Read this Blog in:

आत्मआध्यात्मदर्शनविज्ञान

मेरा मन व्याकुल क्यों होता है?

मेरा मन व्याकुल क्यों होता है?

देखिए, मन केवल आपका ही नहीं, अधिकांश लोगों का व्याकुल होता है। मन स्वयं को खोना नहीं चाहता, वह मिटना नहीं चाहता, वह झुकना नहीं चाहता।

प्रायः मन का स्वभाव ही ऐसा होता है। वह अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है, चाहे उसके कारण उसे कितनी ही अशांति और पीड़ा क्यों न सहनी पड़े।

किन्तु जब ऐसी अवस्था उत्पन्न हो जाती है, जब बाहरी परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन जाती हैं कि व्यक्ति को समझ आने लगता है कि अब मन का अस्तित्व समाप्त होने वाला है, तब वह छटपटाने लगता है।

वह स्वयं को बचाने के लिए अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न करता है, नए-नए तर्क वृत्तियां खोजता है और किसी न किसी प्रकार अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है।

जब मन को संसार समाप्त कर रहा होता है, तब वह स्थिति अत्यन्त दुःखद होती है। व्यक्ति अनेक प्रकार के कष्टों का अनुभव करता है।

और बाद में इतना दुःख भोगने के बाद भी मन का अस्तित्व बना ही रह जाता है, क्योंकि पीड़ा का मूल कारण अभी भी समाप्त नहीं हुआ होता।

किन्तु जब मन को अहम का यथार्थ बोध (आत्म बोध) की अग्नि जलाती है, तब उसका अज्ञान ही भस्म हो जाता है। इसी प्रकार सांसारिक बन्धनों से मुक्त होना ही आध्यात्मिक मुक्ति है।

यह मन की दासता से मुक्ति हैं, अज्ञान का अंत है। जब तक मन स्वयं को शरीर और संसार से जोड़े रखता है, तब तक वह बन्धन में रहता है; किन्तु जैसे ही यह भ्रम समाप्त होता है, वैसे ही मुक्ति का द्वार खुल जाता है।

संसार में आपके मन का होना ही उचित नहीं है। उससे कभी थोड़ा सुख अवश्य मिलता है, किन्तु वह सुख भी तभी तक रहता है, जब तक आन्तरिक पीड़ा कुछ समय के लिए भुला दी जाती है।

वास्तव में वह पीड़ा समाप्त नहीं होती, केवल दब जाती है। किन्तु केवल उसकी उपेक्षा कर देने से वह मिटती नहीं। भीतरी पीड़ा को उसके वास्तविक स्वरूप में पहचानना और उसके कारण को समझकर उसका पूर्णतः समाप्त हो जाना, अर्थात परम आनंद को उपलब्ध जो जाना

जिसके केंद्र में अहंकार हो वह मन कैसे व्याकुल होता है?

प्रायः जो मन व्याकुल होता है, उसकी संरचना ऐसी होती है कि उसके केंद्र में अहंकार होता है। अहंकार का अर्थ है—”मैं शरीर हूँ और इस शरीर की एक विशेष पहचान है।” ऐसी मान्यता ही अहंकार है।

किन्तु यदि वास्तविकता में देखा जाए, तो उसमें कुछ भी विशेष नहीं है। जैसा वह है, वैसा ही उसका पड़ोसी भी है। शरीर प्रकृति का ही एक अंश है, इसमें  ‘मैं’ जैसा कुछ नहीं होता, अगर यथार्थ ज्ञान देखे तो।

मन तब व्याकुल होने लगता है, जब वह जिस संसार से जाकर चिपकना चाहता है, अपने को जिस भोग का भोक्ता मान रहा होता है, उसे वह भोग नहीं पाता, अथवा कोई दूसरा उसे प्राप्त करने लगता है।

तब उसके भीतर यह विचार उठता है कि “जो मेरा है, उसे किसी और ने प्राप्त कर लिया” अथवा “जो मेरा था, वह मुझसे दूर हो रहा है।” यही विचार उसके भीतर अशांति और व्याकुलता उत्पन्न करते हैं।

अब विचार कीजिए कि उसके केंद्र में क्या है? केंद्र में शरीर है, शरीर की पहचान है और उससे जुड़ी हुई ‘मेरे’ धारणा है। जब केंद्र ही ऐसा है, तब आप व्याकुल नहीं होंगे तो क्या होंगे?

आपने अपने जीवन के केंद्र में उसी वस्तु को स्थापित कर रखा है, जो व्याकुलता, विक्षिप्तता, दुःख, अशान्ति और तनाव की जननी है। उसी से ये सभी विकार जन्म लेते हैं और उसी की रक्षा करने में मन निरन्तर लगा रहता है।

क्या मन की व्याकुलता का कोई अंत होता है?

व्याकुलता या तनाव मन की एक बीमारी है, जो उसे बार-बार घेरती रहती है। इसका कारण भी वही है कि जब भोक्ता से भोग दूर जाने लगता है, जब मानसिक आसक्ति का विषय प्राप्त नहीं हो रहा होता, अथवा उससे छिनने लगता है, तब मन व्याकुल होने लगता है।

तब उसका मोह अपना स्वरूप बदल लेता है। जैसे गिरगिट अपना रंग बदलता है, वैसे ही वही आसक्ति और ममता बाद में दुःख, क्रोध, भय, ईर्ष्या, असुरक्षा और अनेक प्रकार के मानसिक विकारों में परिवर्तित हो जाती है।

देखने में ये सब अलग-अलग प्रतीत होते हैं, किन्तु इनका मूल कारण एक ही होता है एक ही चीज अपने अनेक रंग बदलती है।

इनका उपचार भी है। यदि आप जीवन को सही प्रकार से जीना चाहते हैं, तो आपके जीवन में ध्यान क्यों आवश्यक है?

क्योंकि अपने मन को जाने बिना, उसके स्वभाव को समझे बिना और उसके भ्रम को पहचाने बिना आप उससे मुक्त नहीं हो सकते।

ध्यान मन को दबाने का नहीं, बल्कि उसे समझने का मार्ग है। जब मन को सही रूप में देखा जाता है, तभी उससे परे जाने की संभावना उत्पन्न होती है।

जब आपका मन दुःख की ओर बढ़ने लगता है, तब आपको प्रायः इसका आभास भी नहीं होता कि आप संकट की ओर बढ़ रहे हैं।

भ्रम का स्वभाव ही ऐसा होता है। जैसे पतंगों को यह ज्ञात नहीं होता कि अग्नि उनका विनाश कर देगी, अज्ञान के कारण वे उसी में कूद पड़ते हैं; उसी प्रकार मनुष्य भी अपने अज्ञान के कारण बार-बार उन्हीं पीड़ा की ओर आकर्षित होता है, जो अंततः उनका दुःख  बनती हैं।

जब तक इस अज्ञान का अंत नहीं होता, तब तक मन की पीड़ा भी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि आत्मज्ञान (स्वयं को जानने) के बिना मन की व्याकुलता का स्थायी अंत संभव नहीं है।

ABOUT THE AUTHOR

Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.

Leave a Comment

Donate
UPI QR Code