Read this Blog in:

आत्म-ज्ञानआध्यात्मधर्मग्रंथध्यानमंत्रयोग

उपनिषद् का “तत् त्वम् असि” क्या संकेत देता हैं?

उपनिषदों की गहन ज्ञान की खोज करें महावाक्य “तत् त्वम् असि” – “तू वही है” के माध्यम से। यह प्राचीन शिक्षा बताती है कि परम सत्य बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर है। जानें कि आत्म-साक्षात्कार, आंतरिक जागरूकता और अपनी सच्ची प्रकृति को समझना कैसे स्थायी शांति, आनंद और सांसारिक भ्रांतियों से मुक्ति प्रदान करता है।

“तत् त्वम् असि” श्लोक क्या हैं?

उपनिषद् वेदों के, अर्थात् ज्ञान के, सर्वोच्च शिखर माने जाते हैं। भारतीय ऋषियों ने जिन सत्य मूल्यों, आत्मानुभूतियों और गहन अनुभूत आध्यात्मिक रहस्यों को शब्दों में पिरोया, उसी का सार उपनिषदों में प्रकट होता है।

सामवेद से सम्बद्ध छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित महावाक्य “तत् त्वम् असि” जिसका सरल रूप में अर्थ लिया जाता है “वह तुम हो” वास्तव में अत्यन्त सूक्ष्म और विस्तार योग्य अर्थ समेटे हुए है।

यहाँ “तत्” का अर्थ किसी साधारण रूप या वस्तु से नहीं है; “तत्” उस परम सत्य, उस अंतिम वास्तविकता का संकेत है, जिसे ऋषियों ने प्रत्यक्ष अनुभूति के द्वारा जाना। महावाक्य का सार यह है कि वही परम सत्य, वही परम तत्व, वही परम आधार तुम ही हो।

इस गहन अर्थ को दो चार शब्दों में समझाना या पकड़ पाना कठिन है। इसलिए “तत्वम असि” का असली संकेत समझने हेतु स्वयं को समझना अनिवार्य हो जाता है।

Tat tvam asi mantra

तत् (तत्व) तुम हों

मनुष्य बाहर ब्रह्मांड में सत्य खोजता रहता है, पर उपनिषद् कहते हैं कि अपने ही भीतर झाँककर देखो असली आधार, असली शांति, असली आनंद वहीं विद्यमान है। इसलिए इसका विस्तारपूर्वक चिंतन आवश्यक है।

उपनिषद् में प्रयुक्त वाक्य “तत् स्वयं आसी” भी वही सत्य दोहराता है। तत् अर्थात् परम तत्व। पर प्रश्न उठता है, तत् किसका संकेत देता है? ऋषियों ने प्रकृति को पाँच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का समूह बताया। यही पंचमहाभूत हमारे शरीर का भी आधार हैं। इन्हीं तत्वों को हमारी इन्द्रियाँ देख पाती हैं, इन्हीं को विज्ञान माप पाता है और इन्हीं में हमारा अनुभव चलता है।

परंतु उपनिषद् कहते हैं कि परम तत्व इन पाँचों में से कोई भी नहीं है। ये तो केवल प्रकृति के स्तर के तत्व हैं, जिनसे शरीर बनता है और जिन पर मन चेतना का अनुभव निर्भर करता है।

परम तत्व तत् इन सबका मूल है, परंतु स्वयं इनमें सीमित नहीं है। हमारी आँखें पंचभूतों से बनी हैं, इसलिए वे केवल भौतिक तत्वों को ही देख पाती हैं। हमारी चेतना अपने वर्तमान स्तर पर जो कुछ जान सकती है, वह सब पाँच तत्वों की सीमा में है।

इसलिए आधुनिक विज्ञान भी ‘तत्’ को नहीं जान सकता, क्योंकि विज्ञान भौतिक क्षेत्र का अध्ययन करता है, जबकि ‘तत्’ भौतिक अस्तित्व नहीं है। वह किसी पदार्थ की तरह मापा नहीं जा सकता, किसी उपकरण से पकड़ा नहीं जा सकता।

