भगवान कृष्ण, गुरु नानक, संत कबीर और ऐसे अनेक महापुरुषों ने मन को बुद्धि के अधीन रखना अत्यंत आवश्यक बताया है। लेकिन प्रश्न यह है कि मन को अधीन रखना इतना आवश्यक क्यों है और हमारे जीवन में इसका वास्तविक महत्व क्या है?
कैसे व्यक्ति का ‘मन ही मित्र है, मन ही शत्रु है’?
कैसे आप जाने-अनजाने में ऐसा जीवन जीने लगते हैं कि आपका अपना ही मन आपका शत्रु बन जाता है? ऐसा कैसे होता है कि वही मन, जो आपके सुख, शांति और प्रगति का साधन बन सकता था, वही आपके दुःख, अशांति और पतन का सबसे बड़ा कारण बन जाता है? वास्तव में मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसका सबसे निकट का साथी ही उसका सबसे बड़ा विरोधी बन जाता है।
लेकिन मन का शत्रु बन जाना ही उसकी अंतिम सच्चाई नहीं है। यही मन आपका सबसे अच्छा मित्र भी बन सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मन आपका स्वामी है या आपका सेवक। यदि मन आपको चलाता है, तो वह आपका शत्रु बन जाता है; और यदि आप विवेकपूर्वक मन का संचालन करते हैं, तो वही मन आपका सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इसलिए मन का स्वभाव एक जैसा नहीं रहता, बल्कि उसे जिस दिशा में ले जाया जाता है, वह उसी दिशा में कार्य करता है।
मन पर विजय प्राप्त करने और उसे अपने नियंत्रण में रखने की शिक्षा केवल भगवद्गीता में ही नहीं मिलती; संसार के अनेक महापुरुषों ने भी अपने-अपने शब्दों में इसी सत्य को व्यक्त किया है। वे भले ही अलग-अलग भाषाओं और परंपराओं में रहे हों, लेकिन अंततः उन्होंने मानवता को यही संदेश दिया कि सबसे पहले स्वयं पर विजय प्राप्त करो।
जैसा कि गौतम बुद्ध ने कहा है:
“यदि कोई व्यक्ति युद्ध में लाखों लोगों को जीत ले, तब भी सबसे महान विजेता वही है जिसने स्वयं पर विजय प्राप्त कर ली है।”
इस कथन का अर्थ अत्यंत गहरा है। संसार को जीत लेना उतना कठिन नहीं है, जितना अपने भीतर उठने वाली इच्छाओं, तृष्णाओं, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय प्राप्त करना। बाहरी विजय केवल परिस्थितियों पर होती है, जबकि आंतरिक विजय अपने ही मन पर होती है। यही कारण है कि सभी महात्मा सबसे पहले अपने भीतर देखने की प्रेरणा देती हैं। गुरु नानक कहते है “यदि मन को जीत लिया, तो जगत को जीत लिया।”
यदि कोई मनुष्य वास्तव में जीवन में ऊँचाइयों तक पहुँचना चाहता है, यदि वह अपने जीवन को सार्थक, शांत और आनंदमय बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपने मन को समझना होगा और उस पर विजय प्राप्त करनी होगी।
क्योंकि जीवन का प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक कर्म और प्रत्येक दिशा अंततः मन से ही उत्पन्न होती है। यदि मन सही दिशा में है, तो जीवन भी सही दिशा में आगे बढ़ता है; और यदि मन भटक जाता है, तो मनुष्य का संपूर्ण जीवन भी भटक सकता है।आखिर कौन अपने जीवन को निरर्थक बनाना चाहेगा? प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सफलता, सम्मान, शांति और आनंद चाहता है।
लेकिन इन सबका आधार बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मन की अवस्था होती है। यदि मन अस्थिर है, तो बाहरी उपलब्धियाँ भी सुख नहीं दे सकतीं।
मन का स्वभाव कैसा हैं?
मन का स्वभाव अत्यंत विचित्र है। जिस भी वस्तु, व्यक्ति, विचार या आदत से यह जुड़ जाता है, उसी में उलझा रहता है। फिर उसे वहाँ से हटाना आसान नहीं होता। मन बार-बार उसी विषय की ओर दौड़ता है, उसी का चिंतन करता है और उसी में सुख खोजने लगता है। यही कारण है कि कई बार व्यक्ति जानता है कि कोई आदत उसके लिए हानिकारक है, फिर भी उसे छोड़ नहीं पाता।
समस्या यह नहीं है कि मन किसी चीज़ से जुड़ जाता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मन ऐसी चीज़ों से जुड़ जाता है, जो जीवन को सार्थक बनाने के बजाय निरर्थक बना देती हैं।
उदाहरण के लिए, जुआ इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। जुए में फँसा हुआ व्यक्ति जानता है कि यह उसकी धन-संपत्ति, परिवार, सम्मान और भविष्य को नष्ट कर सकता है, फिर भी उसका मन बार-बार उसी की ओर आकर्षित होता है। यही मन का बंधन है। इसी प्रकार अनेक ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं, जो केवल व्यक्ति का ही जीवन नष्ट नहीं करतीं, बल्कि समाज, मानवता और यहाँ तक कि प्रकृति को भी हानि पहुँचाती हैं।
जब मन ऐसी आसक्तियों में फँस जाता है, तो उसका परिणाम केवल व्यक्तिगत हानि तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचता है। व्यक्ति का अनियंत्रित मन केवल उसका ही शत्रु नहीं बनता, बल्कि अनेक लोगों के दुःख का कारण भी बन जाता है।
जब मन मित्र बन जाता है तब क्या होंगा?
