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‘ओम’ मंत्र जाप से क्या लाभ मिलते हैं और इसे कैसे करें?

क्या मुझे ओम के जाप की अवश्यकता हैं?

अगर आप शास्त्रों को पढ़ें तो वहां पाएंगे कि ओम को प्रणव कहा गया हैं, यानि वो ध्वनि जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये कोई साधारण शब्द नहीं हैं, बल्कि ऐसी ध्वनि हैं जिसमें पूरे अस्तित्व का सार समाया हुआ हैं। अगर आप ऐसा कहें कि कोई एक ध्वनि जो ब्रह्माण्ड की सूचक है, जिसमें उसका यथार्थ ज्ञान समाया हैं, तो वो ध्वनि ओम की ही होंगी। कोई और शब्द या ध्वनि इतनी समग्रता से इस सत्य को नहीं दर्शा सकती।

देखिए, ओम की ध्वनि में तीन सुर हैं  अ, ऊ और म। ये तीन सुर आरंभ, मध्य और अंत को दर्शाते हैं। ब्रह्मांड इन्हीं तीन नियमों के भीतर समता हुआ हैं, यानि हर वस्तु का जन्म होता हैं, वो कुछ समय स्थित रहती हैं, और फिर उसका अंत हो जाता हैं। ओम इस पूरी यात्रा को समेटे हुए हैं ब्रह्मांड के आरंभ से लेकर उसके विस्तार तक, और फिर उसके अंत तक की यात्रा।

लेकिन ओम का अर्थ केवल इतना ही नहीं हैं। जो साधक ओम को जप में लीन होता हैं, वो वास्तव में सांसारिक माया का विद्रोह कर रहा होता हैं। ये एक बहुत गहरी बात हैं  जब आप ओम में डूबते हैं, तो आप उस भ्रम को चुनौती दे रहे होते हैं जो आपको संसार में बांधे रखता हैं। क्योंकि ओम संसार से परे जाने का मार्ग हैं।

ब्रह्मांड की कोई भी वस्तु या व्यक्ति के यथार्थ का बोध आपको ओम में ही होंगा, क्योंकि ये प्रणव अक्षर चेतना का शुद्धतम रूप हैं। इससे शुद्ध कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि ये किसी वस्तु या विचार तक सीमित नहीं, बल्कि स्वयं चेतना का मूल स्वरूप हैं।

ओम के जाप का सही अर्थ क्या होता हैं? अगर आप गहराई में जाएंगे तो पाएंगे कि ओम अपने आप में वास्तव में किसी वरदान से कम नहीं हैं। ओम में ही आपका पूरा जीवन समाया हैं आपका जन्म, जीवन और मृत्यु, ये सब इसी के भीतर समाहित हैं। इसका मतलब ये हैं कि जो कुछ भी आप अनुभव करते हैं, चाहे वो जन्म हो, जीवन का सफर हो, या मृत्यु सब कुछ उसी एक तत्व से उपजता हैं ।

किन्तु ऐसा ज्ञान जो सांसारिक भ्रमों से पार लगा दे, वही वास्तव में ओम हैं। माया अज्ञान की अभिव्यक्ति हैं, जो व्यक्ति को बंधन में पूरी तरह उलझा देती हैं। ये माया इतनी सूक्ष्म हैं कि व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि वो कब और कैसे इसमें फंस गया। अगर आप विस्तार से जानना चाहते हैं कि माया कैसे उत्पन्न होती हैं, तो इसपर हम अन्य लेख में विस्तार से चर्चा कर चुके हैं।

ओम के जाप से मुझे क्या आध्यात्मिक लाभ हो सकते हैं?

आध्यात्मिक मुक्ति: जब तक संसार के यथार्थ को नहीं जाना जाएं, जो इंद्रियों के आगे प्रकट हैं, तब तक मुक्ति होंगी नहीं। क्योंकि मुक्ति का दूसरा नाम ही बोध होता हैं बोध इस बात का कि संसार क्या हैं और संसारी क्या हैं।

ओम वास्तव में आपको किसी अलौकिक लोक की ओर नहीं ले जाता, ये इसी ब्रह्मांड के सच को आपके सामने लाने में सहायक हैं ब्रह्मांड वास्तव में जैसा हैं, ठीक वैसा ही।

ब्रह्मांड तो मूढ़ के सामने भी हैं, हर किसी के सामने प्रकट हैं, लेकिन क्या वास्तव में वो उसे वैसा ही देख पाता हैं जैसा वो हैं? अगर आप उससे पूछ कर देखेंगे तो पाएंगे कि वो उसके बारे में कुछ नहीं जानता। वो आपको हजारों तरह के अंधविश्वास बताएगा। सबसे पहले तो यही कहेगा कि मैं, यानि ये शरीर, ब्रह्मांड से अलग अस्तित्व हूं जबकि वास्तव में ऐसा नहीं हैं, बहुत अंतर हैं इस समझ और यथार्थ में।

