शिव भक्तों में यह स्तोत्र शिव के अन्य जैसे रुद्राष्टकम स्तोत्र नमामि शमिशान और स्वर्ण माला स्तुति ‘ईश गिरीश नरेश के समान प्रचलित है। इसकी रचना को लेकर कथाएं है जिसमें माना जाता है कि लंकापति दशानन रावण इसके मूल रचनाकर है ये कथाएं क्या है। और इसकी रचना पर बात करेंगें। और अगर आप शिव भक्त है तो आपको क्यों इसका जाप गान क्यों करना चाहिए , शिव तांडव स्तोत्र के लाभ क्या है जाएंगे।
शिव तांडव स्तोत्र के बोल ‘जटाटवी गलज्जल’ और अर्थ
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
अर्थ: उनकी जटाओं से बहती हुई गंगा की जलधारा उनके शरीर के स्थानों को पवित्र कर रही है। उनके गले में ऊँचे फन वाले सर्पों की लंबी माला लटक रही है। उनके डमरू से “डमड्-डमड्” जैसी गूँजती हुई ध्वनि निकल रही है। ऐसे प्रचंड तांडव करने वाले भगवान शिव हमारा कल्याण करें और हमें मंगल प्रदान करें।
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
अर्थ: उनकी जटाओं में आकाश से उतरती हुई गंगा चंचल होकर बह रही है और उसकी लहरें उनकी जटाओं में सुंदर दिखाई दे रही हैं। उनके ललाट पर अग्नि प्रज्वलित हो रही है। उनके मस्तक पर किशोर चंद्रमा सुशोभित है। ऐसे चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले भगवान शिव में मेरी भक्ति और प्रेम हर क्षण बना रहे।
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
अर्थ: पर्वतराज की पुत्री पार्वती के साथ प्रेमपूर्ण क्रीड़ा से भगवान शिव का मन प्रसन्न रहता है। उनकी सुंदर और चंचल दृष्टि उनके मन में आनंद उत्पन्न करती है। उनकी कृपा की दृष्टि बड़े से बड़े कठिन संकट को रोक देती है। ऐसे दिगंबर भगवान शिव में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
अर्थ: उनकी जटाओं में भूरे रंग के सर्प हैं, जिनके चमकते फनों पर लगी मणियों की प्रभा दिशाओं रूपी स्त्रियों के मुखों पर लगे कुंकुम के समान दिखाई देती है। मदोन्मत्त हाथी की चमड़ी को उत्तरीय वस्त्र के रूप में धारण करने वाले समस्त प्राणियों के पालनकर्ता भगवान शिव में मेरा मन अद्भुत आनंद प्राप्त करे।
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
अर्थ: हजारों नेत्रों वाले इंद्र आदि सभी देवताओं के सिर पर सुशोभित फूलों से गिरने वाली धूल से जिनके चरणों का स्थान धूसरित हो गया है, और जिनकी जटाएँ सर्पराज की माला से बंधी हुई हैं, ऐसे चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले भगवान शिव हमें लंबे समय तक समृद्धि और कल्याण प्रदान करें।
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम् ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥
अर्थ: उनके ललाट के आँगन में प्रज्वलित अग्नि की चमक ने कामदेव के पाँच बाणों को भस्म कर दिया और देवताओं के अहंकार को शांत कर दिया। उनके मस्तक पर अमृत जैसी किरणों वाला चंद्रमा सुशोभित है। ऐसे महान कपालधारी भगवान शिव की जटाओं का वैभव हमें प्राप्त हो।
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥
अर्थ: प्रचंड और भयानक ललाट की अग्नि “धगद्-धगद्” करती हुई प्रज्वलित हो रही है, जिसने कामदेव के पाँच बाणों को भस्म कर दिया है। पर्वतराज की पुत्री पार्वती के वक्षस्थल पर सुंदर चित्र बनाने में जो अद्वितीय कलाकार हैं, उन तीन नेत्रों वाले भगवान शिव में मेरी बुद्धि और मन सदा लगे रहें।
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
अर्थ: नए बादलों के समूह से घिरी हुई गहरी अँधेरी रात के समान उनके कंठ का रंग सुंदर दिखाई देता है। वे अपनी जटाओं में गंगा को धारण करने वाले हैं और हाथी की खाल को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं। कलाओं के भंडार चंद्रमा को धारण करने वाले तथा संसार का भार संभालने वाले भगवान शिव हमें समृद्धि प्रदान करें।
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥
