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‘सा विद्या या विमुक्तये’ श्लोक, अर्थ और उपदेश (विष्णुपुराण 1.19.41 )

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महावाक्य सुना होगा क्योंकि इसका आध्यात्मिक ज्ञान में कि इस के लिए अत्यंत महत्व है। वास्तव में विद्या वह है जो इंसान के मुक्ति दे, भीतर से पवित्रता लाए जागरूक करें।

जब तक मनुष्य अपने भीतर की अज्ञानता को नहीं पहचानता, तब तक वह चाहे कितनी भी विद्याएं अर्जित कर ले, उसका मन शांत नहीं होता, मन व्याकुल रहता है और मन विचलित होता है

और इसके संबंधी कथा है भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु, जो हमें यह सिखाती है कि सच्चा ज्ञान बाहरी उपलब्धियों में नहीं बल्कि आत्म-साक्षात्कार में छिपा है जिसमें आत्म-अवलोकन और मनुष्य अपने को ही जानता है भीतर से ।

हम जानेंगे लेकिन सबसे पहले यह जान लेते है कि अर्थ क्या है और यह पूर्ण श्लोक क्या कहता है,

“सा विद्या या विमुक्तये” श्लोक, अर्थ और उपदेश

विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय 19 में है,

विद्याबुद्धिरविद्यायामज्ञानात्तात जायते । (1.19.40)

तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ॥ (1.19.41)

अर्थ : अज्ञान के कारण मनुष्य अज्ञान को ही विद्या समझ बैठता है। कर्म वह जो बंधन का कारण न बने, विद्या वह जो मुक्ति दिलाए, इसके अतिरिक्त कर्म केवल श्रम है और अन्य विद्या केवल कला-कौशल है।

व्याख्या : जब इंसान को यह ज्ञान नहीं होता कि शरीर क्या है मन क्या है। तब वह सांसारिक ज्ञान को ही सबसे ऊंचा मानता है प्रह्लाद इसे अज्ञान कहते है, क्योंकि जब इंसान आत्म को नहीं जानता वह वह मिथ्या को धारण करता है इसे आप विस्तार से पढ़ सकते जा कि मन क्यों भटकता है। वह मानता है कि जो मेरे इंद्रियों का विषय है वह मैं हूं। यह अज्ञान है कि तुम्हे पवित्रता की जगह अपवित्रता और भ्रम को अपना स्वरूप मान लिया।

‘विद्याबुद्धिरविद्यायामज्ञानात्तात जायते’ जब इंसान को स्व का ज्ञान नहीं होता, वह आत्मजागरूक नहीं होता तो संसार की हजार तरह की बाते उसे मोहित करती है। वह सत्य को न जाने मिथ्या में व्यर्थ जीवन कर देता है।

इस बुद्धि को शास्त्रों में ‘अविद्या-जनित बुद्धि’ कहा गया है। यह बुद्धि हमें बताती है कि शरीर ही सब कुछ है, धन-संपत्ति ही सुख का स्रोत है, और भोग-विलास ही जीवन का लक्ष्य है। इसी भ्रम में पड़कर मनुष्य दिन-रात दौड़ता रहता है, परन्तु भीतर की शांति उसे कभी नहीं मिलती। जैसे प्यासा व्यक्ति मृगतृष्णा के पीछे भागता है, वैसे ही अज्ञानी मन बाहरी वस्तुओं में सुख ढूंढता रहता है, जबकि सच्चा सुख आत्मा के भीतर ही स्थित है।

कर्म का इंसान पर बंधन होता है, जब वह अपने केंद्र को जाने बिना कर्म में प्रवृत्त होता है केवल देह की वासना या कामना तृष्णा, वह कर्म करता है जो उसका बंधन है। ऐसा व्यक्ति मन का दास होता है उसका अपना मन उसके लिए शत्रु जैसा व्यवहार करता है। अगर आप जानते है कि कैसे मन ही मित्र है मन ही शत्रु। जब कृष्ण अर्जुन को गीता मे कर्मयोग का उपदेश देते है वे कामना से प्रेरित स्वार्थपूर्ण कर्म को बहुत निचला बताते हैं। इसके विपरीत, निष्काम भाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बल्कि मुक्ति का मार्ग बनता है, क्योंकि उसमें कर्ता का अहंकार नहीं होता, केवल कर्तव्य-भाव होता है।

