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माया संसार के रूप में हमें कैसे भासती है?

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माया को केवल जान लेना ही माया से पार पाना,

माया वास्तव में कहीं बाहर मौजूद कोई ठोस वस्तु नहीं है, फिर भी यह सम्पूर्ण संसार की अनुभूति के रूप में प्रकट होती है।

इसलिए यदि कोई यह कह दे कि “यह पूरा संसार माया है”, वह भी गलत नहीं; और यदि कोई कह दे कि “माया का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं”, तब भी उसे गलत सिद्ध नहीं किया जा सकता। यही इसकी विचित्रता है—माया है भी और नहीं भी।

तो फिर प्रश्न उठता है—यह माया है क्या? लोग सहज रूप से कह देते हैं कि “सब माया है”, परंतु वे इस कथन की गहराई को समझते नहीं।

जो व्यक्ति यह कह रहा है कि “यह माया है”, वह भी तो उसी माया का ही एक अंश है। यदि संसार माया है, तो निश्चित ही ‘तुम’ जो स्वयं को शरीर और मन मानते हो, तुम भी माया के ही भीतर खड़े हो।

साधकों, माया को शब्दों में बाँधना सरल नहीं, परंतु इसे समझना उतना ही आवश्यक है। क्योंकि माया की प्रकृति को जाने बिना, उसके भ्रम से मुक्ति मिलना संभव नहीं। माया को जानना ही आधी मुक्ति है, और माया से ऊपर उठना पूर्ण मुक्ति।

माया संसार के रूप में हमें कैसे भासती है?

माया का अस्तित्व वास्तविक अर्थों में नहीं है। वह केवल एक महान भ्रम है—इतना विशाल भ्रम कि उसी के भीतर पूरा ब्रह्मांड एक अनुभव के रूप में प्रकट हो जाता है।

यह वास्तविकता वैसी नहीं है जैसी हमारी आँखों को दिखती है, न वैसी है जैसी हमारी बुद्धि समझती है; क्योंकि वास्तविकता इंद्रियों की पहुँच से परे है।

हमें याद रखना चाहिए कि हम जीव हैं—सीमित। हमारी इंद्रियाँ सीमित हैं, हमारी बुद्धि सीमित है, हमारा अनुभव भी सीमित है। इसलिए हम जो देखते और सुनते हैं, उसे ही तत्काल सत्य मान लेते हैं। जबकि यह संसार अपने आप में पूर्ण है, परंतु हम उसे तिरछे काँच से देखते हैं, इसीलिए वह वैसा हमें कभी दिखाई नहीं देता जैसा वह वास्तव में है।

ऋषियों ने जाना कि वास्तविकता को अनुभव करने के दो मार्ग हैं। एक—इंद्रियों के माध्यम से, जैसा सामान्य जीव अनुभव करता है; दूसरा—इंद्रियों को भीतर मोड़कर, चेतना में स्थित होकर, जैसा योगी अनुभव करता है।

हैरानी की बात यह है कि इन दोनों में भूमि-आसमान का अंतर है। इंद्रियों से जो दिखता है, वह एक प्रकार की दुनिया है; और चेतना से जो दीखता है, वह बिल्कुल भिन्न वास्तविकता है।

सत्य तो केवल आत्मा है। आत्मा ही व्यक्त भी है और आत्मा ही अव्यक्त भी। वही जगत रूप से प्रकट होती है और वही मौन में, अज्ञेय में स्थित है।

परंतु यह शरीर तो केवल पृथ्वी की मिट्टी का एक पुतला है। जब अज्ञान के कारण जीव इस शरीर को ही अपना अंतिम स्वरूप मान लेता है, तब वह माया के महान जाल में गिर जाता है। उसके लिए वास्तविकता धुंधली हो जाती है—अनात्मा दृश्य होने लगती है और माया का जाल ही सत्य प्रतीत होने लगता है। जो अद्वैत है उसमें द्वैत दिखाई देने लगता है, जो अभेद है उसमें भेदों का अनुभव होने लगता है। इस विभ्रम से ही दुख उपजता है और शांति खो जाती है।

आत्मा को जाना नहीं जा सकता, क्योंकि वह जानने वाले से भी परे है। फिर भी इंद्रियों के लिए उसका एक छोटा-सा सिरा जगत के रूप में प्रकट होता है—जिसे हम सत्य समझ बैठते हैं।

माया आपको कैसे दुख पहुँचाती है?

