अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप कहाँ देखा था?
अर्जुन को जब भगवान कृष्ण ने अपना विश्वरूप दिखाया था, तब अर्जुन बहुत भयभीत हो गया था। और भगवान का गुणगान करने लगा और विनती करने लगा कि वो उसपर कृपा करें। इसे हम भगवत गीता में पढ़ते है।
लेकिन आज बहुत लोग नहीं जानते कि अर्जुन ने भगवान विश्वरूप का दर्शन कैसे किया था, तब उसने उसे अपनी आँखों से नहीं देखा था। लोगों को लगता है कृष्ण अर्जुन के समक्ष ने उस कुरुक्षेत्र में ही अपना विश्वरूप प्रकट किया था।
आप कैसे मान सकते हैं कि भगवान का विश्वरूप, जहाँ से अनगिनत ब्रह्मांडों का जन्म होता है, जो अनेकों ब्रह्मांडों का भी आधार है, वो इस ब्रह्मांड में आ जाए, इस पृथ्वी पर तो महाप्रलय क्यों नहीं आया?
असली बात ये नहीं कि अर्जुन ने भगवान के विश्वरूप के दर्शन किए थे। बल्कि ये है कि वो विश्वरूप कहाँ था? अर्जुन ने उसे कहाँ देखा, आकाश में या कहाँ? असल में वो भगवान का विश्वरूप इस पृथ्वी पर या आकाश में या इस ब्रह्मांड में नहीं था। इसका उत्तर हमें उपनिषदों से मिलता है। और आप चौंक जाएंगे ये जानकर कि अर्जुन के सामने भगवान नहीं प्रकट हुए थे, बल्कि अर्जुन भगवान के समक्ष उपस्थित हुआ था।
जैसे अगर आपको केदारनाथ के दर्शन करने हैं, तो आपको जाना पड़ेगा हिमालय। अगर भोपाल में कोई इंसान कहता है कि मैंने केदारनाथ धाम के दर्शन किए, तो यही दिमाग में आता है, ये भोपाल से वहाँ हिमालय में गए होंगे। केदारनाथ का मंदिर खुद भोपाल नहीं आया था।
अर्जुन ने भगवान तक की जो यात्रा की, वो कोई ऐसी यात्रा नहीं है जैसे आप पृथ्वी पर यात्रा करते हैं, एक जगह से दूसरी जगह। अर्जुन का शरीर वही था उस रथ में। वो अज्ञान से ज्ञान तक की यात्रा थी। भगवद्गीता के जो इससे पहले के अध्याय हैं, वही अर्जुन की यात्रा है और अर्जुन अकेला नहीं जा रहा, वो कृष्ण का हाथ पकड़ के यात्रा कर रहा है। उसमें कृष्ण गुरु हैं और अर्जुन उनके शिष्य।
इसे ऐसा समझिए कि माता-पिता अपने बच्चे को हाथ पकड़कर केदारनाथ ले जाते हैं और उसे केदारनाथ धाम के दर्शन होते हैं। लेकिन वहाँ कृष्ण अर्जुन को अपने से ही मिलाने ले जा रहे हैं। अर्जुन को कृष्ण ही कृष्ण से मिलाने ले जाते हैं।
अर्जुन की ज्ञान-यात्रा की शुरुआत
इस ज्ञान यात्रा के आरंभ में अर्जुन अपने संबंधियों के पास था। अपने आचार्य द्रोण, भाई कौरव और पितामह, वो वहाँ इनके शुभचिंतक के रूप में था। इसलिए उसने अपने भी हथियार डाल दिए थे। वो नहीं मारना चाहता था। कहता था कि “ये मेरे अपने हैं, मैं अपनों पर बाण नहीं चला सकता।”
अर्जुन की हालत तब वैसी थी क्योंकि वो मोहित था। उसे सगे संबंधियों से मोह था। भले ही उन्होंने बुराई का साथ देना चुना था, लेकिन अर्जुन धर्म और अधर्म ये सब नहीं देख रहा था। वो अपने सगे-संबंधियों देख रहा था।
अर्जुन की ऐसी जो हालत थी, वो सिर्फ उसकी ही नहीं थी। वो हम सबकी होती है। यानी ज्यादातर लोगों की।
आप देख सकते हैं कि अगर कोई इंसान कुछ बुरा करता है, कुछ गलत करता है, तो उसके माता-पिता या उसके भाई-दोस्त ये नहीं देखते कि उसने गलत किया है। वो ये देखते हैं कि वो हमारा है और इसलिए वो उसका ही साथ देते हैं।
बुरा करने वाला तो पापी होता ही है, लेकिन वो भी उतना ही पापी होता है जो उसका साथ देता है, उसका सगा-संबंधी। अर्जुन ये नहीं देख रहा था कि आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म इत्यादि दुर्योधन के साथ खड़े होकर अधर्म का साथ दे रहे हैं।
वो ये देख रहा था कि ये तो अपने हैं। और इस कारण अर्जुन अगर युद्ध नहीं करता, तो वो अपने चारों पांडव भाइयों के साथ और जो इस युद्ध में उसका साथ दे रहे थे, उनके भी साथ गलत कर रहा था, क्योंकि वो तो तैयार थे। युद्ध करने के लिए वो नहीं देख रहे थे सगे-संबंधी, हाँ, वो देख रहे थे कि दुर्योधन की सेना में है, तो अभी शत्रु है। और शंखनाद हो भी चुका था। सारे पांडव भाइयों ने शंख बजा दिए थे।