इसलिए यदि यह प्रश्न उठे कि तत् क्या है, तो उपनिषद् कहते हैं कि उसके बारे में तर्क करते बैठना आवश्यक नहीं। जिस चीज़ को हमारी इन्द्रियाँ जान ही नहीं सकतीं, जिसका ज्ञान मन के क्षेत्र से ऊपर है, उसके बारे में सोचना भी सीमित है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ‘तत्’ हमारे लिए असंभव है। उसे जाना भले बुद्धि से संभव न हो, पर उसमें एकरस हुआ जा सकता है, उस परम चेतना में स्वयं को विलीन किया जा सकता है, और तभी पाँच तत्वों से उत्पन्न होने वाले सभी दुखों से मुक्ति मिलती है।

महावाक्य का दूसरा भाग “त्वम् असि” कहता है कि वही परम तत्व तुम ही हो। वही परम सत्य, जो सम्पूर्ण जगत का आधार है, सुख दुख से परे है, पूर्ण है वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।

लेकिन यहाँ यह समझना अत्यावश्यक है कि ‘तुम’ का अर्थ शरीर या मन नहीं है। तुम्हारा भौतिक शरीर, तुम्हारा बदलता हुआ मन यह सब ‘तुम’ नहीं है। इन्हें ही ‘मैं’ मान लेना ही तो संसार में भटकने का कारण है। इन्हीं से चिपके रहने के कारण दुख होते हैं। जब तक हम स्वयं को शरीर और मन समझते हैं, तब तक हम ‘तत्’ के साथ एकरस नहीं हो सकते।

यहाँ ‘तुम’ का अर्थ है तुम्हारी चेतना का मूल, वह केंद्र जहाँ तुम्हें संसार की उथल पुथल से विश्राम मिलता है। वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। वही परम है, वही अपूर्णता से परे है, वह किसी और में नहीं तुम में ही है।

यदि तुम संसार में तड़प रहे हो, दुखी हो, भटक रहे हो, तो इसका कारण बाहर नहीं है। कारण तुम स्वयं हो तुम्हारी गलत धारणाएँ, तुम्हारी अपनी ही बनी हुई सीमाएँ।

सत्य तो यह है कि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप परम आनंदस्वरूप है। इसलिए देखने की आवश्यकता है कि कौन सी गलत मान्यताएँ तुम्हें तड़पाती हैं, कौन से भ्रम तुम्हें दुख में बाँधते हैं। उपनिषद् कहते हैं उन्हें पहचानो और धीरे धीरे दूर करो।

‘तत्’ को पाने के लिए, मिथ्या को काटने के लिए, उपनिषद् की एक अत्यंत प्रसिद्ध विधि है
“नेति नेति”
अर्थात् यह नहीं, यह नहीं।

इसका अर्थ है जो भी वस्तु इन्द्रियों से पकड़ में आती है, जो भी अनुभव मन के क्षेत्र में आता है, जो भी विचार उठता है सब पर जाँच करो “क्या यह मैं हूँ?” और उत्तर होगा “नेति। यह नहीं।” शरीर नेति। मन नेति। भाव, विचार, अनुभव नेति। इसी निरंतर विवेक से माया की परतें कटती हैं और अन्ततः वही शेष बचता है, जो असली है तत्।

Tat tvam asi mantra

तत् ही आनंद का स्तोत्र है

इस संसार में लोग अपने भीतर के दुख को मिटाने के लिए बाहर बाहर भटकते रहते हैं। कोई वस्तुओं में शांति खोजता है, कोई सम्बन्धों में, कोई उपलब्धियों में। परन्तु जो भीतर की कमी है, वह बाहर कैसे पूरी हो सकती है?

वास्तविक आनंद का स्रोत बाहर नहीं अध्यात्म में है, स्वयं को जानने में है। जब तक कोई व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक वह चाहे जितना प्रयत्न करे, तृप्ति प्राप्त नहीं होती।

भारतीय ऋषियों ने यह ज्ञान केवल अपने लिए नहीं रखा। समाज के कल्याण के लिए, आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाने के लिए, उन्होंने इन उपनिषदों की रचना की। यह ज्ञान आज भी उतना ही उपलब्ध है जितना सहस्रों वर्ष पहले था। केवल आवश्यकता है कि हम इसे ग्रहण करें, इसका लाभ उठाएँ।

उपनिषदों के मंत्र मनुष्य को स्वयं तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। और आखिरकार यही सबसे बड़ा कल्याण है स्वयं को पाना, अपने मूल स्वरूप का साक्षात्कार करना, वह जानना जो हमेशा से अंदर था और हमेशा रहेगा।

Leave a Comment

Donate
UPI QR Code