निराकार का ध्यान कैसे करें?
निराकार पर ध्यान देने का अर्थ बस इतना है कि आप आकार पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, अर्थात् भौतिकता पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इसका अर्थ किसी काल्पनिक शून्य या किसी विशेष दृश्य की कल्पना करना नहीं है। इसका सीधा-सा आशय यह है कि आपका मन इंद्रियों के विषयों और संसार के आकारों में उलझा न रहे।
देखिए, साधारणतः आपके मन में जो भी विचार उठते हैं, उनका केंद्र कोई-न-कोई साकार वस्तु ही होती है। मन कभी किसी व्यक्ति का चिंतन करता है, कभी किसी वस्तु का, कभी किसी घटना का, कभी किसी इच्छा का और कभी किसी भय का।
अर्थात् मन का स्वभाव ही आकारों के इर्द-गिर्द घूमना है। यही कारण है कि उसका अधिकांश समय सांसारिक विषयों में ही व्यतीत होता है।
निराकार का ध्यान करने का अर्थ क्या हैं?
ज्यादातर लोग सांसारिक इंद्रिय-विषयों का ही ध्यान करते हैं। उनका मन बार-बार उन्हीं वस्तुओं, संबंधों, इच्छाओं और अनुभवों की ओर जाता है, जो इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होते हैं।
यही प्रवृत्ति धीरे-धीरे उनके जीवन में अशांति का कारण बन जाती है। इस विषय पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि ध्यान जीवन के लिए क्यों आवश्यक है? ध्यान जीवन हों ताकि शांति और आत्मिक परमानंद उपलब्ध हो सकें।
जब तक मन संसार के विषयों में उलझा रहता है, तब तक वह स्वयं को जानने की दिशा यानि आत्म बोध में आगे नहीं बढ़ पाता।
यदि आप भगवत गीता की शिक्षा को पढ़ें आप भगवद्गीता के बारहवें अध्याय, अर्थात् भक्तियोग, का अध्ययन करेंगे, तो पाएँगे कि वहाँ श्रीकृष्ण ने निर्गुण-निराकार अर्थात् अव्यक्त उपासकों के विषय में भी कहा है।
वहाँ श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि अव्यक्त (निराकार) पर मन लगाना देहाभिमानी लोगों के लिए अधिक कठिन है। ( भ. गी. 12.5 का भावार्थ)
ऐसा इसलिए क्योंकि देहाभिमानी व्यक्ति की चेतना का केंद्र उसकी देह होती है, और उसी देह के कारण उसके सामने जो भौतिक संसार उपस्थित होता है, वही उसके जीवन का आधार बन जाता है। उसकी दृष्टि निरंतर उसी संसार की ओर रहती है। यदि आप जानना चाहते हैं कि इसी अहंवृत्ति (अहंकार) से माया रूपी भौतिक संसार का अनुभव कैसे उत्पन्न होता है, तो पहले इस देहाभिमान को समझना आवश्यक है।
निराकार पर ध्यान कर पाने के लिए संसार के प्रति वैराग्य आवश्यक होता है। वैराग्य का अर्थ संसार का त्याग करना नहीं है और न ही उसका ग्रहण करना है। इसका अर्थ है कि न तो मन उसे पकड़ना चाहता हो और न ही उससे भागना चाहता हो। जब ऐसा समत्व-भाव विकसित होने लगता है, तब साधक निर्गुण-निराकार ब्रह्म में स्थित होने के योग्य बनने लगता है।
जब निर्गुण-निराकार का ध्यान करने की बात आती है, तब प्रायः लोगों के मन में यह मान्यता उत्पन्न हो जाती है कि अब संसार उनके लिए विलीन हो जाएगा या उन्हें कुछ दिखाई नहीं देगा।
किन्तु ऐसा नहीं है। संसार जहाँ है, वहीं रहता है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं आता। परिवर्तन केवल इतना होता है कि उससे ‘स्व’ अर्थात् चेतना का तादात्म्य समाप्त होने लगता है। संसार उपस्थित रहता है, किन्तु उसकी ओर मन की गति नहीं रहती। गति संसार के पार की ओर होती है।
मैं निराकार का ध्यान करने योग्य कैसे हो सकता हूँ?
देखिए, जैसा मैंने बताया, निराकार का ध्यान करने का अर्थ केवल इतना है कि आपको साकार का ध्यान नहीं करना है। साकार अर्थात् जो कुछ भी आपको आँखों से दिखाई देता है, कानों से सुनाई देता है तथा इंद्रियों और मन का विषय बनता है। ये सब आपके सामने रहें या न रहें, आपको उनसे जुड़ना नहीं है।
यह तभी संभव होता है जब आपका रुख सत्य की ओर हो। किन्तु मन ऐसा संस्कारित है कि वह बार-बार संसार की ओर ही आकर्षित होता है, क्योंकि उसके अतिरिक्त उसे कोई दूसरा विकल्प दिखाई ही नहीं हैं।
मन सदैव आकारों का ही चिंतन करता है, क्योंकि उसका आधार आसक्ति है। जहाँ आसक्ति है, वहीं आकारों का चिंतन है। इसलिए आवश्यक यह नहीं कि आप आसक्ति से लड़ें, बल्कि यह है कि आप उसे जानें। जब आसक्ति को ठीक प्रकार से जाना जाता है, तभी उसका निरसन संभव होता है।
जागरूकता ही वह अग्नि है जो आसक्ति को जला देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि आप बलपूर्वक आसक्ति का नाश करने लगें या किसी काल्पनिक निराकार में ही आसक्त हो जाएँ। वह भी एक नई आसक्ति ही होगी।
आपको सत्य की ओर उन्मुख होना है। सत्य वह है जिसे मन जान नहीं सकता, जिसे कल्पना में नहीं बाँधा जा सकता और जिसे संसार के किसी आकार में उतारा नहीं जा सकता। उसी दिशा में बढ़ना ही वास्तविक अर्थ में निराकार का ध्यान है।