इस लेख में मैंने शिव स्वर्णमाला स्तुति ‘ईशगिरीश नरेश’ के संपूर्ण बोल, प्रत्येक श्लोक का सरल हिन्दी अर्थ तथा इस स्तुति से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की है। साथ ही, यह स्तुति क्या है, इसमें निहित आध्यात्मिक संदेश क्या है, इसके रचनाकार के विषय में क्या मत हैं जुड़ी आवश्यक जानकारी भी दी गई है।
शिव स्वर्णमाला स्तुति ‘ईशगिरीश नरेश’ के बोल अर्थ
ईशगिरीश नरेश परेश महेश बिलेशय भूषण भो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे ईश्वर! हे कैलासपति! हे मनुष्यों के स्वामी! हे परमेश्वर! हे महेश! जिनके आभूषण सर्प हैं, हे प्रभो! हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
उमया दिव्य सुमङ्गल विग्रह यालिङ्गित वामाङ्ग विभो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे सर्वव्यापक! जिनका दिव्य एवं मंगलमय बायाँ अंग उमा द्वारा आलिंगित है, हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
ऊरी कुरु मामज्ञमनाथं दूरी कुरु मे दुरितं भो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे प्रभो! मुझे, जो अज्ञानी और अनाथ हूँ, स्वीकार कीजिए तथा मेरे पापों और दोषों को दूर कीजिए। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
ॠषिवर मानस हंस चराचर जनन स्थिति लय कारण भो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे प्रभो! आप श्रेष्ठ ऋषियों के मनरूपी सरोवर के हंस हैं तथा समस्त चराचर जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के कारण हैं। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
अन्तः करण विशुद्धिं भक्तिं च त्वयि सतीं प्रदेहि विभो।साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे सर्वव्यापक! मुझे अन्तःकरण की पूर्ण शुद्धि तथा आपके प्रति सच्ची और अटल भक्ति प्रदान कीजिए। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
करुणा वरुणा लय मयिदास उदासस्तवोचितो न हि भो।साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे करुणासागर प्रभो! इस दास के प्रति उदासीन रहना आपके लिए उचित नहीं है। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
जय कैलास निवास प्रमाथ गणाधीश भू सुरार्चित भो।साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे कैलासवासी! हे प्रमथगणों के स्वामी! हे ब्राह्मणों द्वारा पूजित प्रभो! आपकी जय हो। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
झनुतक झङ्किणु झनुतत्किट तक शब्दैर्नटसि महानट भो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे महान नर्तक प्रभो! आप डमरू की “झनुतक-झङ्किणु-झनुतत्किट-तक” ध्वनि के साथ नृत्य करते हैं। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
धर्मस्थापन दक्ष त्र्यक्ष गुरो दक्ष यज्ञशिक्षक भो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे धर्म की स्थापना में कुशल! हे त्रिनेत्रधारी गुरु! हे दक्ष के यज्ञ को शिक्षा देने वाले प्रभो! हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
बलमारोग्यं चायुस्त्वद्गुण रुचितं चिरं प्रदेहि विभो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे सर्वव्यापक! मुझे बल, आरोग्य, दीर्घायु तथा आपके गुणों में दीर्घकाल तक रहने वाली रुचि प्रदान कीजिए। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
शर्व देव सर्वोत्तम सर्वद दुर्वृत्त गर्वहरण विभो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे शिव! हे देवश्रेष्ठ! हे सब कुछ देने वाले! हे दुष्टों के अभिमान का नाश करने वाले सर्वव्यापक प्रभो! हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
भगवन् भर्ग भयापह भूत पते भूतिभूषिताङ्ग विभो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे भगवान्! हे पापों का नाश करने वाले! हे भय को दूर करने वाले! हे समस्त प्राणियों के स्वामी! हे भस्म से विभूषित अंग वाले सर्वव्यापक प्रभो! हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
षड्रिपु षडूर्मि षड्विकार हर सन्मुख षण्मुख जनक विभो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे षड्रिपुओं, षडूर्मियों और षड्विकारों का नाश करने वाले! हे मंगलमय स्वरूप! हे षण्मुख (कार्तिकेय) के पिता, सर्वव्यापक प्रभो! हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मे त्येल्लक्षण लक्षित भो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
हे प्रभो! आप “सत्य, ज्ञान और अनन्त” इन लक्षणों से निरूपित ब्रह्म हैं। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
हाऽहाऽहूऽहू मुख सुरगायक गीता पदान पद्य विभो। साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम॥
हे सर्वव्यापक प्रभो! जिनकी स्तुति हाहा, हूहू आदि देवगायक अपने स्तुतिपदों और पद्यों द्वारा करते हैं। हे पार्वती सहित सदाशिव, शम्भो, शङ्कर! आपके दोनों चरण मेरी शरण हैं।
शिव स्वर्णमाला स्तुति ‘ईशगिरीश नरेश’ स्तुति क्या हैं?
भगवान शिव की ‘नमामि शमिशान’ स्तुति की तरह शिव स्वर्णमाला स्तुति भगवान शिव की एक विख्यात संस्कृत स्तुति है।
भगवान शिव की स्तुति में यह स्पष्ट किया गया है कि व्यक्ति को शिव का भजन करना चाहिए क्योंकि जब तक समर्पण नहीं होता व्यक्ति अपनी सांसारिक पीड़ा से आध्यात्मिक मुक्ति को उपलब्ध नहीं हो सकता।
यह स्तुति शिव के सगुण रूप के वर्णन करती है, और यहां भगवान शिव के निर्गुण निराकार ब्रह्म स्वरूप का भी संकेत देती है, निश्चित रूप से उनके निर्गुण ब्रह्म स्वरूप का वर्णन सगुण रूप के तरह नहीं किया जा सकते।
परन्तु भगवान शिव के इस निर्गुण स्वरूप में भक्त के लीन होकर जो लाभ होते हैं उन्हें बताया गया हैं, भगवन् भर्ग भयापह भूत पते भूतिभूषिताङ्ग विभो। अर्थात, जो पापों को नाश करने वाले भय से मुक्ति देने वालें हैं।
इसके हर श्लोक के अंत में साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् इसका अर्थ है कि “हे माता पार्वती के साथ विराजमान सदाशिव! हे शम्भो! हे शङ्कर! मैं आपके दोनों चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ।” भक्त को आत्म समर्पण के पथ पर उन्मुख करती हैं।
शिव स्वर्णमाला स्तुति के रचनाकार कौन हैं?
शिव स्वर्णमाला स्तुति के रचनाकार के विषय में कोई प्रामाणिक और सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अनेक स्थानों पर इसे आदि शङ्कराचार्य की रचना बताया जाता है।
किन्तु इस मत की पुष्टि करने वाला कोई स्पष्ट ऐतिहासिक या ग्रन्थीय प्रमाण प्राप्त नहीं होता। इसलिए निश्चित रूप से इसके रचनाकार का नाम कहना उचित नहीं है।
यह स्तुति स्वतंत्र रूप से अनेक स्तोत्र-संग्रहों, पूजा-पद्धतियों तथा भजन-संकलनों में प्राप्त होती है। वर्तमान समय में इसका व्यापक रूप से पाठ किया जाता है, किन्तु यह मूल रूप से किस प्राचीन ग्रन्थ में संकलित थी, इसका कोई सर्वमान्य प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी कारण इसे प्रायः एक स्वतंत्र शिव-स्तुति के रूप में ही स्वीकार किया जाता है।