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“नेति नेति” मंत्र से माया कैसे नष्ट करें?

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“नेति नेति” साधना की गहन प्रक्रिया की खोज करें, जो साधकों को उनके सच्चे स्वरूप को पहचानने की ओर मार्गदर्शन करती है।

सभी अस्थायी, बदलते अनुभवों, विचारों और आसक्तियों को पहचानकर और त्यागकर, व्यक्ति धीरे-धीरे अपने भीतर स्थित अनंत साक्षी को उजागर करता है।

यह प्राचीन ज्ञान भ्रांतियों को दूर करता है और आंतरिक स्पष्टता, स्थायी शांति और परम सत्य का प्रत्यक्ष बोध प्रदान करता है।

“नेति नेति” मंत्र क्या है?

नेति नेति का भाव इतना सूक्ष्म और इतना गहरा है कि इसे केवल शब्दों से पकड़ना कठिन है। फिर भी मन की सहायता के लिए हमें शब्दों का सहारा लेना पड़ता है।

नेति नेति का शाब्दिक अर्थ है – “यह नहीं, यह नहीं।” लेकिन इसके भीतर छुपा हुआ संकेत बहुत बड़ा है।

तुम्हारी जो भी समझ है, तुम्हारा मन जिस किसी चीज़ का मनन करता है, जिस भी वस्तु या विचार को पकड़कर बैठता है  वह तुम नहीं हो।

जो कुछ भी तुम्हारी चेतना के दायरे में आता है, वह बदलने वाला है, नश्वर है, और इसलिए वह तुम्हारा वास्तविक स्वरूप नहीं हो सकता।

नेति नेति का भाव यही है कि जो कुछ भी बदल रहा है, जो कुछ भी दृष्टि में आता है, उसका निषेध करो। उसे अस्वीकार करो और अपने भीतर खोजो कि तुम्हारा असली अस्तित्व क्या है।

तुम कौन हो? यह प्रश्न साधना का सबसे गहरा प्रश्न है। क्या तुम शरीर हो? यदि तुम शरीर हो तो यह शरीर क्षण-क्षण बदल रहा है। बचपन का शरीर कहाँ है? जवानी का शरीर भी टिकने वाला नहीं है। बुढ़ापे का शरीर भी अंत में मिट्टी में मिल जाता है।

तो क्या वह चीज़, जो बदलती रहती है, वास्तव में तुम्हारा स्वरूप हो सकती है? नहीं। शरीर तो बस एक माध्यम है, एक पात्र है। तुम केवल शरीर नहीं हो।

क्या तुम विचार हो? विचार तो आते हैं और चले जाते हैं। वे बादलों की तरह मन के आकाश में उमड़ते-घुमड़ते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। यदि तुम विचार हो तो तुम्हें हर क्षण बदल जाना चाहिए, क्योंकि हर क्षण विचार बदलते हैं।

लेकिन तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा है जो नहीं बदलता, जो साक्षी है, जो इन विचारों को देखता है। इसलिए तुम विचार भी नहीं हो।

नेति नेति मंत्र को माध्यम बनाओ,

नेति नेति का अर्थ यही है कि जो कुछ भी तुम्हारे सामने आता है, जो कुछ भी तुम्हारे अनुभव में आता है, तुम वह नहीं हो। उसे नकारते चलो। जो नष्ट होता है, जो बदलता है, जो आता-जाता है, वह तुम्हारा असली स्वरूप नहीं है।

तुम इस संसार से अपेक्षा रखते हो, कामना रखते हो। लेकिन सोचो – यह संसार तुम्हें क्या दे सकता है? संसार की हर वस्तु नश्वर है। हर संबंध, हर वस्तु, हर अनुभव बदल जाता है।

यह संसार स्वयं दुखस्वरूप है। जो स्वयं दुखस्वरूप है, वह तुम्हें सुख कैसे दे सकता है? यदि तुम यह देखना चाहते हो कि दुख कैसा दिखता है, तो तुम्हारे सामने ही यह संसार खड़ा है। इसे ध्यान से देखो। इसमें सुख का आभास है, लेकिन उसकी जड़ में दुख ही छिपा है।

जब तुम स्वयं असत्य हो, जब तुम्हारी पहचान ही झूठे आधार पर बनी है, तो यह संसार, जो उसी झूठ से उपजा है, सच कैसे हो सकता है?

