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नचिकेता और यमराज का संवाद (कठोपनिषद से कथा)

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उपनिषद वेदों के सबसे उच्च शिखर हैं। उनमें नौ उपनिषदों को प्रमुख माना जाता है। अगर आप इस लोक-धर्म के दिखावे के पार जाकर वास्तव में सनातन धर्म को और इसके दर्शन को समझना चाहते हैं, तो आपको कम से कम इन नौ उपनिषदों को तो अवश्य पढ़ना ही चाहिए। क्योंकि यही वास्तव में आपको बताते हैं कि धर्म क्या है।

हम जिसकी बात करेंगे, वह इन नौ उपनिषदों में से ही एक है—कठोपनिषद। इसमें एक कथा है, जो जितनी रोचक है उतनी ही ज्ञानवर्धक भी है। आप पहले कथा को पढ़िए और बाद में इसकी महत्वपूर्ण सीख।

नचिकेता और यमराज की कथा (कठोपनिषद)

नचिकेता के पिता वाजश्रवस एक यज्ञ कर रहे थे, जिसमें वे ब्राह्मणों को उनकी प्रिय चीजें दान कर रहे थे। यज्ञ का उद्देश्य था कि उन्हें मृत्यु के बाद स्वर्ग जैसे उच्च लोकों की प्राप्ति हो।

नचिकेता ने देखा कि ब्राह्मणों को पता ऐसी गायों को दान में दे रहे हैं जो बूढ़ी हो चुकी हैं, जो दूध नहीं दे सकतीं। पिता अभी भी संसार से इस तरह आसक्त थे कि मृत्यु के मुख तक पहुँचने पर भी उनका संसार से मोह भंग नहीं हुआ था।

बालक नचिकेता अपने पिता से पूछते हैं कि आप अपनी प्रिय वस्तुएँ दान कर रहे हैं, तो आप मुझे किसे दान करेंगे? पिता ने कोई उत्तर नहीं दिया।

नचिकेता ने फिर पूछा और एक बार फिर पूछा। अब पिता तंग होकर बोले कि जा, मैंने तुझे मृत्यु को दान कर दिया।

नचिकेता ने इस बात को गंभीरता से लिया और वह यम की नगरी जा पहुँचा। लेकिन यमराज तो अपने घर नहीं थे, तो नचिकेता ने तीन दिन तक वहाँ यम की प्रतीक्षा की। तीसरे दिन यम आए।

यम ने नचिकेता से पूछा, बालक, तुम यहाँ किसलिए आए हो?

नचिकेता ने उत्तर दिया—मेरे पिता वाजश्रवस ने मुझे आपको दान कर दिया है।

यम को पता चला कि वह तीन दिन से बिना अन्न-पानी के यहाँ प्रतीक्षा कर रहा है। यम उससे प्रसन्न हुए और बोले—मैं तुम्हें तीन वर दूँगा, क्योंकि तुमने तीन दिन तक यहाँ मेरी प्रतीक्षा की है।

नचिकेता ने पहला वर माँगा कि पिता का क्रोध शांत हो और जब मैं वहाँ वापस लौटूँ तो वे मुझे स्वीकार करें।

दूसरे वर में अग्नि-विद्या माँगी, जो आगे चलकर नचिकेता अग्नि-विद्या के नाम से जानी जाने लगी।

और तीसरा वर माँगते हुए नचिकेता कहते हैं कि – कुछ लोग बोलते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा नहीं होती तथा कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। मैं आपसे यही जानना चाहता हूँ कि सत्य क्या है?

तब यम कहते हैं कि यह सवाल बहुत कठिन है। देवता भी इसे नहीं जान सकते। तुम कोई दूसरी इच्छा करो। मैं तुम्हें अपार धन-संपत्ति, सुख, लंबा जीवन—जो तुम चाहो, मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण कर दूँगा।

नचिकेता ने कहा—ये सभी सांसारिक सुख नश्वर हैं। अंततः मृत्यु तो सबको अलग कर ही देती है। इसलिए मैं इनकी इच्छा नहीं रखता।

नचिकेता के ऐसा कहने पर यम प्रसन्न हुए, क्योंकि नचिकेता के लिए भोग-विलास और इन सब चीजों से ऊपर ज्ञान मायने रखता था।