आध्यात्मिक परमानंद: जब चेतना में मन उत्पन्न होता हैं, तब वो व्यक्ति अधूरा हो जाता हैं, क्योंकि मन का दूसरा नाम ही अधूरापन हैं, क्योंकि वो शरीर से जुड़ा होता हैं। चेतनतत्व आत्म मन और इंद्रियों से प्रभावित होकर मानता हैं कि मैं शरीर हूं, जो अनुभव का विषय हैं, यही मेरा स्वरूप हैं  तब संसार सामने आता हैं। ये पूरी प्रक्रिया एक भूल से शुरू होती हैं, जहां शुद्ध चेतना खुद को शरीर और मन के साथ जोड़ लेती हैं।

ओम मंत्र यही उजागर करता हैं कि समस्त भौतिक का आधार अभौतिक हैं। जब कोई ओम में ध्यानस्थ होता हैं, तो वो जानता हैं कि संसार के अनुभव का मूल ओम ही हैं। यहीं परम आनंद को उपलब्ध होना हैं, क्योंकि अब कोई अनुभव बचा ही नहीं हैं  ओम के साक्षी हो गए, यानि संपूर्ण के साक्षी हो गए। जब साक्षित्व इतना गहरा हो जाए कि अनुभव करने वाला और अनुभव, दोनों का भेद मिट जाए, तभी ये सर्वोच्च परमानंद कहा जाता हैं।

आत्मिक सुधार: आपके भीतर जो क्लेश हैं, मानसिक विकार हैं, वृत्तियां हैं, उनका निवारण करने के लिए आध्यात्मिक साधना और आत्म-अवलोकन चाहिए होता हैं। अगर आप जानेंगे कि ध्यान और योग कैसे आपके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं, तो आप समझ पाएंगे कि ये केवल बाहरी क्रियाएं नहीं, बल्कि भीतर की स्वस्थता का माध्यम हैं।

आप भीतर की ओर दृष्टि कर सकें, इसके लिए ओम अत्यंत सहायक हो सकता हैं, क्योंकि ओम के जाप में लीन होकर आप अनासक्त भाव से भीतर देख पाते हैं। ये जब आप बिना किसी लगाव के अपने भीतर के विचारों और वृत्तियों को देखते हैं, तो वो अपने आप शांत होने लगती हैं।

आत्मिक पवित्रता: मन को निर्मल करने का इससे सरल कोई साधन नहीं हैं, क्योंकि ओम शुद्ध चेतना का ही दूसरा नाम हैं। ओम यानि वो जो सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय का परम कारण हैं।

आपके भीतर की अशुद्धता को नाश करने के लिए आप इसमें स्थित हो सकते हैं, इस भाव से कि मुक्त होना हैं दोषों से। या फिर इस जिज्ञासा से कि जानना हैं कि मेरे भीतर जो मलीनताएं हैं, क्या वही सच हैं, या इसके परे भी कुछ हैं। यही जिज्ञासा साधक को आगे की ओर धकेलती हैं, और धीरे-धीरे उसे उस शुद्ध तत्व की ओर ले जाती हैं जो हर मलीनता से परे हैं।

ओम के जाप से मानसिक लाभ क्या होते हैं?

मानसिक शांति को प्राप्त होने में सहायता होती हैं, क्योंकि तनाव और चिंता का निवारण करने में आप इसकी सहायता लेते हैं। जब मन बार-बार भटकता हैं, चिंताओं में उलझता हैं, तब ओम का जाप एक ऐसा आधार देता हैं जिस पर मन टिक सके।

ओम आपको वास्तव में परम शांति की ओर ले जाता हैं  वो पवित्र आत्म जो सांसारिक आकृतियों से मुक्त हैं। इससे आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता आती हैं, क्योंकि जब मन बाहरी उठा-पटक से हटकर भीतर की स्थिरता से जुड़ता हैं, तो उसे एक ठोस आधार मिल जाता हैं। इससे जीवन को सुधारने की प्रेरणा भी मिलती हैं।

और साथ ही, भावनात्मक संतुलन बनाने में भी मदद मिलती हैं, क्योंकि योग आपको अत्यंत समता की ओर ले जाता हैं। समता का मतलब हैं कि सुख-दुख, लाभ-हानि जैसी परिस्थितियों में भी मन विचलित न हो। अगर आप जानना चाहते हैं कि योग में ‘समाधि’ और ‘समाधिस्थ’ किसे कहते हैं, तो इसे पढ़ें, इसमें हमने विस्तार से चर्चा की हैं।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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