इसके विपरीत, यदि कोई धर्मनिष्ठ व्यक्ति अपने मन को अपना सेवक बना ले, तो वही मन उसके जीवन का सबसे बड़ा सहायक बन जाता है। ऐसा व्यक्ति मन की प्रत्येक इच्छा के पीछे नहीं भागता, बल्कि अपनी विवेक-बुद्धि के अनुसार कार्य करता है। उसका जीवन केवल क्षणिक स्वार्थी सुखों के लिए नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और कल्याण के लिए समर्पित होता है।
ऐसा व्यक्ति स्वयं का उद्धार करता है और उसके कर्म समाज तथा पृथ्वी के लिए भी हितकारी बनते हैं। उसके भीतर संयम होता है, इसलिए उसके निर्णय संतुलित होते हैं। उसके भीतर विवेक होता है, उसके भीतर स्थिरता होती है, इसलिए कठिन परिस्थितियों में भी वह सही मार्ग से विचलित नहीं होता। यही वह अवस्था है, जहाँ मन शत्रु नहीं, बल्कि सबसे विश्वसनीय मित्र बन जाता है। जब वह जीवन की सार्थक करने की यात्रा म बाधा न बनें।
मन पर नियंत्रण कठिन क्यों है?
भगवान श्रीकृष्ण मन को भली-भाँति जानने वाले है, इसलिए उन्होंने यह नहीं कहा कि मन को नियंत्रित करना आसान है। इसके विपरीत, उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि मन अत्यंत चंचल है। यह एक स्थान पर टिकना नहीं चाहता। हमने चर्चा की है कि मन व्याकुल क्यों होता हैं, और सही कर्म करने से विचलित क्यों हो जाता हैं।
इसी कारण मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन प्रतीत होता है। लेकिन कठिन होने का अर्थ यह नहीं कि यह असंभव है। यदि ऐसा होता, तो भगवान श्रीकृष्ण मन को अनुशासित करने का मार्ग ही न बताते, लेकिन उन्होंने बताया हैं, इसके लिए उन्होंने योग को एक प्रभावी साधन बताया।
जब योग, ध्यान, सजगता और समाधि के माध्यम से मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है, तब उसकी चंचलता भी कम होने लगती है। तब मन बाहरी विषयों का दास नहीं रहता, बल्कि विवेक के मार्गदर्शन में कार्य करने लगता है।
हमने एक अन्य लेख में विस्तार से चर्चा की है कि ध्यान जीवन के लिए कितना आवश्यक है और यह मन को स्थिर करने में किस प्रकार सहायता करता है।
जीवन पर मन का प्रभाव क्या प्रभाव हैं?
मनुष्य का संपूर्ण जीवन उसके मन की दिशा पर निर्भर करता है। जैसा मन होगा, वैसी ही सोच होगी; जैसी सोच होगी, वैसे ही कर्म होंगे; और जैसे कर्म होंगे, वैसा ही जीवन बन जाएगा।
जिस व्यक्ति का मन अहंकार में मोहित हो जाता है, उसकी सोच भी उसी दिशा में चलने लगती है। वह बार-बार उन्हीं विषयों के बारे में सोचता है, जिनका उद्देश्य केवल शारीरिक सुख, इंद्रिय-भोग या अहंकार की तृप्ति होता है। धीरे-धीरे उसके निर्णय भी इन्हीं बातों से प्रभावित होने लगते हैं।
ऐसी अवस्था मनुष्य के भीतर की पशुता को प्रकट करती है। मनुष्य भी एक जीव है, एक पशु है, लेकिन उसे अन्य पशुओं से विशेष बनाने वाली उसकी विवेक-बुद्धि है। यही बुद्धि उसे सही और गलत का निर्णय करने की क्षमता देती है। यही क्षमता मानव सभ्यता के विकास का आधार रही है। इसी के कारण मनुष्य ने ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और समाज का निर्माण किया है।
लेकिन जब मनुष्य विषयों के आकर्षण में अत्यधिक मोहित हो जाता है, तब उसकी विवेक-बुद्धि धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। उस समय निर्णय बुद्धि नहीं करती, बल्कि मन करने लगता है। जहाँ मन आकर्षित होता है, मनुष्य उसी दिशा में चल पड़ता है। वह यह भी नहीं सोचता कि उसका यह कर्म सही है या गलत, हितकारी है या विनाशकारी।
फलस्वरूप उसका व्यवहार भी पशु के समान होने लगता है। वह केवल तत्काल मिलने वाले सुख के पीछे भागता है और दूरगामी परिणामों की उपेक्षा कर देता है। यही वह अवस्था है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर की श्रेष्ठता को खोने लगता है।
इसके विपरीत, जब मन विवेक के मार्गदर्शन में रहता है, तब मनुष्य अपने जीवन को सही दिशा में ले जाता है। वह अपने निर्णय केवल इच्छाओं के आधार पर नहीं, बल्कि सत्य, बुद्धि और कल्याण के आधार पर करता है। ऐसी अवस्था में मन उसका विरोधी नहीं रहता, बल्कि उसकी प्रगति का सबसे बड़ा सहायक बन जाता है।
निष्कर्ष,
इसलिए यह कहना उचित होगा कि मन स्वभाव से न मित्र है और न शत्रु। वह वैसा ही बन जाता है, जैसा अभ्यास हम उसे कराते हैं। यदि मन विषयों, आसक्तियों और अहंकार के पीछे चलता है, तो वह हमें पतन की ओर ले जाएगा। और यदि वह विवेक, संयम और योग के मार्गदर्शन में रहता है, तो वही मन हमें आत्म-विकास, शांति और सार्थक जीवन की ओर ले जाएगा।