ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र
मंत्र के बोल : ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
भगवान कृष्ण को समर्पित इस ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप कर कृष्ण भक्त भगवान श्रीकृष्ण को नमन करते हैं, यानि नमस्कार करते हैं।
भगवान कृष्ण चेतना की परम शुद्धता का स्वरूप हैं जो माया के भ्रमों से पार हैं। कृष्ण को ही वासुदेव भी कहा जाता है — वासु यानि जीवात्मा जैसे आप और मैं, और जो देव इनसे श्रेष्ठ है और उनसे परम् हैं। इसलिए यह कृष्ण के उसी परम स्वरूप का नाम है, जो जीव और सांसारिक मिथ्या से बोधपूर्ण तथा उससे मुक्त हैं।
हम आपको इस शास्त्रीय मंत्र का अध्यात्मिक अर्थ बताने जा रहे हैं, यह साधना आपको कैसे लाभ पहुँचाती है और कृष्ण को नमस्कार करने का वास्तविक अर्थ क्या होता है, यानि इसका जाप कैसे करना है।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का अर्थ और तात्पर्य
ओम: ओम को प्रणव कहा जाता है जो परमात्मा का नाम है और वैदिक मंत्र है। ओम हर देवता के मंत्र में आता है जो यह दर्शाता है कि वे सभी ओम यानि परमात्मा के ही साकार रूप हैं। परमात्मा अर्थात परमतत्व क्या है
और यह ओम क्यों विशेष है, इसकी शिक्षा क्या है, इसपर विस्तारपूर्वक विवेचन अन्य लेखों में उपलब्ध है।
नमो: इसका अर्थ नमन करना होता है। आम भाषा में नमस्कार और नमस्ते, इसका अर्थ बहुत विशेष है जिसपर हमने विस्तारपूर्वक जानकारी दी है। ओम की तरह यह भी मूल रूप से वेदों में पाया जाता है।
भगवते वासुदेवाय: ‘भगवान वासुदेव को’ — आम भाषा में उनको नमस्कार है जो जीवात्मा के देव हैं जिनको जीवात्मा को भजना चाहिए।
अर्थ: परमात्म स्वरूप भगवान वासुदेव को बारंबार नमन।
‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप क्यों करते हैं?
जब आप इस मंत्र के अर्थ को समझते हैं और वासुदेव को भजते हैं, तो वास्तव में आप अर्थात आपकी चेतना दैहिक अहंकार से मुक्ति को उपलब्ध होती है। इसे आध्यात्मिक मुक्ति कहा जाता है, जो सुख और दुख से छूटकर परम आनंद को उपलब्ध होना है।
इस मंत्र में वासुदेव यानि वह जो आपसे, यानि जीवात्मा से परम हैं। इसलिए उन्हें ऐसा कहा गया जो आपसे परम हैं, आप उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते, इसलिए आपको उन्हें प्राप्त होना पड़ता है, जो पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। कृष्ण को प्राप्त होकर ही वास्तव में कृष्ण को पाया जाता है। अन्यथा कोई कितना भी ऊपरी जाप कर ले, वह अज्ञानी से ज्ञानी नहीं हो जाता।
परंतु जब तक आपको ज्ञान नहीं है कि आपके बंधन क्या हैं, तब तक आप कृष्ण का आवाहन कर ही नहीं सकते। आपको बोधपूर्ण होना ही चाहिए कि कृष्ण कौन हैं। अक्सर हम कहते हैं कृष्ण भगवान हैं, ईश्वर हैं, लेकिन आपको इसके गहरे अर्थ को भी समझना चाहिए।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप जब करें तब ऐसा होना चाहिए कि आपने ज्ञान का रास्ता पकड़ लिया है — यह मन का ज्ञान होता है, जिसपर हमने बात की है कि आत्म-अवलोकन क्या है।
इस मंत्र का जाप करते हुए भक्त अपनी अभी की चेतना की हालत से ऊपर उठना चाहते हैं, जिसके लिए अपने विचारों, वृत्तियों और स्व की सांसारिक आसक्ति की पहचान होती है — कि जीव किस तरह उनसे जुड़ा हुआ है, स्व को आगे करके। इसी कारण साधारण सभी लोग अपने को ही श्रेष्ठ मानते हैं, यही उनका बंधन होता है, क्योंकि यह स्व देह और उसकी अस्मिता से बना होता है। इस स्व से मुक्ति की साधना ही भक्ति होती है, और उससे ऊपर ही वासुदेव कृष्ण हैं।
जब कृष्ण को भजते हैं या ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते हैं, तब दृष्टि भीतर होती है। यानि जब दृष्टि बाहर होती है तब भाषा के शब्द, और जब भीतर होती है तब अपने देव का मंत्र।
हमने अन्य लेख में चर्चा की है कि ओम नमो भगवते रुद्राय मंत्र का जाप करते हुए शिवभक्त शिव के प्रचंड भयावह रुद्र रूप के समक्ष उपस्थित होते हैं, जिससे उन्हें निर्भयता और आंतरिक शुद्धता जैसे अनेक अतुलनीय लाभ होते हैं।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय के जाप से लाभ?
इस मंत्र की साधना शुरू करने से ही जीवन में बदलाव होने लगते हैं, और सिद्धि जब होती है तब इसके लाभ अतुलनीय होते हैं, जो आपको भौतिक संसार से मिलना असंभव होता है।
- तनाव और चिंता से मुक्ति: आप दुख के कारण को पहचानते हैं और उसके मूल से ऊपर उठते हैं।
- आंतरिक शुद्धता और स्पष्टता: मंत्र जाप करते हुए भीतर मन के बंधनों को जाना जाता है। सामान्य स्थिति में व्यक्ति उनके साथ तादात्म्य बना लेता है।
- सही जीवन जीने की प्रेरणा या सद्बुद्धि: जीवन की बिगड़ी हालत को सुधारने के लिए मन की शुद्धि चाहिए।
- आध्यात्मिक ज्ञान की ओर जागरूकता: भौतिक स्व का ज्ञान होने लगता है।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय के अतुलनीय लाभ क्या हैं?
जीवनमुक्ति: जीवनमुक्ति वास्तव में तब होती है जब जीवन के बंधनों की जागरूकता होती है, अज्ञान का आवरण नहीं। ऐसा नहीं होता कि जीवन समाप्त हो गया, परंतु जीवन का अर्थ पूरी तरह बदल जाता है — जीवन है परंतु जीवन से और संसार से बंधन नहीं। इसे मोक्ष भी कहा है, जो जीवन और मृत्यु के पार की गति है।
भगवान के ब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार: भगवान कोई अन्य या दूसरा नहीं होता। भगवान का यह साक्षात्कार भी केवल भीतर ही होता है, जिसे भगवत्ता कहा जाता है। योग में भी यही सर्वोच्च सिद्धि है — इसे दूसरे शब्दों में समाधि होना या समाधिस्थ होना कहते हैं।
परम आनंद: आध्यात्मिक परमानंद अर्थात वह आनंद जो संसार से जुड़ा न हो। यह आसक्ति से उत्पन्न सुख और दुख के पार की स्थिति है जहाँ न सुख होता है न दुख — दोनों आसक्ति के साथ ही समाप्त हो जाते हैं। केवल पारलौकिक आनंद शेष रहता है।