आज जो हम देखते है। लोगों को कुछ कर्मकांड करते हुए। इससे ऐसा मालूम होता है कि सनातन धर्म मान्यता है, या विश्वास है। जो हमारे इष्ट देवी देवता है। जैसे कृष्ण शिव भगवान और देवी वे लोगों की मान्यता है। क्योंकि यहां आपको ज्यादातर लोग धार्मिक मिलेंगे लेकिन वो खुद ही धर्म के विषय में भ्रमित है। लेकिन सनातन धर्म को सच में जो जानते है वो विरले ही है। और बहुत ज्यादा संभावना है कि आपको वो क्रिया कर्मकाण्ड करते भी नहीं दिखेंगे। धर्म को बिना जाने इंसान अंधविश्वासी हो जाते है। क्योंकि सनातन धर्म कोई अंधविश्वास नहीं। यह ज्ञान है।
सनातन धर्म का स्वरूप क्या है?
धर्म के मुख्य ग्रंथ वेद हैं। और वैदिक काल में श्रुति प्रमाण को ही सबसे ऊँचा रखा जाता था। वेदों के बाद दूसरा महत्व पुराणों का है। जो धर्म वेदों में बताया गया है, वही धर्म पुराणों में होना चाहिए। तभी वह मान्य है। अन्यथा वह धर्मग्रंथ नहीं है।
लेकिन आज ऐसा हो गया है कि जो धर्म के मूल ग्रंथ हैं, वेद, और उनमें भी वेदों के सर्वोच्च शिखर उपनिषद, हमने धर्म में उन्हें बहुत नीचा स्थान दिया है। जबकि पुराणों को ऊँचा रखा है। जिससे यह वैदिक धर्म भ्रष्ट हो चुका है।
वेदों का जो धर्म है, वह दर्शन के आधार पर है। लेकिन आज जो लोकधर्म है, वह मान्यता या कामना के आधार पर है, जो कि अंधविश्वास है। लोग मानते हैं कि ऐसी-ऐसी पूजा करने से उन्हें कुछ मिल जाएगा, कामना पूरी हो जाएगी, इत्यादि। इन सारे कर्मकांडों का कारण अंधविश्वास है।
वास्तव में धर्म इसलिए नहीं होता कि आपकी कोई कामना पूरी हो जाए। नहीं, धर्म आपके भीतर की हालत को ठीक करने के लिए होता है। धर्म सिर्फ इसलिए है कि चेतना को जड़ता से ऊपर उठाया जा सके। जो चेतना मूलाधार में ही रहती है, उसे उच्चतम आयामों में लाया जा सके।
यही धर्म का मुख्य दर्शन है। यहाँ अंधविश्वास के लिए कोई जगह नहीं है। यही वास्तव में सनातन धर्म है।
लेकिन जो लोकधर्म है, वह केवल मान्यताओं की उपज है। वह सनातन धर्म नहीं हो सकता। मन कभी एक जैसा नहीं रहता। जो आप आज मानते हैं, कल आपकी धारणा बदल जाएगी। जो आप आज करते हैं, वह कल नहीं करेंगे।
लेकिन धर्म तो वह होता है जो सनातन है, जो सदा रहने वाला है।
हम बात कर रहे हैं कि सनातन धर्म में इतना अंधविश्वास क्यों है। लेकिन वास्तव में अगर आप सनातन धर्म को जानेंगे, इसके दर्शन को समझेंगे, तो आप पाएँगे कि जो लोग कर रहे हैं, मान रहे हैं और उसे धर्म कह रहे हैं, वह सनातन धर्म तो है ही नहीं। वे लोग धर्म के विषय में भ्रमित हो चुके हैं।
क्योंकि हम ठीक से समझते नहीं हैं, गहराई से जानते नहीं हैं। हमें ज्ञान नहीं होता, तो हमें कोई कुछ भी बोलता है, हम उसे सही मान लेते हैं। अगर जानते होते, तो झूठ को सच मान ही नहीं सकते।
धर्म की आवश्यकता क्यों है?