जब मनुष्य शरीर को ही अपना अंतिम स्वरूप मान लेता है, तब वह उसी मिथ्या जगत को अपना घर, अपना आधार और अपना सत्य समझने लगता है। यही सबसे बड़ी भूल है। यही माया का मूल खेल है।

जब आप असत्य को सत्य मान लेते हैं, तब दुख अवश्य जन्म लेता है।

मनुष्य अपने आनंदमय स्वरूप से अनभिज्ञ रहता है, इसलिए उसके भीतर अधूरापन बस जाता है। यह अधूरापन ही जीवभाव है, जो स्वरूप-अज्ञान से उत्पन्न होता है। व्यक्ति इसे मिटाने के लिए संसार का सहारा लेता है—धन, काम, प्रतिष्ठा, तरक्की, सुख-साधन, मान्यता।

लेकिन यह समाधान उल्टा पड़ता है, क्योंकि समस्या भीतर है और इलाज बाहर ढूँढा जा रहा है। यही कारण है कि जितना मनुष्य बाहर भागता है, उतना ही सूखा, थका, निराश और दुखी होता जाता है। यह भागदौड़ उसे माया के जाल में और गहराई तक फँसा देती है। अंततः आनंद खो जाता है, और दुःख जीवन का स्वभाव बन जाता है।

जीवात्मा को आप ऐसे समझें जैसे कठपुतली की डोरी—जिसका सिरा माया के हाथों में है। माया उसे अपनी उंगलियों पर नचाती है, और जीव नाचता है—पर यह नृत्य उसकी इच्छा से नहीं होता, बल्कि मजबूरी से होता है।

समस्या यह है कि जीव गलत दिशा में समाधान तलाशता है, इसलिए पीड़ा बढ़ती जाती है। जब तक वह भीतर नहीं देखता, तब तक कोई परिवर्तन संभव नहीं।

 

आत्मा में स्थिति ही माया से पूर्ण मुक्ति है,

Maya upnishad

माया में उलझना नहीं है; बस यही दृढ़ समझ रखना है कि माया विश्वसनीय नहीं है। वह सुख का भ्रम दिखाकर अंत में दुख प्रदान कर देती है।

माया से पूर्ण मुक्ति तभी मिलती है जब साधक अद्वैत आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है—जहाँ कोई द्वंद्व नहीं, कोई भय नहीं, कोई कमी नहीं। वहाँ केवल शुद्ध अस्तित्व है, निर्मल शांति है, और सहज आनंद है।

इसके लिए नेति-नेति का अभ्यास, ध्यान, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग—ये सभी साधन साधक को ऊँचाई तक ले जाते हैं, माया के जाल से ऊपर उठाते हैं, और उसे भीतर के सत्य से जोड़ते हैं।

लेकिन स्वरूप-अज्ञान दूर करने के लिए वैराग्य आवश्यक है—एक ऐसी उदासीनता जो किसी घृणा से नहीं आती, बल्कि इस गहरी समझ से आती है कि मुझे जो चाहिए वह संसार में नहीं है। जैसे ही यह बोध जागता है, भीतर की खोज प्रारंभ हो जाती है। यही सही दिशा है, यही सही आरंभ है।

अध्यात्म वही स्थान है जहाँ आपके जीवन की हर गुत्थी का समाधान है।

यदि जीवन समस्या बन गया है, तो अध्यात्म जीवन को ही बदल देता है। वह आपको धोखे से निकालता है और सर्वोच्च सत्य के साथ एक कर देता है—उस सत्य के साथ जो नित्य है।

ABOUT THE AUTHOR

Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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