अर्थ: मैं उस भगवान शिव की भक्ति करता हूँ जिनका कंठ खिले हुए नीले कमल की गहरी नीली आभा को भी मात देने वाला है। वे कामदेव का नाश करने वाले, त्रिपुर का विनाश करने वाले, संसार के बंधन को काटने वाले, यज्ञ के अहंकार का नाश करने वाले, गजासुर और अंधकासुर का वध करने वाले तथा मृत्यु के भी विनाशकर्ता हैं।
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥
अर्थ: मैं उन भगवान शिव की भक्ति करता हूँ, जो सभी प्रकार के मंगल के स्वरूप हैं और जिनकी कलाओं के समूह से निकलने वाली मधुरता भँवरों को आकर्षित करने वाले मधुर रस के समान है। वे कामदेव का अंत करने वाले, त्रिपुर का नाश करने वाले, संसार के बंधनों का अंत करने वाले, यज्ञ के अहंकार का नाश करने वाले, गजासुर और अंधकासुर का अंत करने वाले तथा मृत्यु के भी अंत करने वाले हैं।
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥
अर्थ: भगवान शिव का वह प्रचंड तांडव विजयी हो, जिसमें उनकी जटाओं और शरीर पर सर्प घूमते हुए चमक रहे हैं, उनके भयानक ललाट से धधकती हुई अग्नि निकल रही है और ऊँचे मृदंग की “धिमि-धिमि” जैसी मंगलमय ध्वनि के क्रम के साथ उनका प्रचंड तांडव नृत्य हो रहा है।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥
अर्थ: पत्थर और सुंदर बिछौने, सर्प और मोतियों की माला, मूल्यवान रत्न और मिट्टी के ढेले, मित्र और शत्रु, तिनका और कमल के समान नेत्रों वाले व्यक्ति तथा सामान्य प्रजा और महान राजा—इन सभी के प्रति समान भाव रखने वाले सदाशिव की मैं कब भक्ति करूँगा?
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्॥
अर्थ: देवताओं की नदी गंगा के किनारे किसी एकांत स्थान में रहते हुए, बुरी और गलत बुद्धि से मुक्त होकर, सिर पर हाथ जोड़कर, चंचल दृष्टि को छोड़कर और मस्तक पर सुशोभित भगवान शिव का ध्यान करते हुए, “शिव” मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा?
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥
अर्थ: देवताओं के स्वामी के नगर में स्थित सुंदर पुष्पों के समूह में लगी हुई मल्लिका (चमेली) के फूलों से निकलने वाली सुगंध भँवरों को आकर्षित करती है। भगवान शिव के अंगों से निकलने वाली प्रकाशमय आभा का वह समूह हमें दिन-रात आनंद प्रदान करे और हमें परम आश्रय प्रदान करे।
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥
अर्थ: प्रचंड वडवानल जैसी अग्नि की प्रभा से प्रकाशित, कल्याण फैलाने वाली, आठों महान सिद्धियों को प्रदान करने वाली, भक्तों द्वारा की जाने वाली प्रार्थना से युक्त, बाएँ नेत्र को खोलने वाली और विवाह के समय की मंगलमय ध्वनि के समान “शिव” मंत्र से सुशोभित भगवान शिव की स्तुति संसार की विजय और कल्याण के लिए हो।
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥
अर्थ: इस उत्तम स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ, स्मरण और उच्चारण करने वाला मनुष्य निरंतर शुद्ध होता है। वह भगवान हर (शिव) में शीघ्र ही गहरी भक्ति प्राप्त करता है और किसी अन्य मार्ग पर नहीं जाता। भगवान शंकर का चिंतन मनुष्य को मोह और भ्रम से मुक्त करने वाला है।
समाप्त,
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥
अर्थ: पूजा समाप्त होने के समय और प्रदोषकाल में जो व्यक्ति दशमुख रावण द्वारा गाया गया यह शम्भु-पूजन स्तोत्र पढ़ता है, उसे भगवान शम्भु हमेशा स्थिर और प्रसन्न लक्ष्मी प्रदान करते हैं, जो रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त समृद्धि का प्रतीक है।
शिव तांडव स्तोत्र की रचना
ये संस्कृत में भगवान शिव की स्तुति है, लोग मानते है कि इसकी रचना लंकापति रावण ने की थी। रावण भी भगवान शिव का भक्त था। कहते है कि रावण जब भगवान शिव को प्रसन्न करने लंका से यात्रा कर कैलाश पर्वत पर गया था तब उसने ढोल के साथ और इस स्तुति के गान के साथ कैलाश पर चढ़ाई शुरू की थी।
