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जीवन में इतना दुख क्यों हैं?

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इस संसार में निवास करने वाले सभी जीव सदा अपने सुख की ही कामना करते हैं। हर कोई चाहता है कि उसका जीवन आनंदमय और शांतिपूर्ण हो। लेकिन हमारी अज्ञानता के कारण हम यह नहीं जान पाते कि वास्तविक सुख कहां से प्राप्त होता है। हम यह भी नहीं सोचते कि सुख के आने का असली द्वार कौन-सा है।

जीव जब इस संसार में सुख की तलाश करता है तो वह विषयों और भोगों की ओर भागता है। उसे लगता है कि इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति ही सुख का कारण है। कोई मनचाही वस्तु मिल जाए तो मन प्रसन्न हो जाता है और न मिलने पर दुखी हो जाता है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे एक छोटा बच्चा खिलौने के लिए रोता है, और खिलौना मिल जाने पर हंसने लगता है। परंतु जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारी इच्छाएं भी बड़ी होती जाती हैं, पर हमारी समझ उसी बच्चे जैसी रह जाती है।

एक इच्छा पूरी हुई नहीं कि दूसरी इच्छा सामने खड़ी हो जाती है। और अगर वह दूसरी भी पूरी हो गई तो तीसरी तैयार है। इस प्रकार मनुष्य इच्छा और दुख के चक्र में फंसा रहता है। वास्तव में इस संसार में अधिकांश इच्छाएं कभी पूरी ही नहीं होतीं और तब दुख ही दुख रह जाता है। कुछ लोग तो इच्छाओं के न पूरे होने पर अवसाद और मानसिक पीड़ा में डूब जाते हैं।

लोग यह नहीं समझ पाते कि सुख का स्रोत बाहर की वस्तुएं नहीं हैं। वास्तविक सुख हमारे भीतर है, हमारे अंतरात्मा में है। आत्मा ही आनंद का महासागर है। परमात्मा हमारे भीतर ही विराजमान हैं और वे ही हमें शांति और आनंद प्रदान करते हैं। वही कारण है कि इस दुखरूपी संसार में भी हमें क्षण-भर का सुख अनुभव होता है।

आजकल अधिकांश लोग यह मानते हैं कि सुख केवल धन, संपत्ति, मान-सम्मान और भौतिक वस्तुओं से ही मिलता है। समाज में जिसकी प्रतिष्ठा है, जिसके पास धन है, वही सुखी होगा। लेकिन यह धारणा बिल्कुल गलत है। अक्सर देखा जाता है कि कोई गरीब और साधारण व्यक्ति भी अमीर से अधिक सुखी जीवन जीता है। सुख का संबंध बाहरी वस्तुओं से नहीं बल्कि हमारे मन और आत्मा से है।

योगी इस मामले में वास्तव में सबसे सौभाग्यशाली होते हैं। आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा वे आत्मा को पहचान लेते हैं और आत्मानंद में स्थित हो जाते हैं। वे बिना किसी वस्तु की प्राप्ति के ही ऐसा आनंद पाते हैं जो संसार के असंख्य इच्छाओं की पूर्ति से भी नहीं मिल सकता। योगी जान लेते हैं कि असली सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा में है।

इस संसार में वास्तव में बुद्धिमान वही है जिसके भीतर मुक्ति की लालसा जाग उठी है। अन्यथा चाहे कोई कितना भी चतुर, ज्ञानी या बुद्धिमान क्यों न हो, माया उसे भ्रमित कर देती है। संसार के दुख और विपत्तियों से कोई बच नहीं सकता। अगर उसके भीतर मुक्ति की खोज ही नहीं है, तो उसकी सारी बुद्धिमानी किस काम की?

आनंद का एकमात्र स्रोत आत्मा है। बाहर सुख खोजने वाला वास्तव में अज्ञानी है। यह ऐसा ही है जैसे किसी के पैरों के नीचे मधुर जल का महासागर हो और वह आसमान से टपकने वाली कुछ बूंदों के लिए तरस रहा हो। उसका पूरा जीवन बस उन्हीं बूंदों में बीत जाता है। यही काम माया में फंसे लोग करते हैं।

परमात्मा की कृपा से ही जीव का उद्धार संभव है। लेकिन परमात्मा भी उसी की मदद करते हैं जो सच्चे हृदय से उन्हें पुकारता है। जो संसार और अहंकार के मोह में फंसा हुआ है और उसमें ही मर मिटना चाहता है, उसका कल्याण कोई नहीं कर सकता।

अज्ञानी लोग जब सुख का अनुभव करते हैं तो यह मान लेते हैं कि यह सुख हमेशा रहेगा। उन्हें लगता है कि यह संसार दूसरों के लिए दुखदाई हो सकता है, पर उनके लिए तो सुखमय है। लेकिन यह भ्रम अधिक समय तक टिकता नहीं। जो वस्तु पास है, वह दूर भी जा सकती है। और अगर पास की वस्तु बनी भी रहे तो मन कभी संतुष्ट नहीं होता। मन को जितने भी सुख दे दो, अंततः वह दुखी ही हो जाता है क्योंकि उसका स्वभाव ही असंतुष्ट रहना है।

वास्तव में जो आनंद इच्छाओं की पूर्ति के समय अनुभव होता है, वह वस्तु के कारण नहीं होता। जब मन की अशांति क्षणभर के लिए शांत होती है, तब आत्मा का आनंद प्रकट होता है। उसी अनंत आनंदसागर की कुछ बूंदें हम पर गिरती हैं और हम उसे सुख समझ लेते हैं। लेकिन अज्ञानी लोग इसे समझ नहीं पाते और यह मान लेते हैं कि यह सुख उनकी इच्छा पूरी होने से आया है।

योगी जानते हैं कि अहंकार और विषयों से मन की आसक्ति ही दुख का कारण है। जब आसक्ति समाप्त हो जाती है, तब दुख का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। जो आत्मानंद में स्थित है, उसके लिए यह संसार दुखरूप नहीं रह जाता।

सुख और दुख वास्तव में केवल मन के कारण हैं। यदि मन सरल और निर्मल है तो संसार की कोई भी परिस्थिति उसे दुखी नहीं कर सकती। जो अहंकार और आसक्तियों से मुक्त है, उसका इस माया में कोई विनाश नहीं कर सकता।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि मनुष्य का अपना मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र है और वही उसका सबसे बड़ा शत्रु भी बन सकता है। यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह अपने मन को मित्र बनाए या शत्रु। अगर मन मित्र है तो जीवन में परम आनंद प्राप्त होगा और यदि शत्रु है तो दुख और अशांति ही उसका साथ देंगे।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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