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‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ महावाक्य आपको क्या संदेश देता हैं?

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प्रज्ञानं ब्रह्म भी अद्वैत परम्परा के चार महावाक्यों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण महावाक्य है, जिसके प्रचार और व्यवस्थित दार्शनिक प्रतिपादन का श्रेय आदि शंकराचार्य को जाता है। यह महावाक्य मूल रूप से ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद में प्राप्त होता है, जो वैदिक परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन और गूढ़ आध्यात्मिक ग्रंथ है।

यह ग्रंथ केवल अपने समय के मानव समाज के लिए ही नहीं, बल्कि आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक और कल्याणकारी है, बल्कि यह कहा जा सकता है कि आज के बौद्धिक और मानसिक संघर्ष से जूझते मानव के लिए इसकी उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गई है।

‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ महावाक्य क्या है?

‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ महावाक्य में कोई कथा, कोई प्रतीकात्मक कहानी, कोई परंपरागत मान्यता या अंधविश्वास सम्मिलित नहीं है। यह महावाक्य अत्यंत सीधा, स्पष्ट और तथ्यात्मक है। इसमें केवल दो ही शब्द हैं प्रज्ञानम् और ब्रह्म। इसका सीधा और सारगर्भित अर्थ है कि प्रज्ञान ही ब्रह्म है।

यहाँ प्रज्ञान का अर्थ साधारण जानकारी या बौद्धिक ज्ञान नहीं है। प्रज्ञान का तात्पर्य उस पूर्ण और समग्र चेतना से है जो स्वयं में पूर्ण है। वही पूर्णता सत, चित और आनंद स्वरूप ब्रह्म या आत्मन है। यह ऐसा ज्ञान है जिसे किसी बाहरी साधन से प्राप्त नहीं किया जाता, बल्कि जिसके भीतर स्थित होकर ही सभी प्रकार के ज्ञान संभव होते हैं।

प्रज्ञान का अर्थ: यहाँ ज्ञान का अर्थ केवल इतना नहीं है कि आपको किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार का बोध हो रहा है। प्रज्ञान का अर्थ है पूर्ण ज्ञान। पूर्ण ज्ञान का तात्पर्य यह है कि आपको केवल बाहरी इंद्रिय विषयों का ही ज्ञान नहीं हो, बल्कि उस जानने वाले का भी ज्ञान हो जो इन इंद्रिय विषयों को जान रहा है।

साधारण अवस्था में जीवात्मा इंद्रिय विषय संसार से जुड़ी रहती है। वह इंद्रियों की तृप्ति में सुख खोजती है, अस्तित्व के नाश की कल्पना से भयभीत होती है, इच्छाओं की पूर्ति न होने पर दुखी या क्रोधित होती है। विषय और विषयी, भोक्ता और भोग, ज्ञेय और ज्ञाता के द्वैत में ही उसका जीवन व्यतीत होता है।

यह संपूर्ण इंद्रियगत संसार, जीव और उसके अनुभव, सब प्रज्ञान में ही उत्पन्न होते हैं। अर्थात यह संसार और इसका अनुभव प्रज्ञान से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है।

जीव और चेतना का अद्वैत संबंध : जीव का संपूर्ण अस्तित्व चेतना में ही स्थित है। यह चेतना अखंड है, विभाजित नहीं होती। यही चैतन्य आप में, मुझ में और समस्त जीवों में समान रूप से व्याप्त है। समस्त जीव इस चैतन्य में स्थित हैं और यह चैतन्य सभी जीवों में विद्यमान है।

यही विशुद्ध अद्वैत आत्मा है। यही आत्मा ब्रह्म है। आयम आत्मा ब्रह्म महावाक्य भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है कि आत्मा और ब्रह्म दो नहीं हैं, बल्कि एक ही परम सत्ता के दो नाम हैं।

संसार का ज्ञान और प्रज्ञान का बोध : यह जीव निरंतर संसार को जान रहा है। उसका पूरा जीवन जानने की प्रक्रिया में ही चलता है। उदाहरण के लिए एक कर्मचारी व्यक्ति को ही लें। वह सुबह उठते ही समय का ज्ञान करता है, फिर अपने दैनिक कर्तव्यों का ज्ञान करता है, बाहर निकलने पर साधन खोजता है, कार्यस्थल पर अनेक निर्णय लेता है। वह सुबह से शाम तक निरंतर ज्ञान में ही रहता है।

परंतु यह ज्ञान इंद्रियों, स्मृति और बुद्धि के माध्यम से प्राप्त होने वाला सांसारिक ज्ञान है। प्रज्ञान इससे भिन्न है। प्रज्ञान वह है जिसमें न केवल संसार जाना जा रहा है, बल्कि यह भी जाना जा रहा है कि संसार को जानने वाला कौन है और वह जानने वाला संसार से क्यों जुड़ा रहना चाहता है।

मैंने प्रज्ञान को पूराज्ञान क्यों कहा: इसी कारण प्रज्ञान को सरल भाषा में पूराज्ञान कहा गया है। अधिकांश लोग जीवन भर केवल बाहरी संसार को ही जानते रहते हैं। वे उसी संसार को सत्य मान लेते हैं जो उनकी इंद्रियों और मस्तिष्क के माध्यम से प्रकट होता है। इस संसार का आधार शरीर की इंद्रियां और चित्त हैं।

परंतु वे यह नहीं जान पाते कि जिस चेतना में यह सब प्रकट हो रहा है, वही वास्तविक सत्य है। प्रज्ञान इंद्रियों, मन और बुद्धि से परे है। उसी में स्थित होकर ही मोक्ष की उपलब्धि संभव होती है। जब साधक इस प्रज्ञान में स्थित होता है, तब बंधन स्वतः छूटने लगते हैं।

‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ ऐतरेय उपनिषद का पूर्ण श्लोक और अर्थ

प्रज्ञान ब्रह्म का पूर्ण संस्कृत श्लोक ऐतरेय उपनिषद के तृतीय खंड के अंत में प्राप्त होता है। यह श्लोक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रज्ञान से अभिन्न सिद्ध करता है।

एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव । बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥

अर्थ : इस श्लोक में कहा गया है कि यही ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है। समस्त देवता, पाँच महाभूत, समस्त प्राणी, चाहे वे अंडज हों, जरायुज हों, स्वेदज हों या उद्भिज हों, मनुष्य हों, पशु हों, पक्षी हों, चलने वाले हों या स्थावर हों, यह सब प्रज्ञान रूपी नेत्रों से युक्त हैं और प्रज्ञान पर ही प्रतिष्ठित हैं।

पूरा संसार प्रज्ञान में स्थित है। प्रज्ञान ही इसका आधार है। अंततः यही निष्कर्ष दिया गया है कि प्रज्ञान ही ब्रह्म है।

निष्कर्ष:

इस प्रकार प्रज्ञान ब्रह्म महावाक्य हमें यह नहीं सिखाता कि किसी नए ईश्वर को मानो, बल्कि यह सिखाता है कि जिस चेतना के कारण सब कुछ जाना जा रहा है, वही परम सत्य है। जब यह सत्य अनुभव में उतरता है, तब द्वैत अपने आप विलीन हो जाता है और जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है और जीवबंधन से आध्यात्मिक मुक्ति को प्राप्त होता है। यही इस महावाक्य का सार, उद्देश्य और अद्वैत संदेश है।

ABOUT THE AUTHOR

Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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