अगर आप मुण्डक उपनिषद् के तृतीय मुण्डक के द्वितीय खंड के नौवें श्लोक को पढ़ेंगे तो आप वहां यह वाक्य पाएंगे ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’ जिसका अर्थ होता है कि ‘ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म होता हैं’ यानि कि अगर आप ब्रह्म को जान रहे है तो आप ही ब्रह्म हैं, अन्यथा नहीं।
यह वाक्य सुनने में बहुत सरल लगता है लेकिन इसके भीतर जो अर्थ छिपा हुआ है वो इतना गहरा है कि इसे समझने के लिए हमें बहुत धैर्य से, श्रद्धा से इसकी परतों को खोलना पड़ेगा। यह कोई साधारण कथन नहीं है, यहीं पूरे वेदांत का सार अपने में रखे हुए हैं। इसकी महिमा वेदांत के चार महावाक्यों जैसी हैं।
देखिए ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं होती कि जैसे कि भौतिक संसार की पदार्थिक वस्तुएं होती है, जिन्हें आप देख सकें, छू सकें, या जिनका कोई आकार प्रकार हो।
वह इंद्रियों का मन का विषय नहीं है, बुद्धि की पकड़ में भी पूरी तरह नहीं आता। इसलिए ब्रह्म क्या होता हैं और ब्रह्म को जानने का अर्थ क्या है इसके बारे में हम चर्चा करने जा रहे हैं, और उसके बाद फिर यह ब्रह्मविद् केवल ब्रह्म ही कैसे होता हैं इस पर भी विस्तार से बात करेंगे।
‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’ का अर्थ क्या होता हैं?
ब्रह्मविद् – इससे यह अर्थ है कि जो ब्रह्म को जानने वाला है, जो इस साधना में उतर चुका है, जिसने केवल शास्त्रों को पढ़ा नहीं है बल्कि उस ज्ञान को अपने भीतर उतरा भी है।
ब्रह्म को जानने वाले के लिए एक दूसरा भी शब्द है समान अर्थ वाला ब्राह्मण, लेकिन ये किसी विशेष जाती का सूचक नहीं है, ब्राह्मण कोई भी हो सकता है, चाहे वो किसी भी कुल में जन्मा हो, चाहे उसकी सामाजिक स्थिति कुछ भी हो। यहां ब्राह्मण शब्द का प्रयोग जन्म के आधार पर नहीं बल्कि उस आंतरिक अवस्था के आधार पर किया गया है जिसमें व्यक्ति ब्रह्म को जान चुका होता है।
ब्रह्मैव – यानि कि निश्चय ही ब्रह्म और केवल ब्रह्म ही।
और भवति यानि होता हैं
अर्थ : ब्रह्म को जानने वाला केवल ब्रह्म ही होता है।
‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’ क्या संदेश देता हैं?
देखिए ब्रह्म को जानने का अर्थ ऐसा नहीं होता कि आप किसी सांसारिक बात को जान रहे है, जैसे आप कोई विषय पढ़ रहे हों या कोई जानकारी इकट्ठा कर रहे हों, क्योंकि ब्रह्म अचिंत्य है अज्ञेय है, उसे न तो जाना जा सकता है न कोई उसे बारे में कुछ बताया जा सकता हैं।
जो भी भाषा में कहा जाएगा, जो भी शब्दों में बांधा जाएगा, वह ब्रह्म नहीं होंगा, कुछ और ही होंगा भलेही आप या सामने वाला इसे ब्रह्म कह रहे है। क्योंकि ब्रह्म शब्दों और विचारों की सीमा से परे है।
यहां ऋषि अंगीरथ बस इतना कह रहे है कि संसार को जानो, इसके यथार्थ को जानो, ब्रह्म संसार की कोई वस्तु नहीं है, लेकिन जो अन्य सारी दुनिया के बारे में अपने समझ रखा है ;मान रखा है, उनके यथार्थ को जानो, क्या वो वास्तव में है भी या केवल वास्तविकता का भ्रम हैं.
यह प्रश्न बहुत गहरा है, अल्पज्ञानी इसपर हसेंगे लेकिन साधक इसपर विचार करेंगे और इसे बार बार अपने भीतर पूछते रहना चाहिए कि जो कुछ भी मैं देख रहा हूं, अनुभव कर रहा हूं, क्या वह वास्तव में वैसा ही है जैसा मुझे प्रतीत हो रहा है।
जब ऐसा कहा जाता हैं कि ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही होता हैं तो अर्थ उससे है जो इस संसार के यथार्थ को जानता है वो बोधपूर्ण हैं, दुनिया के जितने अंधविश्वास है उसे इसने अंधविश्वास की तरह ही जान लिया है। जो व्यक्ति इस भेद को कर पाता है, जो यह पहचान पाता है कि कौन सी बात सत्य है और कौन सी बात केवल मान्यता है, वहीं वास्तव में जागरूक कहलाने का अधिकारी है।
देखिए जो संसार इंद्रियों से प्राप्त हो रहा है आपके मन में बसा है, आपकी बुद्धि जिसमें विचर रहीं, क्या वह सच है इसपर संदेह करने का नाम है ब्रह्म को पाने की साधना करना, यहीं सनातन धर्म कहा गया, अर्थात आप मिथ्या से सत्य को ओर बढ़ रहे है, सत्य से प्रेम यानि मिथ्या से विद्रोह। यह विद्रोह किसी बाहरी वस्तु के प्रति नहीं है, यह विद्रोह अपने ही भीतर बैठी उन धारणाओं के प्रति है जिन्हें हमने बिना जांचे परखे सत्य मान लिया है।
आप जान रहे है संसार को और आपका मन भी इसी के क्षेत्र में आता हैं, तो पहला काम यहीं है कि मन को जानो, अहंकार को जानो कि अहंकार क्या होता हैं? क्योंकि यहीं सबसे निकट हैं। मन और अहंकार से गुजरे बिना कोई भी व्यक्ति सीधे ब्रह्म तक नहीं पहुंच सकता,
क्योंकि यही मन और अहंकार वो पहली धारणा है जो हमें यथार्थ से दूर रखता है। इसलिए जो साधक इस मार्ग पर चलना चाहता है उसे सबसे पहले अपने ही भीतर झांकना होगा, अपने ही मान्यताओं विचारों और भावनाओं की जांच करनी होगी। कही ऐसा तो नहीं कि मिथ्या के बनाने का कारण भीतर है।
जो मिथ्या को मिथ्या की तरह जानता है वहीं वास्तव में ब्रह्म को जानता है, और ब्रह्म को जानने वाला भी ब्रह्म ही होता हैं। यह एक सतत प्रक्रिया है मिथ्या को मिथ्या को तरह जानते रहने की, जिसने आत्म अवलोकन भी हैं।
जिसमें व्यक्ति धीरे धीरे मिथ्या को पहचानते हुए सत्य की ओर बढ़ता जाता है।