाखों में कोई एक ही जाता होगा।
जो समय बीत गया, उसे वापस लाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।
निष्कर्ष,
जीवन का वास्तविक आनंद बाहरी वस्तुओं या परिस्थितियों में नहीं, बल्कि स्वयं को जानने और मन को समझने में है। ध्यान मन की चंचलता, कामनाओं और उनसे उत्पन्न होने वाले दुःख को पहचानने का माध्यम है। जब मन स्पष्ट और जागरूक होता है, तब तनाव, चिंता और भ्रम धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। यही कारण है कि ध्यान केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति और विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।