आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति और मानव जीवन के सबसे बड़े उद्देश्य—मोक्ष—को प्राप्त करने के लिए ही योग का अभ्यास किया जाता है। इसी क्रम में अब हम कर्मयोग को समझेंगे, जिसकी शिक्षा भगवद्गीता में दी गई है।
कर्म का बंधन मनुष्य पर तब पड़ता है, जब वह संसार से आसक्त होकर कर्म करता है। ऐसा करने पर भले ही उसे कर्मफल मिल जाए और उसकी कामना पूरी हो जाए, लेकिन जीवन में वास्तव में जो पाने योग्य था, वह उसे नहीं मिलता। इसीलिए भगवान कर्मयोग का उपदेश देते हैं, जिससे मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सके।
कर्मयोग में निष्काम कर्म को महत्व दिया गया है, जबकि सकाम कर्म को अत्यंत निम्न माना गया है, क्योंकि यह कर्मयोग की साधना में बाधा उत्पन्न करता है।
भगवद्गीता में निष्काम कर्मयोग क्या है?
साधकों, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— “अर्जुन! कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए तुम न तो कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होकर कर्म करो और न ही कर्म न करने में आसक्त बनो।”यह भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 47 का भावार्थ है, भगवद्गीता का अनमोल वचन है।
कर्म के बंधन से आध्यात्मिक मुक्ति दिलाने के लिए ही कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की शिक्षा दे रहे हैं। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि कर्म न करने से यह सिद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि मनुष्य का शरीर प्रकृति के अधीन होने के कारण उसे कर्म करना ही पड़ता है।
जब कृष्ण कर्म की बात कर रहे हैं, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि वे किस प्रकार के कर्म की बात कर रहे हैं। कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म करने की सलाह दे रहे हैं।
अपने आप को अर्जुन के स्थान पर रखकर देखिए—आप किसी भी कर्म को पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से नहीं कर सकते। जैसे लोग काम करते हैं, तो किसके लिए करते हैं? पैसों के लिए। और पैसों का क्या करते हैं? या तो स्वयं पर खर्च करते हैं या अपनी पत्नी और बच्चों पर, ताकि सांसारिक सुख भोगे जा सकें। यह कर्म वे इसीलिए करते हैं ताकि उनका स्वार्थ पूरा हो सके। ऐसे में निष्काम कर्म करने के लिए तो सबसे पहले इस कर्म को ही त्यागना पड़ेगा।
अभी जो कर्म आप कर रहे हैं, उसके केंद्र में स्वार्थ है—स्वार्थ के कारण ही आपने उसे करना शुरू किया। उसके अस्तित्व का कारण ही स्वार्थ है, कामना है, वासना है; इनके बिना वह कर्म है ही नहीं। तो फिर उस कर्म को आप निष्काम भाव से कैसे कर सकते हैं? जिसने यह कार्य चुना है, वही स्वार्थ है।
स्वार्थ को केंद्र में रखकर किए जाने वाले कर्म को निष्काम भाव से करने का प्रयत्न कर्मयोग नहीं कहलाता—यह मूर्खता है। अज्ञानी लोग ही ऐसी बातें करते हैं कि “कर्म करो, फल की चिंता मत करो,” पर वे यह नहीं बताते कि करना कौन-सा कर्म है। जबकि सबसे अधिक महत्वपूर्ण यही है कि सही कर्म किया जाए—अर्थात निष्काम कर्म।
जिस कर्म को करने में इतना दुख हो रहा है, उसके फल की चिंता न करने मात्र से वह दुख मिट नहीं जाएगा। आपको फल की चिंता किए बिना कोई भी कर्म नहीं करना है, बल्कि आपको सही कर्म चुनना है। सही कर्म चुनने को ही कर्मयोग कहा जाता है।
जो सही कर्म है, उसे करना ही कर्मयोग है—न कि किसी भी कर्म को निःस्वार्थ भाव से करने का प्रयत्न, क्योंकि वह प्रयत्न कभी सफल नहीं हो सकता। जो सही कर्म है, धार्मिक कर्म है, कर्तव्य है—केवल वही निष्काम है।
कौन-सा कर्म सही और निष्काम कर्म है?
सही कर्म क्या है, यह तभी समझ में आएगा जब हम यह जान लें कि गलत कर्म क्या है, सकाम कर्म क्या है, और आत्मा से वियोग कराने वाला—योग के विरुद्ध—कर्म क्या है, तथा उसे त्याग दें।
आप देख सकते हैं कि लोग भक्ति और भजन करते हैं। क्यों करते हैं? वे यह मानते हैं कि भजन करने से ईश्वर की कृपा उन पर होगी, पैसा मिलेगा, संपत्ति आएगी, और धन-संपत्ति की इच्छा या किसी अन्य कारण से जो दुख है वह समाप्त होगा और सुख की प्राप्ति होगी—या फिर वे इसलिए भजन करते हैं ताकि मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग में स्थान मिल सके।
ऐसा मानने वाले लोग अत्यंत मूढ़ हैं। उनसे अधिक धार्मिक तो वे नास्तिक हैं, जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं और ऐसा कर्म भी नहीं करते।
मैं यह नहीं कह रहा कि भजन-पूजा आदि कर्म करना मूर्खता है, लेकिन हमें यह देखना होगा कि यह कर्म क्यों किया जा रहा है—क्या इसका कारण कोई निम्न स्वार्थ है?