तब यम कहते हैं कि मनुष्य के सामने जीवन के दो मार्ग होते हैं—प्रेय, यानी जो अभी सुखदायी लगता है उसे चुनना, और श्रेय, जो पहले इतना सुखदायी नहीं होता लेकिन यह मार्ग मानव का कल्याण करने वाला है। तुमने श्रेय चुना। बहुत अच्छे।

यम कहते हैं कि आत्मा शरीर और मन की तरह कोई भौतिक वस्तु नहीं है। इसीलिए वह जन्म और मृत्यु के चक्र से पार है।

यह मानव शरीर रथ की तरह है, इंद्रियाँ इसके घोड़े हैं, बुद्धि इसका सारथी और मन बुद्धि और घोड़ों के बीच की लगाम है, तथा वह आत्मा इस रथ का स्वामी है।

जो मनुष्य बुद्धि से मन को नियंत्रित करता है, वह सद्मार्ग पर जीवन जीता है। परंतु इंद्रियों के विषयों से आसक्ति उस रथ को विनाश की ओर ले जाती है, क्योंकि बुद्धि का नाश हो जाता है।

इंद्रियों से ऊपर है मन, मन से ऊपर बुद्धि, और बुद्धि से ऊपर है वह आत्मा, और आत्मा से भी बहुत ऊपर वह पुरुष है। उसका न कोई आकार है, न कोई चिह्न और न कोई लक्षण। जब मनुष्य इसे जानता है, वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो अमृतत्व को प्राप्त करता है।

इस कथा की सीख क्या है?

साधकों, नचिकेता का ज्ञान को बाकी सारी सांसारिक उपलब्धियों से ऊपर रखना यह दर्शाता है कि वह अभी सद्मार्ग पर है।

क्योंकि मनुष्य इसी मोह के कारण बुरा सोचता और करता है। मानव का धर्म है कि वह अपनी बुद्धि का उपयोग कर सही निर्णय ले और अपने को नीचे न गिरने दे।

इस कथा का एक व्याख्या का महत्व है और उसमें गहरी सीख है। जैसे नचिकेता का यम के पास जाना संकेत है कि मनुष्य को मृत्यु के आगे जाकर ही आत्म-साक्षात्कार होता है।

यहाँ मृत्यु का अर्थ शरीर का नष्ट होना नहीं, बल्कि विचारों का शून्य होना है, क्योंकि योग में आपको मन पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए विचार-शून्य होना पड़ता है। जो योग की सिद्धि, समाधि तक पहुँचने का मार्ग है।

यह भी एक तरह की मृत्यु ही है, लेकिन इसमें आपका शरीर नष्ट नहीं होता, बल्कि शरीरी नष्ट होता है। उसका अस्तित्व आत्मा के प्रकाश में विलीन हो जाता है।

नचिकेता के पिता यज्ञ कर रहे थे, ताकि उन्हें उच्च लोकों की प्राप्ति हो। परंतु ये यज्ञ आपको इस जीवन से मुक्ति नहीं दे सकते। मरते हुए भी मनुष्य कंजूसी करता है।

जीवन की सार्थकता यह नहीं कि आप सोचें कि मरने के बाद स्वर्ग है और उसमें मुझे स्थान मिले। जीवन की सार्थकता जीवन से मुक्त होने में है।

यम नचिकेता को यह भी बताते हैं कि आत्मा कोई भौतिक वस्तु नहीं है। इसीलिए वह स्थान और काल के परे है। मन उसका चिंतन नहीं कर सकता। और मुक्ति का अर्थ है कि आत्मा ब्रह्म के साथ एकात्म है। यही जीवन और मृत्यु के पार परंगति है।

इसी तरह कठोपनिषद के साथ सारे उपनिषद आपको अलग-अलग तरीके से जीवन को सार्थक करने की, सद्मार्ग और धर्म की सीख देते हैं। जो आपको अवश्य पढ़ने चाहिए।


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Shri Nikhil

Shri Nikhil writes about spirituality, yoga, and philosophy. His work is to present knowledge in simple language to help people become more aware and assist in the destruction of ignorance.


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