भगवान शिव की पूजा सारे देवता करते हैं क्योंकि पौराणिक कथाओं में जब भी देवताओं पर कोई संकट आया है, उनकी रक्षा भगवान विष्णु या शिव ने ही की है। शिव के द्वारा कामदेव को भस्म किए जाने की कथा केवल शिव पुराण में ही नहीं, बल्कि मत्स्य पुराण और पद्म पुराण और वामन पुराण में भी मिलती है, तथा कवि कालिदास ने भी अपने काव्यों में इसको शामिल किया है। इन सभी में अलग-अलग ढंग से समझाया गया है, क्योंकि यह कथा बहुत महत्वपूर्ण संकेत देती है।
भगवान शिव ने कामदेव को भस्म क्यों किया था?
दैत्य हमेशा अमर और अजेय होने के लिए तप किया करते थे, ताकि उन्हें ऐसा वरदान प्राप्त हो। लेकिन किसी का अमर होना असंभव है। जो जन्मा है उसकी मृत्यु अपरिहार्य है। पौराणिक कथाओं में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा को भी अमर नहीं बताया जाता, और न ही उनकी रचना सृष्टि को।
तो तारकासुर ने कुछ ऐसा वरदान माँग लिया कि उसकी मृत्यु होना असंभव हो जाए। बाकी राक्षसों ने भी ऐसे उपाय किए थे। लेकिन तारकासुर ने ऐसा वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र से ही हो सके। तारकासुर ने इसमें अपना कुटिल दिमाग लगाया था, क्योंकि वह जानता था कि सती के देह त्याग के बाद शिव सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्त हो चुके हैं। अब वे माता सती की जगह किसी और से विवाह करें, यह असंभव लग रहा था।
ऐसा वरदान मिलने पर उसने अपने आप को अमर घोषित कर दिया। उसे बड़ा घमंड हुआ। उसने देवताओं से युद्ध किया और उन्हें हराया भी, क्योंकि देवताओं के लिए तारकासुर को हराना असंभव था।
देवता भगवान शिव के पास पहुँचे, जहाँ शिव पहले से समाधि में लीन थे। देवताओं को इससे चिंता हुई।
उसी समय पार्वती देवी शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही थीं। कहा जाता है कि पार्वती सती का ही जन्म थीं, क्योंकि वह भी सती की तरह महादेव की भक्त थीं। लेकिन भगवान शिव अब किसी से भी विवाह नहीं करना चाहते थे, क्योंकि उन्होंने सती को खोया था।
देवताओं को जब यह बात पता हुई, उन्होंने सोचा कि किसी तरह पार्वती और शिव का विवाह हो जाए तो तारकासुर के अंत का मार्ग खुलेगा। अब शिव की तपस्या भंग करने के लिए वे कामदेव को ले आए। कामदेव के प्रभाव से जीव कामासक्त होता है। वे स्त्री-पुरुष के आकर्षण के देवता हैं।
कामदेव ने शिव को कामासक्त करने और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए वन को ऋतु जैसा कर दिया, लेकिन शिव पर कोई असर नहीं दिखाई दिया। तब अंततः उन्होंने अपना पुष्पबाण चलाया।
जैसे ही शिव को बाण लगा, शिव की तपस्या भंग हुई। उन्होंने समझ लिया कि इसके पीछे कामदेव है। वे अत्यंत क्रोधित हुए और तांडव नृत्य करने लगे। और उन्होंने अपनी तीसरी नेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया।
कामदेव की पत्नी देवी रति इससे बहुत दुखी हुई और शिव की प्रार्थना करने लगी, दया की विनती करने लगी। तब शिव ने कामदेव को मन और भावनाओं के रूप में जीवित रखा।
उसके बाद शिव देवी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हुए और उनका पार्वती से विवाह हुआ। उनके पुत्र कार्तिकेय ने बाद में तारकासुर का वध किया।
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इस कथा की क्या सीख है?
हमारे आज के समय की पीढ़ी को इस कथा को समझाना बहुत महत्वपूर्ण है। शिव का कामासक्त होकर पार्वती से विवाह न करना और उससे पहले कामदेव को भस्म करना सीधा संकेत है कि मानव के लिए केवल शरीर की वासना के वशीभूत होकर किसी स्त्री से संबंध बनाना उचित नहीं।
हमने आपको पहले भी बताया है कि जिसे लोग प्रेम कहते हैं, वास्तव में वे लोग कामना के वश में हो चुके हैं। सच्चा प्रेम क्या है और झूठा प्रेम क्या है, आप जान सकते हैं।
शिव तांडव नृत्य करते हैं, कामदेव को भस्म करते हैं। इसे आप ऐसा समझिए कि वे जागरूकता से काम को जीत लेते हैं। यह कोई चमत्कार नहीं है। आप अपने आप को जीत लें, अपने मन को जीत लें। यह योग है।
केवल शरीर को तृप्त करने की इच्छा से अगर आप कोई रिश्ता बना भी लें तो क्या वह स्वस्थ होगा? आप देख सकते हैं, पति-पत्नी में झगड़े होते हैं, इतने बुरे कि किसी की जान भी ले ली जाती है।
शिव पार्वती की तपस्या पर प्रसन्न होकर उनसे विवाह करते हैं, न कि वासना से प्रभावित होकर। कामदेव को तो वे इससे पहले ही भस्म कर चुके थे। ये दिखाता है कि उन्होंने कामना को जीत लिया था, विवाह करने से पहले ही।
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