इसके बाद प्रह्लाद ने कहा कि विद्या वही है जो इंसान को मुक्त करे यानि आत्मज्ञान । यानि जिसे अज्ञानी लोग विद्या कहते है वह केवल आत्मज्ञान का आभाव है। इस दृष्टि से देखें तो जितनी भी लौकिक शिक्षाएं हैं — चाहे वह वाणिज्य हो, विज्ञान हो, कला हो या शिल्प — वे सब अपनी-अपनी जगह उपयोगी हैं, परन्तु उन्हें अंतिम साध्य नहीं माना जा सकता। वे साधन हैं, साध्य नहीं। साध्य तो केवल वह ही है — आत्मा का ज्ञान, जिससे मनुष्य जीव के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है।

“सा विद्या या विमुक्तये” भक्त प्रह्लाद ने क्यों कहा?

प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, लेकिन उसका पिता हिरण्यकशिपु तो विष्णु को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता था। अब वो अपने पुत्र से साधारण पिता जैसा व्यवहार कैसे करेगा। वह अपने पुत्र को दो विकल्प देता कि एक तो विष्णु को भजना छोड़ दो और जीवित रहो नहीं तो मृत्यु दंड के लिए तैयार हो जाओ क्योंकि वहां किसी का विष्णु का भक्त होना पाप था, अगर आप हिरण्यकशिपु से भी ऊपर किसी को रखते है तो आपको बड़ा दंड दिया जाएंगा।

लेकिन प्रह्लाद तो जानता था कि विष्णु की तुलना पूरे संसार से नहीं। अब वो विष्णु को कैसे छोड़ेगा। तो हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मृत्युदंड देने का निर्णय लिया और उसने कई प्रयास किए — कभी विष के प्रयोग से, कभी हाथियों के पैरों तले कुचलवाकर, कभी अग्नि में डलवाकर — लेकिन प्रह्लाद के भाग्य में कुछ और ही लिखा था,

क्योंकि जिसकी रक्षा स्वयं नारायण करें उसे कौन मार सकता है। सारे प्रयास विफल होने के बाद हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से एक चर्चा शुरू करता हैं, यह सोचकर कि शायद तर्क और शिक्षा के बल पर वह अपने पुत्र का मन बदल सके। उस चर्चा में प्रह्लाद से मुख एक बात निकल के आती है कि “सा विद्या या विमुक्तये” यानि “विद्या वही है जो मानव को मुक्त करे।”

हिरण्यकशिपु की सत्ता में वहां छात्रों को कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं दिया जा रहा था बल्कि नीति शास्त्र पढ़ाया जाता है जिसके मुख्य चार स्तंभ थे साम, दाम, दंड और भेद। यह मानव का शोषण के लिए था। प्रह्लाद इसका विरोध करता है कहता है कि यह विद्या नहीं; सीख है।

अज्ञानी व्यक्ति अज्ञान को ही ज्ञान समझने की भूल करता है जैसे कि छोटे बच्चे जुगनू को अग्नि मानते है। वे वास्तव में अज्ञान के अंधकार में ही जी रहे होते हैं, भले ही बाहर से वे कितने ही विद्वान क्यों न कहलाते हो।

प्रह्लाद का यह कथन केवल अपने पिता के प्रति विरोध नहीं था, बल्कि एक सनातन सत्य की उद्घोषणा थी। वह यह दिखाना चाहते थे कि सच्ची शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को बाहरी सफलता तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसे भीतर से स्वतंत्र करना है — भय से, अहंकार से, आसक्ति से और मृत्यु के भय से भी। यही कारण है कि यह श्लोक आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस युग में था, क्योंकि आधुनिक शिक्षा-प्रणाली भी अक्सर केवल सूचना और कौशल तक सीमित रह जाती है, आत्म-ज्ञान की ओर उसका ध्यान बहुत कम जाता है।

इससे मिलता जुलता एक और श्लोक है मुण्डक उपनिषद् में जिसमें अंगिरा ऋषि शिष्य शौनक को परा विद्या और अपरा विद्या का अंतर समझाते है। वहां भी यही बताया गया है कि वेद, व्याकरण, ज्योतिष आदि सभी विद्याएं अपरा विद्या हैं, जबकि जिस विद्या से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है वह परा विद्या कहलाती है। इस प्रकार वेदों से लेकर पुराणों तक, और उपनिषदों से लेकर भक्तों संतो तक — यह एक ही सत्य बार-बार दोहराया गया है कि विद्या का या कर्म का, जीवन का चरम लक्ष्य मुक्ति ही है।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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