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आत्म-ज्ञानआध्यात्मध्यानयोग

क्यों ध्यान वास्तव में वह नहीं जो माना जाता हैं?

क्या ध्यान कोई शरीर से किया जाने वाला कर्म होता है?

अपने ज्यादातर लोगों को अक्सर ऐसे कहते सुना होगा कि हमें ध्यान करना चाहिए, ध्यान करना सेहत के लिए अच्छा होता है, मैं रोज ध्यान करता हूँ इत्यादि।

इससे यह लगता है कि ‘ध्यान’ और ‘करना’ अर्थात ध्यान कोई करने का कर्म है, कोई क्रिया है। लेकिन साधकों, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है; ध्यान कोई क्रिया नहीं होती।

ध्यान अपने मूल स्वभाव में स्थापित होने को कहते हैं, जहाँ से यह सब व्यक्त होता है, पूरा संसार जहाँ से चेष्टा करता है। उसमें स्थापित हो गए, अर्थात ध्यानस्थ हो गए। ध्यान किसी विशेष कार्य को करने का नाम नहीं है, बल्कि उस अवस्था में स्थित होने का नाम है जहाँ व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है।

ध्यान घटित होना कोई छोटी घटना नहीं होती। यह बहुत बड़ी घटना होती है कि आपका पूरा जीवन ही बदल जाए, संसार को देखने का आपका दृष्टिकोण ही बदल जाए। जिस प्रकार अंधकार में रहने वाला व्यक्ति प्रकाश को देखकर सब कुछ नए ढंग से देखने लगता है, उसी प्रकार ध्यान का स्पर्श होने पर जीवन की दिशा और दशा दोनों परिवर्तित हो सकती हैं।

ध्यान कोई आधा घंटा चलने वाली घटना भी नहीं होती। बहुत से लोग हैं जो प्रतिदिन कुछ समय के लिए ध्यान में बैठते हैं, किन्तु ध्यान अपने वास्तविक अर्थ में समय की सीमा में बँधी हुई घटना नहीं है। ध्यान एक तो हर श्वास में होता है या फिर वह किसी भी श्वास में नहीं होता। यदि जागरूकता केवल कुछ समय के लिए है और बाकी समय व्यक्ति पूरी तरह अचेतनता में जी रहा है, तो उसे ध्यान नहीं कहा जा सकता।

और ऐसा तो बिल्कुल नहीं होता कि आप जब चाहें, जहाँ चाहें ध्यानस्थ हो जाएँ और फिर बाद में ध्यान को बंद भी कर दें। यह मन से किया जाने वाला कोई कार्य थोड़े ही है। आप ऐसा कह सकते हैं कि मैं रोज व्यायाम करता हूँ, क्योंकि व्यायाम एक क्रिया है, एक कर्म है। लेकिन आप ऐसा नहीं कह सकते कि मैं रोज किसी समय पर ध्यान करता हूँ।

वास्तव में यदि किसी के जीवन में ध्यान है, तो वह ऐसा कभी नहीं कहेगा कि मैं रोज ध्यान करता हूँ। नहीं! वह ऐसा कह सकता है कि मैं दिनभर जो भी करता हूँ, उस पर ध्यान है। उसके भीतर निरंतर जागरूकता रहती है। उसके कर्म बदल सकते हैं, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, किन्तु उसकी सजगता बनी रहती है।

एक ध्यानी स्वयं कभी ध्यान नहीं करता। वह ध्यान है। वह कुछ नहीं करता, अकर्ता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप केवल साक्षी होता है पंचतत्त्वों का, किन्तु उनसे परे भी। वह स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि या विचारों तक सीमित नहीं मानता, बल्कि उस चेतना के रूप में जानता है जो इन सबको जान रही है।

ध्यानस्थ होना कैसा होता है?

यदि कोई ध्यानस्थ है, तो वह अपने विचारों को, मन की उस विचारों की नदी को जो बिना रुके बह रही है, उसके किनारे खड़ा होकर केवल उस धारा को बहते हुए देख रहा होता है। देखने का अर्थ है कि वह जान रहा होता है, जागरूक होता है, साक्षी होता है। वह विचारों को रोकने का प्रयास नहीं करता, उनसे संघर्ष नहीं करता, न ही उन्हें पकड़कर बैठ जाता है। वह केवल उनकी उपस्थिति से परिचित रहता है।

लेकिन एक सामान्य व्यक्ति, जो ध्यान में नहीं है, वह इन विचारों के साथ बह जाता है। कोई विचार आता है और वह उसे पकड़कर उसमें कूद जाता है। फिर वह विचार उसे इधर-उधर ले जाता है। वह उसके साथ हँसता है, रोता है, आशाएँ बनाता है, भय उत्पन्न करता है और स्वयं को उन्हीं विचारों के साथ जोड़ लेता है।

वह कोई ऐसा विचार पकड़ लेता है जो उसे अच्छा लगता है। अच्छा विचार अर्थात ऐसा नहीं कि वह सबके लिए अच्छा हो और उसमें सबका कल्याण हो; बल्कि कई बार वह केवल उसके स्वार्थ को पूरा करने वाला विचार होता है। उसके कारण अन्य लोगों को हानि भी उठानी पड़ सकती है। फिर भी वह उस विचार के साथ बहता चला जाता है क्योंकि वह उसके प्रति जागरूक नहीं है।

किन्तु ध्यान ऐसा नहीं है। ध्यान का अर्थ है कि आप उस नदी के किनारे ही खड़े रहें। विचार आएँ, जाएँ, उठें, गिरें, बदलें, समाप्त हों—किन्तु आप केवल साक्षी बने रहें। जब तक कि यह सब ओझल न हो जाए, जब तक कि जो आत्मा से निकला है वह आत्मा में ही विलीन न हो जाए।

तब केवल वही शेष रह जाता है जो नित्य है। वही शुद्ध साक्षी, वही चैतन्य, वही आपका वास्तविक स्वरूप है। उसी में स्थित होना ध्यान है, और उसी में स्थिर हो जाना ध्यानस्थ होना है।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.

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