और उसके बाद अर्जुन ने युद्ध न करने का निर्णय लिया। वो शुरू हुए युद्ध से भाग रहा था, जहाँ उसके भाइयों की जान भी खतरे में थी।
अर्जुन ये जो कर रहा था, बहुत गलत था। वो भी अधर्म का साथ देने के कारण अधार्मिक हो चुका था और इसीलिए वो दुखी था।
अर्जुन की यात्रा: अधर्म से धर्म की ओर
वहाँ से शुरू हुई अर्जुन की यात्रा, जो उसे भगवान के विश्वरूप तक ले गई। अर्जुन को अधर्म से धर्म की ओर ले गई। बंधन से मुक्ति की ओर ले गई।
विश्वरूप के सामने अर्जुन का अहंकार
भगवान का विश्वरूप देख अर्जुन भयभीत होता है। क्योंकि यही वो समय था, जब अर्जुन का अहंकार टूट रहा था। उसका “मैं” ज्ञान के प्रकाश में खोने वाला था। जब अहंकार समाप्त होने लगता है, तो इंसान को बहुत डर लगता है। मन बहुत घबरा जाता है। क्योंकि ज्ञान की अग्नि उसे जलाना शुरू कर देती है।
भगवद्गीता वो ज्ञानअग्नि है। उसने अर्जुन का अहंकार जला कर खत्म कर दिया था। अर्जुन के “मैं” की जगह “भगवान” ने ली थी।
पहले जब अज्ञानी था, दुख में था, तब बोल रहा था “मैं”, “मैं”, मेरे अपने, मेरे आचार्य द्रोण, मेरे पितामह भीष्म। मगर जब बोधपूर्ण हुआ तब भगवान, भगवान बोलने लगा। भगवान आप ही हैं।
विश्वरूप में संपूर्ण विश्व
यही चैतन्य स्वरूप संपूर्ण विश्व का आधार है। सभी जीव-जंतु, पशु-पक्षी और मानव और देवता, दैत्य भी भगवान के अंश हैं उनका जन्म, जीवन और मृत्यु इस विश्वरूप में है। ऐसा कुछ नहीं जो इससे अलग हो। तो अर्जुन भगवान के विश्वरूप से अलग कैसे हो सकता है कि एक तरफ अर्जुन खड़ा है और दूसरी तरफ भगवान का विश्वरूप? अर्जुन भी तो विश्व में है।
जब अर्जुन कहता है कि। हे विश्वरूप, सब आपमें समाया है। मैं आपमें अनेकों सूर्य, चंद्र और अनेकों ब्रह्मांडों को देख रहा हूँ। और इसी बात का दूसरा अर्थ ऐसा भी होता है कि अर्जुन ऐसा भी कह रहा है कि ‘मेरे संसार के साथ मैं भी आपमें हूँ। या जो कुछ भी जाना जा रहा है आप ही है।”
जिसे अर्जुन “मैं” कहता था, “मैं” मानता था, वो झूठ था। लेकिन जब सत्य से सामना हुआ, तब संसार और संसारी उस दिव्य सत्ता में विलीन होने लगे।
क्या भगवान के विश्वरूप का चित्र बनाया जा सकता है?
भगवान का विश्वरूप कैसा था, आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते। हमें इसके बहुत चित्र मिलते हैं। बहुत कलाकारों ने भगवान के विश्वरूप के चित्र बनाए हैं। लेकिन सत्य ये है कि कोई भी कलाकार भगवान के विश्वरूप का चित्र नहीं बना सकता। जो बनाया है, वो बस कलाकारों की कल्पनाएँ हैं।
विश्वरूप के दर्शन की ज्ञान-यात्रा
अगर वास्तव में कोई भक्त भगवान के विश्वरूप के दर्शन करना चाहता है, तो उसे ये ज्ञान-यात्रा करनी होगी जो अर्जुन ने की थी, जो अहंकार से शुरू होकर इससे मुक्ति तक जाती है। “मैं” से भगवान तक जाती है। मैं का भगवान में विलीन होना ही भगवत्ता है। यही यात्रा आत्म-अज्ञान से आत्म-ज्ञान की यात्रा है। मृत्यु से अमरत्व की यात्रा है।
इसपर सिर्फ पैरों से चलना काफी नहीं। आपको बुद्धि से भी चलना है, आपके विवेक से जो सही है उसे चुनना है, अधर्म को नहीं चुनना। ज्ञान से ऊपर माया के क्षणिक सुखों को नहीं रखना। और उसमें आपकी सद्बुद्धि आपके बहुत काम आएगी। भगवान के इस परम स्वरूप की तुलना पूरे ब्रह्मांड से भी नहीं की जा सकती। इसीलिए आपको संसार को नहीं चुनना, भगवान को चुनना है। आत्मा के सत्य की यात्रा करनी है।
साधकों, उम्मीद है आपको इस लेख से कुछ नई सीख मिली होगी। और यहाँ तक मेरे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद।