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‘नमामि शमीशान’ स्तुति का अर्थ और तात्पर्य

इस लेख में मैंने भगवान शिव की प्रसिद्ध ‘नमामि शमीशान’ स्तुति – रुद्राष्टकम् के संपूर्ण बोल, सरल हिन्दी अर्थ तथा उसके आध्यात्मिक उपदेश को प्रस्तुत किया गया है।

साथ ही, स्तुति में वर्णित शिव के सगुण और निर्गुण स्वरूप, इसका स्तोत्र तथा इससे मिलने वाली जीवनोपयोगी विद्या का भी  वर्णन किया गया है, जिससे पाठक इसके वास्तविक अर्थ को समझ सकें। 

‘नमामि शमीशान’ स्तुति के बोल और अर्थ

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं,

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं,

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥

अर्थ: मैं ईशों के ईश, निर्वाणस्वरूप, सर्वव्यापक, अनन्त तथा ब्रह्म और वेदों के स्वरूप को नमस्कार करता हूँ। मैं उस परमात्मा का भजन करता हूँ जो स्वयं का स्वरूप है, निर्गुण है, निर्विकल्प है, निष्काम है, चिदाकाशस्वरूप है और जिसका निवास आकाश के समान असीम है।

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं,

गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।

करालं महाकालकालं कृपालं,

गुणागारसंसारपारं नतोहम्॥

 

अर्थ: मैं निराकार, ॐकार के मूल, तुरीय अवस्था के स्वरूप, वाणी और ज्ञान से परे, परमेश्वर तथा गिरीश को नमस्कार करता हूँ। मैं उस कराल स्वरूप, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के आगार तथा संसार-सागर से पार उतारने वाले प्रभु को प्रणाम करता हूँ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं,

मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम्।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनीचारुगङ्गा,

लसद्भालबालेन्दुकण्ठे भुजङ्गा॥

 

अर्थ: जिनका गौरवर्ण हिमालय के समान है, जो अत्यन्त गंभीर हैं, जिनका दिव्य शरीर करोड़ों कामदेवों के तेज के समान शोभायमान है। जिनकी जटाओं में सुंदर गंगा प्रवाहित होती है, जिनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है और जिनके कण्ठ में सर्प विराजमान है।

 

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं,

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं,

प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥

अर्थ: मैं उन प्रिय शंकर का भजन करता हूँ जिनके कुण्डल लहराते हैं, जिनकी सुंदर भौंहें और विशाल नेत्र हैं, जिनका मुख सदैव प्रसन्न रहता है, जो नीलकण्ठ और दयालु हैं। वे सिंहचर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं, मुण्डमाला पहनते हैं और समस्त जगत के नाथ हैं।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं,

अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।

त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं,

भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥

अर्थ: मैं उस प्रचण्ड, श्रेष्ठ, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा तथा करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान प्रभु का भजन करता हूँ। वे त्रिविध तापों का नाश करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले, भवानी के पति तथा सच्चे भाव से प्राप्त होने वाले हैं।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी,

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी,

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी

अर्थ: मैं उन प्रभु को प्रणाम करता हूँ जो समस्त कलाओं और समय की सीमाओं से परे हैं, कल्याणस्वरूप हैं तथा कल्प के अंत में सृष्टि का संहार करने वाले हैं। वे सदैव सज्जनों को आनंद प्रदान करने वाले, पुरारी, चिदानन्द के साक्षात् स्वरूप तथा मोह का नाश करने वाले हैं। हे प्रभो! हे मन्मथ के शत्रु! मुझ पर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं,

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं,

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥

अर्थ: जब तक मनुष्य इस लोक में अथवा परलोक में भगवान उमानाथ के चरणकमलों का भजन नहीं करते, तब तक उन्हें न सच्चा सुख प्राप्त होता है, न शांति और न ही संताप का नाश होता है। हे समस्त प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले प्रभु! मुझ पर प्रसन्न हों।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां,

नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।

जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं,

प्रभो पाह्यापन्नममीश शम्भो॥

अर्थ: मैं न योग जानता हूँ, न जप और न ही विधिपूर्वक पूजा करना जानता हूँ। हे शम्भु! मैं सदा और सर्वदा आपको ही प्रणाम करता हूँ। जन्म, बुढ़ापे और संसार के असंख्य दुःखों से संतप्त मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे प्रभो! हे ईश! हे शम्भो! मेरी रक्षा कीजिए।

‘नमामि शमीशान’ स्तुति के बारे में

नमामि शमीशान स्तुति भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत सुंदर स्तुति है। इसमें भगवान शिव के सगुण (साकार) तथा निर्गुण (निराकार) दोनों स्वरूपों का अद्भुत वर्णन मिलता है।

इस स्तुति में भगवान शिव के सुंदर स्वरूप का वर्णन किया गया है। उनकी सुंदर भौंहें, विशाल और करुणामय नेत्र, प्रसन्न मुख, नीलकण्ठ स्वरूप, दयालु स्वभाव, सिंहचर्म का वस्त्र, मुण्डमाला, लहराते हुए कुण्डल, जटाओं से प्रवाहित होती पवित्र गंगा, गले में सुशोभित सर्प तथा हाथ में धारण किया हुआ त्रिशूल—इन सभी का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया गया है।