कोई भी कर्म हो, पहले यह देखना होगा कि उसे करने वाले में अहंकार तो नहीं है, क्योंकि जो भी व्यक्ति कोई कार्य हाथ में लेता है, उसके पीछे कोई-न-कोई स्वार्थ अवश्य होता है।
बिना प्रेम और समर्पण के कोई निःस्वार्थ कर्म कैसे किया जा सकता है? इसलिए सबसे पहले हृदय में प्रेम होना आवश्यक है—और वह प्रेम इसलिए नहीं कि वह कोई कामना पूरी कर रहा है; झूठा प्रेम नहीं, सच्चा प्रेम। प्रेम इसलिए क्योंकि वह मुक्ति देने वाला है—कि हम कर्म कर रहे हैं और कर्म करने में ही हमें सब कुछ मिल गया, हम पूर्ण हो गए, अब कुछ बाकी नहीं रहा जिसकी कामना हो।
ऐसा नहीं कि किसी दबाव में यह सोचकर कर्म किया जाए कि “कुछ मिलने वाला तो नहीं, फिर भी कर देते हैं, याद तो रखोगे”—ऐसा कर्म निष्काम कर्म नहीं होता।
जीवन का प्रधान उद्देश्य, सबसे पहली कामना यही होनी चाहिए—स्वार्थ से मुक्त होने की कामना। इसीलिए जो भी कर्म किया जाए, वह निःस्वार्थ कर्म होना चाहिए। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा है कि कर्म भगवान विष्णु के लिए करना चाहिए—विष्णु का अर्थ है “परम स्वतंत्रता।”
कर्म इसलिए नहीं करना कि स्वार्थ पूरा हो, बल्कि इसलिए करना कि स्वार्थ से ही मुक्ति मिले। इसके लिए आपको यह जानना आवश्यक है कि आध्यात्मिक मुक्ति क्या है, जिस पर अन्य विस्तृत लेख उपलब्ध हैं।
कौन-सा कर्म स्वार्थ को समाप्त करेगा, वही कर्म चुनना होता है। इसलिए पहले यह जानिए कि आप किन कार्यों में इसलिए लगे हैं क्योंकि उनके पीछे आपका निम्न सांसारिक स्वार्थ है, और फिर उन्हें त्याग दीजिए। इसके स्थान पर वह कर्म कीजिए जिससे भीतर शुद्धि उत्पन्न हो और बनी रहे। परमार्थ का अर्थ भी परम स्वार्थ ही होता है, परंतु वह स्वार्थ ऐसा होता है जो अन्य तुच्छ स्वार्थों से जीवन को ऊपर उठाता है—ऐसे उद्देश्य से किया गया कर्म ही निष्काम होता है।
निष्काम कर्मयोग क्यों महत्वपूर्ण है?
लोग कर्म इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें कर्मफल से आसक्ति होती है। मनुष्य सांसारिक वस्तुओं से आसक्त इसलिए होता है क्योंकि उसे अपनी मूल आवश्यकता का ज्ञान नहीं होता। इसलिए वह अपने भीतर के दुख—कामना, वासना, तृष्णा—के निवारण का उपाय कर्म और उसके फल में ढूंढता है।
जैसे प्यास केवल पानी से और भूख केवल अन्न से मिटती है, वैसे ही बंधन और दुख को केवल मुक्ति ही मिटा सकती है। लेकिन मनुष्य उस दुख को अन्य वस्तुओं से भरकर मिटाने का प्रयत्न करता है, और इसीलिए वह सांसारिक सुखों के पीछे भागता है और कर्म करता है।
उसकी मूल आवश्यकता तो मुक्ति की है, परंतु यह सांसारिक सुखों की प्राप्ति से पूरी नहीं होती। इस प्रकार उसका कर्म व्यर्थ होता चला जाता है, और जीवन भर कर्म करने के बाद भी उसे वह नहीं मिलता जो वास्तव में चाहिए और जो उसके दुख को समाप्त कर सके।
गीता में कृष्ण कहते हैं कि निष्काम कर्म सकाम कर्म से श्रेष्ठ है, क्योंकि वे इससे उत्पन्न होने वाले दोषों को जानते हैं। स्वार्थ और कामना की पूर्ति के लिए किए गए कर्म से व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है, जिससे उसका पतन होता है और वह अपनी स्थिति से गिर जाता है।
सुख और शांति का वास भीतर तभी तक होता है जब चित्त विषयों में नहीं बल्कि मुक्ति में स्थिर हो, अर्थात जब कर्म मन के बंधनों से मुक्त होकर किया जाए। इसी मुक्ति का दूसरा नाम आध्यात्मिक परमानंद है, जो आनंद का सर्वोच्च रूप है।
लेकिन जब मनुष्य का लक्ष्य केवल फल पाना होता है, तो वह ऐसे कर्म चुनता है जिससे उसका यह मुक्त स्वभाव विषयों के नीचे दब जाता है। यह पहली हानि है। दूसरी हानि यह है कि इस मोह के कारण व्यक्ति अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर देता है, क्योंकि विषयों की आसक्ति की यह दौड़ मृत्यु तक चलती रहती है, फिर भी पूर्णता प्राप्त नहीं होती।