मन विचलित हो जाता है जब हम कोई कार्य हाथ में लेते हैं, पर उस पर एकाग्र होकर काम नहीं कर पाते। ऐसा लगता है कि हम उस कार्य को करना तो चाहते हैं, किन्तु मन ही बीच में बाधा बन जाता है।
आख़िर हमारा मन विचलित क्यों होता है?
मन की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वह उसी ओर जाता है, जहाँ उसकी रुचि और संस्कार होते हैं। जिस कार्य में मन को आकर्षण नहीं मिलता, वहाँ वह अधिक देर तक टिक नहीं पाता। आपका थोड़ा-सा भी ध्यान उस कार्य से हटेगा, तो आप पाएँगे कि आपकी एकाग्रता लगभग समाप्त हो गई है।
यही कारण है कि केवल इच्छा कर लेने से मन किसी कार्य में स्थिर नहीं हो जाता। जब तक भीतर उस कार्य के प्रति स्वाभाविक लगाव और अभ्यास विकसित नहीं होता, तब तक मन बार-बार दूसरी दिशाओं में भटकता रहता है।
मान लीजिए, कोई व्यक्ति जिसने जीवन में कभी जप नहीं किया और आप उसे कोई मंत्र देकर कहें कि इसका जप करो, तो क्या वह सहजता से कर पाएगा?
संभवतः नहीं। प्रारम्भ में उसका मन कुछ क्षण मंत्र पर टिकेगा और फिर किसी अन्य विचार की ओर चला जाएगा। वह बार-बार प्रयास करेगा, पर उसे लगेगा कि मन उसके कहे अनुसार चल ही नहीं रहा। इसका कारण यह नहीं कि वह व्यक्ति अयोग्य है, बल्कि यह है कि उसके मन ने अभी तक जप का संस्कार ग्रहण ही नहीं किया है।
इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति की पढ़ने में रुचि नहीं है और आप उसे कोई पुस्तक पढ़ने के लिए दें, तो संभव है कि वह पुस्तक पढ़ भी ले। किन्तु जब उससे पूछेंगे कि उसने क्या समझा, तो शायद वह कुछ विशेष न बता पाए। कारण यह है कि पढ़ते समय उसका मन बार-बार भटकता रहा और वह पढ़ने में पूरी तरह उपस्थित नहीं था। आँखें शब्दों को पढ़ रही थीं, किन्तु मन किसी और दिशा में चल रहा था। इसलिए पढ़ लेने के बाद भी विषय का सार उसके भीतर नहीं उतर पाया।
इसलिए आपकी वास्तविक समस्या केवल मन का विचलित होना नहीं है। समस्या यह है कि जिस कार्य को आप करना चाहते हैं, उसमें अभी मन की रुचि और संस्कार विकसित नहीं हुए हैं। जब तक रुचि और अभ्यास उत्पन्न नहीं होते, तब तक मन को किसी भी कार्य में स्थिर रखना कठिन प्रतीत होता है।
मन अपने संस्कारों के अनुसार ही चलता है। यदि किसी व्यक्ति को वीडियो गेम खेलने में रुचि हो और अचानक उसे टेनिस खेलने के लिए कहा जाए, तो उसे वह खेल नीरस लगेगा। उसका मन बार-बार वीडियो गेम की ओर जाएगा, इसलिए वह टेनिस में मन नहीं लगा पाएगा। इसके विपरीत यदि वह प्रतिदिन कुछ समय टेनिस खेले, तो धीरे-धीरे उसी में भी रुचि विकसित होने लगेगी। अर्थात मन जिस दिशा में बार-बार जाता है, उसी दिशा के संस्कार धीरे-धीरे गहरे होते जाते हैं।
इसी प्रकार जीवन के प्रत्येक कार्य में मन का यही स्वभाव दिखाई देता है। जिस विषय में अभ्यास अधिक होता है, मन उसी की ओर सहजता से चला जाता है। और जिस कार्य का अभ्यास नहीं होता, उसमें मन को टिकाने के लिए बार-बार प्रयास करना पड़ता है। इसलिए मन का भटकना असामान्य नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
विचलित मन को शांत करने का कोई उपाय हैं?
विचलित मन को शांत करने का उपाय है कि आप उसे जानिए, न कि उसकी प्रत्येक कामना को पूरा होने दें। लेकिन यदि वह बहुत अधिक व्याकुल करने लगे, तो उसे दबाने का प्रयास भी न करें। उसे जहाँ जाना है, वहाँ जाने दें, किन्तु उसमें पूरी तरह तल्लीन भी न हो जाएँ।
केवल साक्षीभाव से देखते रहें कि मन किस ओर जा रहा है और क्यों जा रहा है। जब आप मन को देखने लगते हैं, तब धीरे-धीरे उसके चलने का ढंग भी समझ में आने लगता है।
इस प्रकार निरंतर अभ्यास से मन धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगता है। यह परिवर्तन एक ही दिन में नहीं होता, बल्कि नियमित अभ्यास और सजगता के साथ धीरे-धीरे प्रकट होता है। जितनी बार मन भटकेगा और उतनी ही बार आप उसे बिना क्रोध और बिना निराशा के वापस लाएँगे, उतनी ही उसकी चंचलता कम होती जाएगी।
इसी सत्य को भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं—यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥ (भगवद्गीता 6.26) अर्थ: “जहाँ-जहाँ यह चंचल और अस्थिर मन भटक जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा में ही वश में लाए।”
अर्थात मन का भटकना असामान्य नहीं है। साधना इस बात में नहीं कि मन कभी भटके ही नहीं, बल्कि इसमें है कि जब भी वह भटके, उसे बिना क्रोध, बिना निराशा और बिना संघर्ष के पुनः अपने लक्ष्य की ओर लौटा लिया जाए। यही अभ्यास धीरे-धीरे मन को स्थिर और एकाग्र बना देता है।
भगवद्गीता की यह शिक्षा केवल ध्यान या साधना तक सीमित नहीं है। पढ़ाई, कार्य, व्यवसाय, संबंध और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यही सिद्धांत समान रूप से लागू होता है। जो व्यक्ति बार-बार अपने मन को सही दिशा में लौटाना सीख लेता है, वही धीरे-धीरे अपने जीवन में स्थिरता, एकाग्रता और आंतरिक शांति का अनुभव करता है।
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