जहाँ मन टिक जाता है, वह माया है; जिसका दूर जाना ही दुख और भय है, वह माया है। माया के पीछे ही देही पूरा जीवन भागता है और उसे ही पाने के लिए आजीवन सकाम कर्म करता है।
माया-जगत से व्यक्ति को कैसे पीड़ा होती है?
जब व्यक्ति अपने अस्तित्व को शरीर से जुड़ा मानता है, अहंभाव के कारण, और उसे वैसा ही बनाए रखना चाहता है, अर्थात वह इसमें तल्लीन हो जाता है। तब उसे वह दसों दिशाओं में फैला संसार प्राप्त करने योग्य प्रतीत होता है।
उसके पास प्राप्त करने को मात्र संसार ही होता है; कोई अन्य विकल्प नहीं। और संसार से मेरा अर्थ सम्पूर्ण ब्रह्मांड से नहीं; संसार की कोई एक इकाई, वस्तु या कोई संसार में बनने वाली परिस्थिति, जैसा कुछ भी हो सकता है, लेकिन उसे भौतिक और सांसारिक ही होना चाहिए।
जिन तत्वज्ञानियों ने जाना, उन्होंने इस ‘समझ’ को ‘माया’ का नाम दिया। वह पूरा संसार और उनके केंद्र में खड़ा संसार का भोक्ता, संसारी—दोनों उसी ‘समझ’ में हैं।
जहाँ मन टिक जाता है, वह माया है; जिसका दूर जाना ही दुख और भय है, वह माया है। माया के पीछे ही देही पूरा जीवन भागता है और उसे ही पाने के लिए आजीवन सकाम कर्म करता है।
लेकिन जब संसारी और संसार में द्वंद्व होता है, यानी संसारी चाहता कुछ है और संसार बनता कुछ और है, तब उस संसारी को बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है। वह इसी परेशानी से मुक्ति पाने के लिए संसार को बदलने का कर्म करता है, लेकिन ऐसा नहीं होता। संसार के अपने नियम हैं और संसारी का अपना रास्ता है।
व्यक्ति माया से कैसे बच सकता है?
अगर आपने लेख का ऊपर का हिस्सा पढ़ लिया है, तो आपको यह बात समझ आ गई होगी कि पीड़ा तभी होती है, जब माया की कामना उठती है, जब संसार से कुछ चाहिए होता है, या संसार में कुछ ऐसा हो जाता है जैसा वह संसारी नहीं चाहता था।
अगर आप माया की पीड़ा से स्वयं को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो आप माया का विरोध मत कीजिए, यानी संसार जैसा भी रूप ले—चाहा हुआ या अनचाहा—आप समता में रहें।
अगर संसार से कष्ट उठाने पड़ रहे हैं या फिर संसार से बहुत सुख मिल रहा है; सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही हैं, तो न कष्ट से भयभीत हो जाएँ और न सुख से लालायित हो जाएँ।
लेकिन ऐसा कर पाना आसान नहीं होता। इसके लिए आपके जीवन में सच्चा प्रेम आवश्यक होता है, या आपका किसी महान कार्य की तरफ आकर्षण हो और उसका संबंध आपके दैहिक सुख या आपके अहंकार से न हो। तभी कोई सुख और दुख में समभाव रख सकता है।
दूसरा एक तरीका है कि आप स्वयं को ही समर्पित कर दें। आप अपने सांसारिक अहंकार यानी “मैं” से ऊपर कुछ रखें। आपके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण यह “मैं” न हो। जो अपने जीवन में स्वयं को ही सबसे बड़ा मानते हैं, माया उन्हें बहुत दुख देती है। माया उन्हें विनाश की ओर ले जाती है।
इससे बचने के लिए आपको यह वृत्ति पकड़नी आनी चाहिए कि जब आपके भीतर कोई विचार उठता है जो “मैं” से जुड़ा होता है, जैसे कि किसी ने कोई अच्छा काम किया, उसका समाज में सम्मान हुआ, तो “मैं” भी अच्छा काम करूँगा ताकि “मेरा” भी सम्मान हो। यह विचार अहंकार से जुड़ा है। अगर सम्मान नहीं हुआ, तो आप बुरा काम करने लग जाएँगे। इंसान को भलाई भी तभी करनी चाहिए जब उसमें प्रेम हो, करुणा हो, संवेदना हो।
मेरी माया से पूर्ण मुक्ति कैसे होगी?
माया से पूर्ण मुक्ति को ही मैंने “समाधि और समाधिस्थ किसे कहते हैं?” इस लेख में बताया है। आप उसे पढ़ सकते हैं।
देखिए, माया से पूर्ण मुक्ति को ही शास्त्रीय शब्दों में ब्रह्मनिर्वाण या मोक्ष कहा जाता है जो परमानंद है। यह चेतना का वह आयाम है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल अद्वैत वास्तविकता शेष रहती है। वेदांत में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ महावाक्य है, जिसका अर्थ होता है—”मैं ब्रह्म हूँ।” यहाँ ब्रह्म का अर्थ माया से पूर्ण मुक्ति ही है।
यह कोई अपने आप घटने वाली घटना नहीं है। इस शरीर को धारण करने के बाद अपने आप कभी इससे मुक्ति नहीं होती। आपको साधना करनी पड़ती है, अपने अहंकार को तोड़ना पड़ता है। यहाँ केवल अहंकार ही जन्म लेता है, हर पल—वह भी अपने आप। आप पर बंधन लगते हैं अपने आप, क्योंकि यह माया आपको मुक्त होने नहीं देती।
अहंकार तोड़ने के लिए जीवन में कुछ ऐसा कारण होना चाहिए जिससे अहंकार पोषित न हो। अन्यथा सब केवल अपने अहंकार को बड़ा करने के लिए जीते हैं, जो बाद में उनके ही विनाश का कारण बनता है।
वे जीवन भर बस एक काम करते हैं—लोगों के बीच स्वयं को बड़ा दिखाने का। ऐसा करते-करते वे अपना अहंकार बहुत बड़ा बना लेते हैं और बाद में उनकी मृत्यु हो जाती है। जीवन भर की मेहनत राख हो जाती है।
आप वहाँ जाएँ, उनसे मिलें, वो जाने जिससे आपका अहंकार टूटने लगता है, जिनका होना आपके लिए कष्टदायक है, क्योंकि जब अहंकार टूटता है तब कष्ट होता है। लेकिन इसी में व्यक्ति का परम कल्याण है।