परमात्मा कौन है?
परमात्मा आपका ही पवित्र स्वरूप है क्योंकि परम और आत्मा से ही परमात्मा शब्द बना है। परम यानि सर्वोच्च, जो सबसे ऊपर का है और आत्मा यानि आप।
लेकिन आप ऐसा नहीं मान सकते कि अभी आप जिस हालत में हैं ऐसे ही परमात्मा हैं। यहां परम पर ध्यान दीजिए, जिसका अर्थ होता है वो जो सर्वोच्च है सबसे पवित्र है जिसकी कोई तुलना नहीं।
जब तक आप शरीर, मन के साथ अपनी पहचान बनाए रखते हैं, तब तक आप अपनी परम स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि शरीर सीमित है, नाशवान है, और परम तो असीम और शाश्वत है।
अगर आपको ऐसा ज्ञान हो जाए कि आप शरीर और इसके द्वारा निर्मित संसार से पृथक हैं, इसके साक्षी हैं, शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मन हैं, तो आप अपनी परम स्थिति को प्राप्त हो चुके हैं। यह ज्ञान कोई कल्पना नहीं बल्कि आत्मानुभूति है, जिसमें आप देखते हैं कि शरीर आता है और जाता है, पर जो देखने वाला है, जो साक्षी है, वह सदा एक ही रहता है। वही साक्षी भाव आपकी वास्तविक पहचान है, न कि यह शरीर जिसे आप अभी अपना मान बैठे हैं।
अब जो शरीर के लिए है वह आपके लिए नहीं है। जीवन मृत्यु, सुख दुख, अज्ञान, यह सब शरीर के लिए होता है। सीमा मन की होती है, पर्याप्त बुद्धि तक ही यह सारी उलझनें सीमित रहती हैं। लेकिन परमात्मा शाश्वत है, आदि और अंत से रहित है। परमात्मा जीव के इस संसार से परे है, इसीलिए जो कुछ भी इस संसार में जन्म लेता है और नष्ट होता है, वह परमात्मा का स्वरूप नहीं हो सकता। परमात्मा तो वह तत्व है जो हर परिवर्तन के पीछे अपरिवर्तित रहता है, हर आने जाने वाली अस्थिर वस्तु के पार स्थिर है।
परमात्मा कैसे मिलता है?
अगर हम जीवन को सार्थक करना चाहते हैं, माया के बंधनों में जीवन व्यतीत करके उसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहते, तो हमें परमात्मा की खोज शुरू करनी चाहिए, केवल उसे पाने की साधना करनी चाहिए। यह खोज कोई बाहरी यात्रा नहीं है, बल्कि भीतर की ओर मुड़ने की प्रक्रिया है, जहां हम आत्म-अवलोकन से और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करते हैं।
क्योंकि केवल परमात्मा को प्राप्त होकर ही जीवन में नित्य आनंद को पाया जा सकता है। अन्यथा यहां केवल माया ही भासती है, और माया भी उन्हीं की बनाई हुई है जो इसमें भ्रमित हो चुके हैं जिनका अपना मन ही उसका शत्रु हो गया। हमने पहले भी चर्चा की है कि माया कैसे आपके ही अज्ञान से बन जाती है। जब तक अज्ञानी रहता है, तब तक माया अपना जाल फैलाती रहती है, और जीव उसी में उलझकर अपने मूल स्वभाव को भूल जाता है।
परमात्मा को पाने का अर्थ यह भी होता है कि आप मुक्ति को प्राप्त हो गए, अपना आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया। मृत्यु से अमरत्व को प्राप्त कर लिया। यह अमरत्व शरीर का अमरत्व नहीं है, क्योंकि शरीर तो नाशवान ही रहेगा। यह अमरत्व उस बोध का है जो यह जानता है कि मैं शरीर नहीं हूं, इसलिए मृत्यु मुझे स्पर्श ही नहीं कर सकती। जो कभी जन्मा ही नहीं, वह मरेगा कैसे?