इसलिए इस संसार से चिपके रहने में कोई अर्थ नहीं है। सत्य को पाना है तो असत्य को नकारना होगा। सत्य और असत्य दोनों एक साथ नहीं टिक सकते।

नेति नेति की साधना का उपयोग तलवार की तरह करो। यह तलवार असत्य को काटती चली जाती है। जैसे-जैसे तुम नकारते जाओगे, परत-दर-परत असत्य गिरता जाएगा। सवाल है कि कब तक लड़ना है? जब तक प्राण शरीर में हैं, तब तक यह संघर्ष चलता रहेगा। भ्रांतियाँ बार-बार उठेंगी।

लेकिन यह युद्ध मजबूरी का युद्ध नहीं होना चाहिए, जैसे किसी सैनिक को जबरदस्ती रणभूमि में भेज दिया जाए। यह युद्ध तुम्हारे हृदय की गहराई से उठी हुई सत्य की लालसा के कारण होना चाहिए।

यदि तुम्हें अमरत्व पाना है, यदि तुम्हें उस अनंत सत्य तक पहुँचना है, तो तुम्हारे भीतर सच्चे अर्थों में प्यास होनी चाहिए। तुम्हारा खिंचाव सत्य की ओर होना चाहिए। और यह खिंचाव तभी होगा जब तुम झूठ की ओर आकर्षित होना छोड़ दोगे।

जब तक एक हाथ में सत्य की प्यास है और दूसरे हाथ में असत्य की पोटली है, तब तक यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती। साधक के भीतर यह संकल्प होना चाहिए – अब और नहीं, अब मुझे केवल सत्य चाहिए, चाहे इसके लिए मुझे जो भी त्याग करना पड़े।

कैसे करें नेति नेति से साधना

नेति नेति का उपयोग किस पर करना है? यह तुम्हारा मन स्वयं बताएगा। जब भी कोई विचार उठे और वह इस संसार से जुड़ा हो, वही तुम्हें असत्य की ओर खींचने वाला है।

वह तुम्हें सुख का आभास दिखाएगा, लेकिन वास्तव में वह तुम्हें दुख की ओर ही ले जाएगा। इसलिए वह तुम्हें खींच ले, इससे पहले ही तुम्हें उसे नकार देना है, उसे निरस्त कर देना है। यही नेति नेति का अभ्यास है।

साधकों, यह दुनिया जैसी दिख रही है वैसी वास्तव में नहीं है। तुम भी वैसे नहीं हो जैसे खुद को जानते हो। सब कुछ केवल मन का खेल है। मन चित्र बनाता है और फिर उन्हें सच मान लेता है। जब तुम सो जाते हो तो वही मन नए-नए चित्र रचता है जिन्हें तुम स्वप्न कहते हो। और जब जागते हो तो नया संसार सामने आ जाता है।

यह तुम्हारे लिए प्रमाण है। जब तुम जागते हो तो यह संसार तुम्हें वास्तविक लगता है। जब तुम स्वप्न देखते हो तो स्वप्न ही वास्तविक लगते हैं। और जब गहरी नींद में चले जाते हो तो वहाँ न तो यह संसार रहता है और न ही स्वप्न – केवल अंधकार रह जाता है।

तो अब बताओ, यदि जाग्रत अवस्था का संसार सत्य है, तो स्वप्न क्यों नहीं? और यदि स्वप्न असत्य है तो जाग्रत अवस्था भी उतनी ही असत्य है, क्योंकि दोनों ही मन द्वारा उत्पन्न हैं।

और गहरी नींद में जो शून्यता या अंधकार आता है, वह भी सत्य नहीं है, क्योंकि वह भी बदल जाता है। सत्य तो वह है जो इन तीनों अवस्थाओं – जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति – का साक्षी है।

तुम्हें ज्ञान पाना है तो अज्ञान को हटाना होगा। मन और अहंकार मिलकर भ्रांतियाँ उत्पन्न करते हैं। इन्हें काटना होगा। मन बार-बार छल करता है, तुम्हें सुख का प्रलोभन दिखाता है, और भीतर से तुम्हें बंधन में डालता है। इसीलिए नेति नेति का अभ्यास तलवार की तरह है, जो हर भ्रांति को काटता चला जाता है।

जब साधक गंभीरता से देखता है तो उसे स्पष्ट होने लगता है कि यह पूरा संसार असत्य है। यह असत्य बार-बार तुम्हें पकड़ना चाहेगा, तुम्हें खींचना चाहेगा। लेकिन जब तुम्हारे भीतर सत्य के लिए तड़प जाग जाएगी, तब तुम हर असत्य को दृढ़ता से नकार दोगे।

नेति नेति केवल नकार नहीं है। यह तुम्हें धीरे-धीरे उस बिंदु तक ले जाता है जहाँ कुछ नकारने की आवश्यकता ही नहीं रहती। क्योंकि जब असत्य सब गिर चुका होता है, तब केवल सत्य शेष रह जाता है। और सत्य को पाने के लिए तुम्हें कुछ पकड़ना नहीं पड़ता, केवल झूठ को छोड़ना होता है।

याद रखो, सत्य और असत्य का संग कभी नहीं हो सकता। जिस क्षण असत्य हटता है, उसी क्षण सत्य स्वयं प्रकट हो जाता है।

जैसे अंधकार को हटाने के लिए तुम्हें प्रकाश लाने की ज़रूरत नहीं है, केवल दीपक जलाना ही पर्याप्त है। उसी प्रकार नेति नेति की साधना करते हुए जब तुम हर असत्य को हटा देते हो, तब सत्य अपने आप प्रकाशित हो उठता है।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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