जो आत्म नहीं है, उसे उसी रूप में जानना आत्मज्ञान होता है। विचार आते हैं और जाते हैं, चीजें बदल जाती हैं, भावनाएँ बदल जाती हैं, लेकिन आत्म इनसे अप्रभावित है। ऐसा बोधपूर्ण होना ही आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान प्राप्त तभी होगा, जब दृष्टि भीतर, अंतर्मन पर होगी। यह कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे बाहर से अर्जित किया जाए, बल्कि यह उस स्वाभाविक बोध की ओर लौटना है, जो सदा से विद्यमान रहा है, पर अज्ञान के आवरण में छिपा रहता है।
आत्मज्ञान क्या होता है?
आत्मज्ञान वास्तव में आत्म का ज्ञान नहीं होता। हम कहते हैं आत्मज्ञान, लेकिन वास्तव में यह अनात्मा का ज्ञान होता है। जैसे आप बाहरी प्रपंच को अनात्मा के रूप में जानते हैं। जो इंद्रियों का विषय है, वह मैं अर्थात आत्म नहीं है।
लेकिन व्यक्ति शरीर और अनुभव को आत्मा मान बैठता है। आत्मज्ञान अर्थात बस यह जानना कि मन, विचार, इंद्रियाँ और इनसे उत्पन्न अनुभव या समझ अनात्मा हैं। यह कुछ नया जानना नहीं होता, बल्कि जो पहले से है, उसे ठीक से और पूर्ण रूप से जानना होता है।
ज्यादातर लोगों के लिए आत्मज्ञान प्राप्त करना उतना सहज नहीं होता, जितना बाहरी संसार को जानना होता है। क्योंकि यहाँ आपको बाहर नहीं देखना होता, भीतर देखना होता है; आँखों से नहीं, जागरूकता से। बाहरी संसार को जानने के लिए इंद्रियाँ पर्याप्त होती हैं, लेकिन भीतर के सत्य को जानने के लिए इंद्रियों से परे जाना पड़ता है, क्योंकि इंद्रियाँ स्वयं अनात्मा का ही एक भाग हैं। यही कारण है कि साधारण बुद्धि इसे समझने में असमर्थ रहती है, और मन बार-बार बाहर की ओर भागता है।
आत्म अवलोकन के लिए जागरूकता ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसका आधार कोई भी मान्यता हो। शुद्ध जागरूकता, जो मान्यताओं, धारणाओं और अंधविश्वास से परे हो। जिस क्षण जागरूकता किसी विचारधारा, परंपरा या पूर्वाग्रह से बंध जाती है, वह अपनी शुद्धता खो देती है और तब वह आत्मज्ञान का माध्यम नहीं बन पाती। इसलिए साधक को हर मान्यता से मुक्त होकर, केवल साक्षी भाव से भीतर देखना होता है।
जब आप स्वयं के प्रति जागरूक होते हैं, तब आप समझ पाते हैं कि जिसे आप आत्म के रूप में खोज रहे हैं, वह कोई दूसरी चीज है। लेकिन अज्ञानी मन उसे आत्म के रूप में धारण कर लेता है, जिसका मूल स्वार्थ होता है। आत्मज्ञान वहाँ नहीं होता, जहाँ व्यक्ति अपने स्वार्थ से मोहित होकर अहंकार को धारण करता है। इसके विपरीत, वह बस बोध में स्थापित होता है। अहंकार सदैव अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए नए-नए रूप गढ़ता रहता है, कभी ज्ञान के नाम पर तो कभी त्याग के नाम पर, परंतु बोधपूर्ण व्यक्ति इन सभी रूपों से अप्रभावित रहकर केवल द्रष्टा बना रहता है।
आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें?
जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं, वह आत्मज्ञान नहीं है, क्योंकि यह कोई पाने की बात नहीं होती। आपका कोई भी कर्म आपको आत्मज्ञान नहीं दिला सकता और न ही इसके लिए पुस्तकों का पढ़ना पर्याप्त है। आपको किसी नई चीज़ को नहीं जानना है। जो पहले से मान बैठे हैं, उसे ही जानना है। आप आत्मा को नहीं जानते, आप अनात्मा को जानते हैं, और उससे तादात्म्य रखना समाप्त होता है।
यह समझना आवश्यक है कि आत्मज्ञान की खोज में सबसे बड़ी बाधा यही है कि मन इसे भी एक लक्ष्य की तरह पाना चाहता है, जैसे वह अन्य सांसारिक वस्तुओं को पाना चाहता है। परंतु आत्मज्ञान किसी दूरी को तय करके नहीं मिलता, यह तो उस भ्रम के हटने से प्रकट होता है, जो अनात्मा को आत्मा समझने से उत्पन्न हुआ है। जितना अधिक मन शांत और निर्मल होता है, उतनी ही स्पष्टता से यह भेद प्रकट होता है।
आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद साधना तब शुरू होती है, जब संसार भर से आसक्ति विहीनता होती है। क्योंकि इस दुनिया की उत्पत्ति का कारण मानव शरीर है। संसार से जुड़ने के लिए शरीर से पहले जुड़ना पड़ता है, उसे आत्मा के रूप में स्वीकार करना पड़ता है। यही आसक्ति आत्मज्ञान का अभाव होती है।
जब आप या कोई बोधपूर्ण होता है, तो उसके कर्मों का केंद्र स्वार्थ नहीं होता, क्योंकि उसने अपनी मूल आवश्यकता को जान लिया है। लेकिन अज्ञानी अपनी आवश्यकता नहीं जानता, इसलिए संसार में अपने भीतर के स्वार्थ का समाधान ढूँढ़ता है। इस कारण वह चेतन अवस्था में सदैव दुनिया से जुड़ा रहता है। यह जुड़ाव ही बार-बार सुख-दुख के चक्र में उलझाए रखता है, क्योंकि जिस वस्तु में सुख खोजा जा रहा है, वह स्वयं क्षणभंगुर है।
आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए निस्वार्थ भाव से बस जानना चाहिए। ऐसा करने के लिए भी भीतर से मोह और उसके कर्मों का भंग होना आवश्यक है। इस प्रक्रिया में गुरु का मार्गदर्शन, सत्संग और नियमित आत्म-निरीक्षण सहायक सिद्ध होते हैं, क्योंकि अकेले मन बार-बार अपने ही बनाए भ्रमजाल में उलझ जाता है।
आत्मज्ञान के लाभ क्या हैं?
आत्मज्ञान से लाभ अतुलनीय होते हैं, लेकिन ऐसे भी नहीं कि आपको कुछ हासिल हो जाए। जो नुकसान आत्म-अज्ञानी व्यक्ति को ज्ञान के अभाव से होते हैं, वे नहीं होते। अज्ञान और अंधविश्वास कभी भी मानव को लाभ नहीं देते, चाहे वह दुनिया से संबंधित हों या आत्म से।
माया समाप्त होगी: हमने आपको बताया है कि माया अज्ञान के कारण मिथ्या कैसे बनती है। बाद में व्यक्ति इसमें इतना भ्रमित हो जाता है कि जीवन के आनंद को खो बैठता है। उसका सुखी होना, दुखी होना या संतप्त होना बाहरी दुनिया पर निर्भर करने लगता है। जैसी परिस्थिति होती है, वैसी ही भीतरी स्वस्थता भी प्रभावित होती है। इसे आप विस्तारपूर्वक जान सकते हैं कि मन क्यों विचलित होता है या मन क्यों व्याकुल होता है, तथा मन की इस स्थिति का कारण क्या है।
निर्भयता की प्राप्ति: जब व्यक्ति यह जान लेता है कि जो कुछ बदलता है, वह वह स्वयं नहीं है, तो शरीर और परिस्थितियों के परिवर्तन से उत्पन्न होने वाला भय स्वतः क्षीण हो जाता है। हानि-लाभ, मान-अपमान, जन्म-मृत्यु जैसी द्वंद्वात्मकता उसे विचलित नहीं कर पाती, क्योंकि उसकी पहचान अब इनसे परे स्थापित हो चुकी होती है।
संबंधों में स्वाभाविकता: आत्मज्ञानी व्यक्ति के संबंध स्वार्थ या अपेक्षा पर आधारित नहीं रहते। चूँकि वह अपनी पूर्णता को पहचान चुका होता है, इसलिए वह दूसरों से कुछ पाने की दृष्टि से नहीं जुड़ता, बल्कि स्वाभाविक करुणा और समझ के साथ जुड़ता है।
आध्यात्मिक परमानंद और मुक्ति: अज्ञान और उसके दोषों को पहचानकर आध्यात्मिक साधना शुरू होती है, जो आध्यात्मिक मुक्ति की साधना है। मुक्ति ही जीवन का सर्वोच्च आनंद है। यह आनंद किसी बाहरी उपलब्धि पर निर्भर नहीं होता, इसलिए यह स्थायी और अखंड रहता है, जबकि सांसारिक सुख सदैव परिस्थितियों के अधीन होकर आता-जाता रहता है।