इसी के साथ यह स्तुति भगवान शिव के उस निर्गुण, निराकार ब्रह्मस्वरूप का भी वर्णन करती है, जो सभी परिभाषाओं से परे है। वे वाणी, बुद्धि और सामान्य विचार की पहुँच से भी परे बताए गए हैं।

इस स्तुति में भगवान शिव को ब्रह्मनिर्वाणस्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म तथा वेदों का सार, स्वयंप्रकाश, निर्गुण, निर्विकल्प, निष्काम, चिदाकाशस्वरूप, आकाश के समान अनन्त, अजन्मा, अखण्ड, अनादि, अनन्त, करुणामय, कल्याणकारी, कल्पांत में संहार करने वाले, सज्जनों को आनंद देने वाले है,

वे मोह का नाश करने वाले, भवसागर से पार उतारने वाले, भवानीपति, त्रिशूलधारी, कामदेव का दमन करने वाले, त्रिविध तापों का नाश करने वाले, संसार-भय का हरण करने वाले, मोक्षदाता तथा समस्त जीवों के अंतिम आश्रय के रूप में स्तुति की गई है।

‘नमामि शमीशान’ स्तुति के रचयिता कौन हैं?

नमामि शमीशान स्तुति के रचयिता को लेकर विद्वानों में मतभेद है, क्योंकि इसके संबंध में कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

लेकिन परंपरागत रूप लोकप्रिय कथा के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास ने रुद्राष्टकम् की रचना रामचरितमानस की रचना प्रारंभ करने से पहले भगवान शिव की स्तुति के रूप में की थी।

कथा यह है कि जब तुलसीदास जी भगवान शिव को समर्पित काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान के दर्शन करने गए, तब उन्होंने शिवजी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र का गायन किया।

भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें श्रीराम के चरित्र का वर्णन करने का आशीर्वाद दिया। इसी कारण रुद्राष्टकम् को अत्यंत प्रभावशाली शिव-स्तुति माना जाता है।

‘नमामि शमीशान’ स्तुति से क्या उपदेश मिलता है?

नमामि शमीशान स्तुति यह सिखाती है कि मन को शिवत्व का भजन करना चाहिए, अर्थात् उस परम सत्य का, जो माया के मिथ्या संसार से परे है। दूसरे शब्दों में, यह स्तुति मन को सीधे मुक्ति की ओर उन्मुख करती है।

हम जीव, भौतिक शरीर के बंधनों के कारण माया से प्रभावित हो जाते हैं। अज्ञान के कारण मनुष्य की चेतना अपने भीतरी दुःखों से मुक्ति और शांति को जड़ पदार्थों तथा भौतिक वस्तुओं में खोजती रहती है। परंतु वास्तविक मुक्ति वहाँ नहीं है। सच्ची मुक्ति तो भौतिक आसक्तियों से मुक्त होने में है।

हमने आध्यात्मिक मुक्ति पर अन्य लेख में विस्तार से चर्चा की है, जिसमें बताया गया है कि जब तक मनुष्य अपने बंधनों को पहचानकर उनका निरसन नहीं करता और मुक्ति के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ता, तब तक वह वास्तविक आत्मिक परम आनंद को प्राप्त नहीं कर सकता।

यदि आप नमामि शमीशान स्तुति का अर्थ गहराई से समझते हैं, तो आप जानेंगे कि यह भगवान शिव का आवाहन है। भक्त इसमें भगवान शिव से प्रार्थना करता है कि वे उसके समस्त दुःखों का नाश करें, क्योंकि शिवत्व ही मुक्ति है।

भगवान शिव उस शुद्ध चैतन्य के प्रतीक हैं, जो माया से परे है—वह चेतना जिसने अपने संस्कारजन्य बंधनों को पहचानकर जड़ प्रकृति का अतिक्रमण कर लिया है।

इस स्तुति में शिव को निर्विकल्प, अर्थात् समस्त भेदों और द्वैत से रहित, निजस्वरूप तथा निर्वाणस्वरूप कहा गया है।

वे जन्म और मृत्यु से परे, अजन्मा, शाश्वत तथा अविनाशी हैं। शिव की प्राप्ति ही अमरत्व की प्राप्ति है।

शिव को भजने का अर्थ क्या है?

यदि आप शिव का भजन कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि अब आप संसार के क्षणभंगुर विषयों का भजन नहीं कर रहे हैं। अब आपका लक्ष्य आत्मज्ञान है। यह अज्ञान और मन की अंधी मान्यताओं के विरुद्ध विद्रोह है।

शिव का भजन करने का अर्थ यह भी है कि अब आपका आकर्षण केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं रह गया है। आपके भीतर उस सत्य की प्यास जाग चुकी है, जो भौतिकता से परे है।

अब आपकी यात्रा मृत्यु और विनाश की ओर नहीं, बल्कि अमरत्व और समय की सीमाओं से परे स्थित सत्य की ओर है।

भजन का अर्थ केवल भक्ति-गीत गाना या संगीत प्रस्तुत करना नहीं है। गीत-गायन भक्ति की एक अभिव्यक्ति अवश्य है, किंतु वही भजन का संपूर्ण अर्थ नहीं है।

यदि आप भजन के वास्तविक अर्थ को विस्तार से समझना चाहते हैं, तो इसके विषय में हमारे अन्य लेख को पढ़ सकते हैं।

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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.

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