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‘यदा यदा हि धर्मस्य’ श्लोक, अर्थ और व्याख्या (भगवद्गीता 4.7 & 8)

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भगवान ने अर्जुन से कहा था, जिसे आप गीता के चौथे अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग के सातवें और आठवें श्लोक में पढ़ते हैं। ये श्लोक आपको बताते हैं कि भगवान धर्म यानी अच्छाई की रक्षा करने वाले हैं और बुराई का नाश करने वाले हैं।

‘यदा यदा हि धर्मस्य’ श्लोक, अर्थ और व्याख्या

संस्कृत श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ४.७॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ ४.८॥

Roman

Yada yada hi dharmasya glanir bhavati Bharata.
Abhyutthanam adharmasya tadatmanam srijamy aham. ॥ 4.7 ॥

Paritranaya sadhunam vinashaya cha dushkritam.
Dharma-samsthapana-arthaya sambhavami yuge yuge. ॥ 4.8 ॥

शाब्दिक अर्थ

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। (४.७)

साधुजनों की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। (४.८)

‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत’ कृष्ण ने क्यों कहा?

गीता उपदेश — अध्याय ४, श्लोक ७ और ८

जब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मैंने ही सृष्टि के आदि में सूर्यदेव विवस्वान को ज्ञानोपदेश दिया था, तब अर्जुन को कृष्ण की इस बात पर संदेह होता है। क्योंकि विवस्वान का जन्म बहुत पुराना माना जाता है। माना जाता है कि सृष्टि में सबसे पहले उनका ही जन्म हुआ था। लेकिन कृष्ण तो कह रहे हैं कि मैंने उन्हें उपदेश दिया था।

अब कृष्ण का जन्म तो अभी का है, तो यह कैसे सच हो सकता है कि कृष्ण ने उन्हें उपदेश दिया था, जो कृष्ण से पहले ही जन्म ले चुके थे?

तब कृष्ण अर्जुन से यह बात कहते हैं कि मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। लेकिन तुम उन्हें नहीं जानते, मैं उन्हें जानता हूँ। (भगवद्गीता ४.५)

अब कृष्ण ऐसा क्यों कहते हैं? अर्जुन उस समय कृष्ण को वही मान रहा था जो उसके सामने रथ में खड़ा था। अर्जुन कृष्ण को ज्ञानी के रूप में नहीं, उस विशेष शरीर के रूप में देख रहा था। अर्जुन के लिए कृष्ण का अर्थ था—वह शरीर जो देवकी और वसुदेव से जन्मा था। और इसी तरह अर्जुन अपने आपको भी केवल शरीर मानता था।

कृष्ण ने इससे पहले ही अर्जुन को बता दिया था कि उसे जानो, उसे देखो जो इन शरीरों के पार का है। भगवद्गीता के 2.20 का उपदेश में आप इसे पढ़ सकते है । लेकिन अर्जुन का अज्ञान अभी भी समाप्त नहीं हुआ था। इसलिए उसने ऐसा पूछा कि मैं कैसे मान लूँ, कैसे विश्वास करूँ कि कृष्ण, तुमने सूर्यदेव को ज्ञान का उपदेश दिया था?

कृष्ण कहते हैं कि “जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सिर पर चढ़ जाता है, तब मैं आता हूँ। साधु-संतों की रक्षा के लिए और दुष्टों के विनाश के लिए मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।”

कृष्ण आते हैं जब मानवता में असंतुलन सिर पर चढ़ जाता है। कृष्ण आते हैं जब इतनी बुराई फैल जाती है कि इंसानियत पूरी तरह समाप्त होने लगती है। कृष्ण जन्म लेते हैं जब मानवता और हैवानियत एक हो जाती है।

अब कृष्ण आएँगे तो जरूरी नहीं कि बिल्कुल उसी रूप में आएँगे, उसी नाम से आएँगे, जिस नाम और रूप में वे महाभारत काल में आए थे। हो सकता है कि आज उनका नाम कुछ और हो। उनका शरीर अन्य हो सकता है, लेकिन वह कृष्ण ही होंगे।

आप उनके नाम पर मत जाइए और यह मत मानिए कि उनका नाम केवल कृष्ण ही है। कृष्ण का कोई नाम नहीं है। उसके सिवा कोई दूसरा नहीं है, तो उसका कोई नाम कैसे हो सकता है?