क्योंकि परम और आत्म यानि वह आत्म जो सर्वोच्च है, परमात्मा आपकी कल्पना या इंद्रियों का विषय नहीं है। इसीलिए आप शरीर होने के नाते परमात्मा को जान नहीं सकते जैसे कि आप संसार को जानते हैं। आंखें इसे देख नहीं सकतीं, कान सुन नहीं सकते और ऐसे ही मन जिसका मनन नहीं कर सकता। संसार को जानने के लिए इंद्रियां और मन पर्याप्त हैं, लेकिन परमात्मा को जानने के लिए इंद्रियों और मन से परे जाना पड़ता है, क्योंकि वह स्वयं इंद्रियों और मन का भी आधार है, उनका विषय नहीं।
परमात्मा को जानने का अर्थ होता है सत्य में स्थापित होना, मिथ्या पर विश्वास न करना और उससे जुड़ना नहीं, क्योंकि सत्य को ही दूसरे शब्द में परमात्मा कहते हैं। और आप सत्य को भी तभी जान सकते हैं जब आपको झूठ और सत्य में भेद समझ आए कि क्या था जो झूठ था और उसके मिटने से अभी जो प्रकट हुआ वो सत्य है। जो माया को मिथ्या की तरह ही जानता है, अहंकार को चेतन पर बंधन की तरह ही जानता है, वह ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान कहा जाता है।
जहां हर वस्तु, हर विचार, हर अनुभव को उसकी वास्तविकता में देखा जाता है, कि वो आगे भ्रमित करने वाला है, संसार में भटकाने वाला है।
आपके भीतर ऐसा क्या है जो मिथ्या था, और ऐसा क्या है जो सत्य है, जब आप ऐसे बोधपूर्ण हो जाते हैं, तब आप वास्तव में परमात्मा को जानने वाले होते हैं। यह बोध एक क्षण में नहीं आता, इसके लिए निरंतर विचार, मनन और साधना आवश्यक होती है। जितना अधिक आप अपने भीतर झांकेंगे, देखेंगे कि कैसे आप जुड़े हुए हैं किसी सांसारिक वस्तु से या व्यक्ति से, उतना ही स्पष्ट होता जाएगा कि क्या सत्य है और कौन सा भाग आपको केवल भ्रम में लेता है। और एक बात और ये दोनों एक साथ नहीं होते एक तो आप भ्रमित हो सकते हैं या बोधपूर्ण।
यहां इस दुनिया में ज्यादातर लोगों की खोज सत्य की खोज नहीं होती। अहंकार से मोहित हो जाने के कारण वे बस संसार को ही सर्वोपरि मानते हैं। यही पूरा जीवन चलता रहता है, इसको भोगना ही उनके लिए परम सुख है क्योंकि दूसरा कोई विकल्प नहीं है। एक तो वे भोगें या तो त्यागें, ये दोनों संसार हैं। भोगेंगे तो भी संसार में ही, त्यागेंगे तो भी संसार में ही। प्रेम भी संसार से, ईर्ष्या, घृणा भी संसार से।
लेकिन इसके पार जीव नहीं है, केवल सत्य है। लेकिन उनको सत्य से कोई आकर्षण ही नहीं है कि कभी सत्य की खोज भी शुरू करें, क्योंकि उनके लिए संसार ही इतना प्रिय है कि सत्य की खोज क्यों ही करें? यही कारण है कि अधिकांश जीवन भोग विलास में ही बीत जाता है, और आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर कोई ध्यान ही नहीं जाता। संसार की चमक इतनी आकर्षक लगती है कि उसके पीछे छिपा सत्य कभी दिखाई ही नहीं देता।
परमात्मा की खोज का अर्थ ऐसा होता है कि आपको उस परम पवित्र चैतन्य स्व से प्रेम है और आप उसमें संसार से कोई दोष होना नहीं चाहते, क्योंकि वह परम है और आपकी गति सदैव उसकी ओर है। उसकी ओर बढ़ने का अर्थ होता है कि आप अपने भीतर से अपनी सफाई कर रहे हैं, कामना, वासना, क्रोध ऐसी बुराइयों को पहचान कर उन्हें त्याग कर अपने को भीतर से निर्मल कर रहे हैं।
परमात्मा की ओर गति यानि जो आपको स्वयं से दूर करता है, उसकी ओर न जाना। आपको स्वयं से दूर माया करती है, जब आप उसके क्षणिक सुखों से आसक्त हो जाते हैं। यह आसक्ति ही वह बंधन है जो जीव को बार बार संसार की ओर खींचती है और उसको घुमाती है जैसे बवंडर चीजों को घूमता है, अपने में।
और ये उसे अपने वास्तविक स्वरूप से दूर रखती है। जो साधक इस आसक्ति को पहचान लेता है और धीरे धीरे उससे मुक्त होने का प्रयास करता है, वही वास्तव में परमात्मा की ओर बढ़ने वाला साधक कहलाता है, उसकी साधना है परमात्मा को पाना।