इतना तो आप जानते हैं कि जो धर्म के नाम पर चल रहा है, उसमें से आधे से ज़्यादा तो ऐसा है, जो वास्तविक सनातन धर्म का विरोधी है। दर्शन का विरोधी अंधविश्वास होता है, जहाँ आप किसी बात को बिना जाने ही कुछ वास्तविक मान लेते हैं।
धर्म आपको इसलिए दिया गया है, ताकि आप मन के स्वरूप को जान सकें। मनुष्य अज्ञानी होने के कारण कैसे स्वयं ही भ्रम को बनाता है और स्वयं ही उसमें जा फँसता है, जिसे हमने बताया कि माया कैसे बनती है।
मनुष्य का मन अगर सही मार्ग पर है, तो वही कल्याणकारी होता है। अन्यथा अपना मन ही शत्रु की तरह व्यवहार करता है। जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में समझाया है कि कैसे मन ही मित्र है और मन ही शत्रु। इस पर कई संतों और दार्शनिकों ने भी कहा है।
ध्यान इसलिए होता है, ताकि आत्मज्ञान को प्राप्त किया जाए। स्वयं को माया से ऊपर उठाया जाए। धर्म ज्ञान का ही दूसरा नाम है। ज्ञान ही माया से मुक्ति देता है, क्योंकि माया कोई वस्तु नहीं होती। वह अज्ञान होता है।
सनातन धर्म उस काल में, आज और भविष्य में भी समान रूप से आवश्यक है। धर्म मानव के लिए है। इसीलिए जब तक इस पृथ्वी पर मानव है, धर्म की आवश्यकता बनी रहेगी। धर्म मानव की चेतना को भौतिकता से ऊपर उठाने के लिए है। आत्मज्ञान, आत्मतृप्ति, संतोष और आध्यात्मिक सुख केवल धर्म से ही प्राप्त हो सकते हैं।
मानव इस ज्ञान के बिना माया में उलझ जाता है। उसका मन आत्मा से दूर भटकता है। यह दुःख का दूसरा नाम है। आत्मा क्या है? अगर आप यह जान लें, तो सुख केवल और केवल मन के आत्मा को समर्पित होने में ही है।
सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ कौन-से हैं?
धर्म में श्रुति प्रमाण ही सर्वोच्च है। श्रुति यानी उपनिषद, जो वेदों के भाग हैं। अगर कोई भी धर्मग्रंथ हो, चाहे वह दुनिया के किसी भी संप्रदाय से हो, अगर वह इस दर्शन के अनुकूल है, तो उसे धर्म में स्थान दिया जा सकता है। लेकिन अगर कोई भी ग्रंथ इसका विरोधाभासी है, तो वह धर्मग्रंथ नहीं है।
जिस धर्म का आधार दर्शन न होकर मान्यता और मन की उपज है, उसे सनातन धर्म नहीं कहा जा सकता।यही परंपरा ब्राह्मणों द्वारा चली आ रही है।
धर्म का आधार केवल ज्ञान ही होना चाहिए। उपनिषद ज्ञान हैं, वे कोई मान्यता या विश्वास नहीं हैं। वे बोधशास्त्र हैं।
पुराणों में आपको यही ज्ञान कथाओं के रूप में प्राप्त होता है। अगर आप पुराणों का सार प्राप्त करें, तो इसी ज्ञान को निकलकर आना चाहिए। अगर आप पुराणों को पढ़ें और उनके मर्म को न जान पाएँ, तो आप अभी भी धर्म को नहीं जान पाए हैं।
और धर्म पर केवल वेद और पुराण ही नहीं हैं। यहाँ कई अन्य ग्रंथ हैं, जैसे भगवद्गीता, जो धर्म के विषयों में शुद्धतम ग्रंथ है। ज्ञान की गंगा है।
और कई संत भी हैं, जैसे कबीर, संत गोरक्षनाथ, संत मीराबाई, संत नामदेव इत्यादि, जिनकी रचनाएँ उनका दर्शन प्रस्तुत करती हैं।
धर्म आपके अंदर पवित्रता लाने के लिए है। आपको इस जीवन में सुखी और शांत रखने के लिए है।
धर्म का मूल क्या है?
जो वास्तविक धर्म है, या कहें कि जो धर्म का मूल है, वह सबसे महत्वपूर्ण है—अपने भीतर का ज्ञान। वह आपकी इंद्रियों और मन के विषयों से अधिक इस बात पर आधारित है कि इंद्रियों और मन के पीछे क्या है, और उसका विषयों से कैसा संबंध है। इसे आप मनोविज्ञान कहें या जागरूकता या चेतना—यह ज्ञान है। आपको माया से निकालकर ज्ञान में स्थापित करना, बोधपूर्ण बनाना ही इसका उद्देश्य है।
जब आप मन और उसकी प्रकृति से बोधपूर्ण हो जाते हैं, तब आप अपने भीतर की वास्तविक स्थिति को समझने लगते हैं। जो आपको धर्मत्व की ओर ले आता है। बिना जाने कोई धार्मिक नहीं हो सकता।