अर्जुन और कृष्ण दोनों अलग-अलग शरीर हैं, इसलिए उनके अलग-अलग नाम हैं। लेकिन कृष्ण ने अर्जुन से पहले ही कहा था कि नाम, रूप और गुण से आगे बढ़ो। क्योंकि नाम, रूप, गुण और आकार वह सत्ता नहीं है। ये सब मन की रची हुई माया हैं, जिसमें तुम भ्रमित हो चुके हो। सत्य इसके आगे है। सत्य या परमात्म तुम्हारे मन और इंद्रियों की पकड़ में नहीं आ सकता।

और कृष्ण की कही यह बात कोई गुप्त रहस्य नहीं है। सब जानते हैं कि आज हमारी जो अच्छी स्थिति है, उसके पीछे कितने महापुरुषों ने, संतों ने, आचार्यों ने कार्य किया है। कईयों ने अपना तक जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने अपने प्राण तक दे दिए, बलिदान कर दिया, ताकि धर्म स्थापित हो।

और धर्म का अर्थ यहाँ कोई संप्रदाय नहीं है। अक्सर लोग धर्म को संप्रदाय का पर्यायवाची बोलते हैं, लेकिन यह बहुत बड़ी भ्रांति है। हमारे किसी भी शास्त्र में धर्म शब्द को संप्रदाय के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है। धर्म यानि इंसान बुराई का मार्ग न चुने अच्छाई के मार्ग पर आए, जिसमें वह सही ज्ञान और अपने विवेक से सही कार्य करे। बुरा करने वाले लोग जिनके कारण मानवों का बड़ा नुकसान होता है, और अन्य पशु पक्षियों का भी, ऐसे लोग बहुत है जो कहते है कि हम धार्मिक है और वे लोगों को छलते है अंधविश्वास से ये अधर्मी है। और ऐसे भी लोग है जो सिर्फ अपने जीभ के स्वाद के लिए जानवरों को मारते हैं ।

महाभारत के युद्ध में कौरवों की यह मांग थी कि पांडवों को एक सुई की नोक के बराबर जमीन भी न दी जाएंगी, और दुर्योधन इसी बात पर अड़ा हुआ था धर्म के अनुसार आधा राज्य पांडवों का था, लेकिन दुर्योधन सही रह पर चलने वालों में से नहीं था और अन्य कौरव भाई भी उसी का अनुसरण करते थे।

लेकिन कृष्ण इस भीषण रूद्ध को रोकने शांतिदूत बन कर गए थे उनका संदेश था कि आधा न सही तो केवल पांच गांवों को दो। लेकिन बिगड़े हुए दुर्योधन ने कृष्ण को ही जंजीरों से बांधने का प्रयास किया।

महात्माओं ने इस श्लोक को कैसे समझाया?

कई महापुरुषों ने कृष्ण की इस बात पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

जैसे स्वामी विवेकानंद इस पर कहते हैं कि “जब मनुष्यों की चेतना बहुत दूषित हो जाती है और बहुत नीचे गिर जाती है, तब कोई संत या ज्ञानी उस समाज में आता है।”

स्वामी विवेकानंद स्वयं भी एक आध्यात्मिक गुरु थे। उनका कहना था कि ईश्वर का अवतार आध्यात्मिक गुरु से संबंधित है जो इंसान की भीतर की बुराइयों से जागरूक करता है। और हम गुरु को ही ईश्वर का अवतार मानते है क्योंकि उनसे मिलाने वाला भी गुरु होता हैं। कृष्ण भी अर्जुन को वहीं ज्ञान दे रहे थे जो उन्होंने सूर्यदेव को दिया था।

लोकमान्य तिलक कहते हैं कि “धर्म की रक्षा के लिए अपना कर्तव्य करना पड़ता है। केवल उपदेश देना पर्याप्त नहीं होता।” 

तिलक का ऐसा कहना बिल्कुल स्वाभाविक हैं क्योंकि लोग हमेशा किसी महापुरुष का अनुसरण करते है, अगर वह ज्ञान के साथ निष्काम कर्म भी करे।

अन्य महात्माओं और आचार्यों, जैसे आदि शंकराचार्य और रामानुजाचार्य, ने भी भगवान के अवतार और धर्म की स्थापना को अलग-अलग दार्शनिक दृष्टियों से समझाया है। उनके विचारों में ईश्वर का अवतार केवल धर्म की रक्षा, सज्जनों की रक्षा और अधर्म के विनाश से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि वे बहुत गहरी बात बताते है। वे आंतरिक जगत के रहस्य खोलते है।

