पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। वहीं अमांत पंचांग के अनुसार यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आती है। हालाँकि, दोनों पंचांगों में व्रत का दिन एक ही होता है।
आइए जानते हैं कि अहोई अष्टमी व्रत की कथा क्या है और माताएँ इस दिन अहोई माता की पूजा कैसे करती हैं।
यह त्योहार विशेष रूप से उन स्त्रियों के लिए होता है, जो माताएँ हैं।
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे किया जाता है?
अहोई अष्टमी का व्रत माताएँ अपने बच्चों की लंबी आयु के लिए रखती हैं। वे अहोई माता से अपनी संतान के कल्याण की प्रार्थना करती हैं और विधि-विधान के अनुसार अहोई माता की पूजा करती हैं। यह उनके अपने बच्चों के प्रति प्रेम और स्नेह को दर्शाता है।
प्रचलित परंपराओं के अनुसार, इस पूजा में देवी को पुष्प, अक्षत, दीप, धूप, कलश इत्यादि अर्पित किए जाते हैं। पूजा में दीवार पर चित्र बनाया जाता है या चित्र लगाया जाता है, जिसमें अहोई माता और साही तथा उसके बच्चों का चित्र बनाया जाता है। साही एक जंगली स्तनधारी जीव है, जिसके शरीर पर लंबे और नुकीले काँटे होते हैं।
इस व्रत में माताएँ दिनभर केवल फलाहार करती हैं। शाम के समय व्रत खोला जाता है, जब आकाश में तारे निकल आते हैं। तारों को जल अर्पित करके यह व्रत संपन्न किया जाता है।
अहोई अष्टमी व्रत की कथा क्या है?
प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार एक नगर में एक साहूकार अपनी पत्नी और सात पुत्रों के साथ रहता था। दीपावली का त्योहार आने वाला था। इसलिए साहूकार की पत्नी घर की मरम्मत करने के लिए मिट्टी लेने जंगल गई थी।
साहूकार की पत्नी मिट्टी खोद रही थी। तभी गलती से उसकी कुदाल एक साही के बच्चे को लग गई। उस मिट्टी में साही का बिल था। कुदाल साही के बच्चे को लगने से उसकी मृत्यु हो गई। मादा साही अपने बच्चे के वियोग में बहुत दुखी हुई। माना जाता है कि साहूकार की पत्नी को उसका श्राप लग गया।
वह घर लौट आई, लेकिन कुछ समय बाद उसके सातों पुत्रों की एक-एक करके मृत्यु होने लगी। उसे भी पुत्रों के वियोग का दुख सहना पड़ा, जैसा दुख उस मादा साही ने सहा था।
उसने अपनी सारी बात गाँव की एक वृद्ध महिला को सुनाई। वृद्ध महिला ने उसे जंगल जाकर उस साही से क्षमा माँगने, उसकी पूजा करने और उसे भोग अर्पित करने की सलाह दी। साहूकार की पत्नी ने बिल्कुल वैसा ही किया।
साहूकार की पत्नी ने पश्चाताप किया, जिससे उसे फिर से संतान सुख प्राप्त हो गया।
अहोई अष्टमी की कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
इस कथा में यह सीख दी गई है कि जब किसी माता की संतान की मृत्यु होती है, तो उसे बहुत पीड़ा होती है। भले ही वह मनुष्य हो या साही जैसा कोई जानवर, किसी भी माता को दुख पहुँचाना उचित नहीं है।
साहूकार की पत्नी ने अनजाने में साही के बच्चे पर कुदाल चला दी थी, लेकिन उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ा। इस कथा के माध्यम से हमें सभी जीवों के प्रति दया, करुणा और संवेदनशीलता रखने की शिक्षा मिलती है।