अन्य कथा में ऐसा है कि रावण अपने घमंड में चूर होकर शिव के निवास कैलाश पर्वत को हाथों से उठाने की कोशिश कर रहा था और उसने कैलाश पर्वत के नीचे हाथ डालकर उसे थोड़ा ऊपर उठा भी लिया था। तब शिव जो कैलाश के ऊपर बैठे थे, उन्होंने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को नीचे दबाया जिससे रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया। वहाँ से छूटने के लिए रावण इस स्तुति के माध्यम से शिव की तारीफ करने लगा, ताकि प्रसन्न होकर शिव अपने अंगूठे का भार हटाएँ।
लेकिन हमारे आधुनिक खोजों के अनुसार सबसे पुरानी पांडुलिपि ई. 1787 की है। वैसे शिव तांडव स्तोत्र वेदों जैसे प्राचीन ग्रंथों में नहीं पाया जाता, परंतु यह भक्ति परंपरा से आता है और अनेक पांडुलिपियों में और संस्कृत साहित्य में है।
अगर आप इसके अर्थ पर ध्यान दें तो इसमें भगवान शिव के साकार स्वरूप की स्तुति की गई है; जो तांडव नृत्य कर रहे है। परंतु इसमें कुछ ऐसे छंद भी है जो आपको शिव के साकार के पार के शिव के परब्रह्म आत्मस्वरूप का संकेत करते है।
भगवान शिव को आदियोगी कहा जाता है। क्योंकि सारे योगी उनकी पूजा करते है, ऐसा कोई नहीं जिसकी शिव पूजा करते हो। शिव सबसे पुरातन है। शिव का उल्लेख आपको ऋग्वेदों में भी मिलता है, जहाँ शिव के भयंकर रुद्र रूप को ऋषियों ने नमन किया है। “ॐ नमो भगवते रुद्राय” मंत्र से आपको पता होगा कि ऋग्वेद केवल भारत के नहीं, पूरी दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक है।
भगवान शिव का तांडव नृत्य और शिव तांडव स्तोत्रम्
भगवान शिव जब किसी दुष्टता पर क्रोधित होते है, वे तांडव नृत्य करते है। जैसे जब एक बार कामदेव ने उन पर अपना तीर चलाया था, ताकि शिव कामासक्त हो जाएँ, तो शिव तो कामासक्त हुए नहीं लेकिन कामदेव पर क्रोधित हो गए और तांडव करने लगे। उन्होंने कामदेव को ही भस्म कर दिया।
कामदेव चाहते थे कि शिव और पार्वती के पुत्र का जन्म हो क्योंकि वही पुत्र तारकासुर का वध कर सकता था। तारकासुर ने कठोर तप कर ऐसा वरदान पाया था। तारकासुर यह बात अच्छी तरह से जानता था कि शिव वैरागी है और हमेशा समाधिस्थ, समाधि में लोन रहते है। शिव कामासक्त हो जाएँ और उनसे पुत्र उत्पन्न हो, यह लगभग असंभव है। आप शिव और कामदेव की कथा को और उसके सीख को अन्य लेख में पढ़ सकते है।
शिव तांडव स्तोत्र पाठ का लाभ
अगर इस स्तोत्र में अंतिम छंद को पढ़ें तो वहाँ ऐसा लिखा है कि जो भक्त इस स्तोत्र को पढ़ता, याद करता या सुनाता है, वह भीतर से पवित्र हो जाता है और भगवान शिव की भक्ति पाता है। यहाँ शिव को गुरु कहा गया है। शिव का चिंतन करना ही माया से मुक्ति का मार्ग है।
हमने आपको अन्य लेख में बताया है कि माया कैसे मनुष्य और जीव को भ्रमित करती है। वह जीवन में कभी सुख को प्राप्त नहीं करता। परंतु माया से मुक्ति का मार्ग है जब आप भीतर के क्लेशों को हटा देते है, जिसके लिए यह शिव तांडव स्तोत्रम् एक विधि है।
जब लेखक कहते है कि शिव का विचार, तब उसका अर्थ ऐसा होता है कि माया का विचार त्यागना। शिव का विचार माया-जगत का विचार नहीं हो सकता निराकार का ध्यान यानि आकारों के ध्यान से मुक्ति । हम जब शिव पर ध्यान देते है तब ऐसा होता है कि हम माया पर ध्यान नहीं दे रहे हो।
यह आध्यात्मिक मुक्ति का उत्तम मार्ग बनाता है। क्योंकि मुक्ति हमें अपने से ही चाहिए होती है अहंकार से । भगवान शिव का विचार अपना और अपने संसार का नहीं होता। वह उससे पार जाने का मार्ग होता है।
इससे बड़ा लाभ क्या हो सकता है कि आप जीवन में ही जीवन्मुक्त हो गए, क्योंकि सारी समस्याएँ तो हमें अपने ही बंधन से होती है। उससे मुक्ति हो गए यानी लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान और सुख-दुख से मुक्त हो गए। परमानंद का मतलब यही होता है कि न सुख और न दुख।
लेकिन आम आदमी जीवन भर सुख और दुख के बीच में लटका रहता है। सुख में बहुत अधिक हँसता है और दुख में रोता है। वही पूरे जीवन को व्यर्थ कर देता है, अर्थहीन।
लेकिन शिव भक्तों को यह बात पता होती है कि नित्य सुख का उपाय माया में नहीं, वह शिव में स्थापित होने में है। जब वे शिव के स्तोत्रम् का जाप या भजन करते है, वह शिव के परमात्मा स्वरूप का ही हृदय में आवाहन करते है।
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