इस श्लोक के बाद कृष्ण कहते हैं कि उनके जन्म और कर्म दिव्य हैं। यहाँ ‘दिव्य’ का अर्थ समझना आवश्यक है। कृष्ण का जन्म केवल माँ के गर्भ से हो, यह जरूरी नहीं कि हम कृष्ण को केवल उसी में समझें अगर  कृष्ण की पहचान भी केवल मां के गर्भ से जन्मने वाला शरीर है तो इसमें दिव्य क्या है सभी प्राक्रतिक है।

असली बात कृष्ण किसी के भी भीतर प्रकट हो सकते हैं।कृष्ण गीता में कहते हैं कि वे अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं। यहाँ कृष्ण आध्यात्मिक और आंतरिक बात कर रहे हैं।

कृष्ण अपनी प्रकृति को अधीन करके प्रकट होते हैं। यानी वह पशुता से ऊपर के हैं वे अपने चंचल मन को नियंत्रण में किए हुए है। पशु का अर्थ यहाँ हमारे भीतर मौजूद वह अज्ञान और पशु-प्रवृत्ति है, जो हमें केवल शरीर, इच्छाओं, वासनाओं और स्वार्थ के साथ बाँधे रखती है।

जो इनसे ऊपर है, जो मुक्त है, वही कृष्ण है। जैसे भगवान बुद्ध। जब वे पैदा हुए थे, तब वे भी एक सामान्य मनुष्य के रूप में ही जन्मे थे। लेकिन बाद में वे अपनी पशुता के ऊपर उठ गए, अज्ञान से ऊपर उठ गए ज्ञानी हुए और भगवान बुद्ध बन गए।

इसलिए कृष्ण का भगवान का जन्म या अवतार केवल किसी एक शरीर के रूप में समझना आवश्यक नहीं है कि जो व्यक्ति जन्म से ही भगवान था। हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति जन्मा हो, तब वह घोर अज्ञानी रहा हो, लेकिन बाद में वह प्रबुद्ध हो गया हो। उसके भीतर ज्ञान जागृत हो गया हो। दूसरे शब्दों में, वह कृष्ण है यानी भगवान है।

अगर आज भी कोई महापुरुष अपनी तुच्छ पशुता से प्रेरित कामनाओं, वासनाओं, स्वार्थ आदि दुर्गुणों को त्यागकर धर्म के लिए निष्काम भाव से कर्म करे, तो वह भगवान कहे जाने के योग्य है।

यही सबसे बड़ी साधना है, जो आपको परम सिद्धि, आध्यात्मिक मुक्ति परमानंद तक ले जाती है।

लेकिन अधर्म का मूल कहाँ है? यहाँ ज्यादातर लोग अपने भीतर के क्लेशों का समाधान बाहर ढूँढ़ते हैं और इसी कारण समाज में अधर्म का वर्चस्व बढ़ने लगता है। इसका नुकसान केवल हमें ही नहीं, बल्कि पृथ्वी को भी होता है और अन्य पशुओं को भी।

हमने अपने स्वार्थ के लिए जंगल तबाह कर दिए। हमने अपने घर को बड़ा करने के लिए दूसरों को बेघर कर दिया—चाहे वह इंसान हो या जंगली जानवर।

और यह हमेशा से होता आया है। लेकिन हमारा यह धर्म है कि हम कुछ करें। केवल अपने शरीर की कामनाओं और वासनाओं में जीवन को व्यर्थ न करें।

जिस इंसान की चेतना इससे ऊपर उठती है, वह कोई महान काम कर गुजरता है। वह कृष्ण होता है।

लेकिन अगर कोई केवल अन्य जानवरों की तरह पैदा होता है, जानवरों की तरह जीता है और जानवर की तरह ही मर जाता है, तो उसने इस जीवन की सार्थकता को नहीं जाना और न ही पाया।

कृष्ण के अवतार का इंतज़ार करने वाले लोग,

कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो आज किसी अवतार की राह देख रहे हैं। किसी दिव्य शक्ति की, जो आए और चमत्कार करे।

ये लोग धार्मिक नहीं हो सकते। ये अपने ही मतों मान्यताओं और अपने ही मन के कारण अंधे हो चुके हैं। वे भ्रमित हैं। वे न स्वयं को जानते हैं और न भगवान को और न ही धार्मिकता को।

मैंने पहले भी कहा है कि भगवान कोई माँ के पेट से जन्म लेने वाले साधारण व्यक्ति नहीं होते। जिसने जन्म लिया है, उसे चुनना होता है कि धर्म के लिए जिए या अधर्म की छाया में जिए। जो धर्म के लिए जीता है, वही कृष्ण को पा जाता है।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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