यह लेख भगवान श्रीकृष्ण के सरल और मधुर भजनों के माध्यम से भक्ति, वैराग्य और आत्मसमर्पण का संदेश देता है। ये भजन मन को संसार की माया से हटाकर शांति, आनंद और आत्मबोध की ओर ले जाते हैं।
ये भजन आपके लिए क्यों?
भगवान श्रीकृष्ण के भजनों का जब हम श्रद्धा, भक्ति से स्मरण करते हैं, तब हमारी जीवन-यात्रा धीरे-धीरे संसार की माया से हटकर मुक्ति की ओर प्रवाहित होने लगती है। यह माया-जगत बाहर से जितना आकर्षक दिखाई देता है, भीतर से उतना ही अस्थिर और अशांत है। यहाँ मिलने वाला सुख क्षणिक होता है, जो थोड़ी देर के बाद फिर से दुःख, चिंता और खालीपन में बदल जाता है।
मनुष्य जीवबंधन में जकड़े होने के कारण इस संसार में अपने ही भीतर उठने वाले दुःख को शांत करने के लिए निरंतर कुछ न कुछ खोजता रहता है। परंतु उसे नित्य शांति और सुख कहीं नहीं उपलब्ध होता।
परंतु जो अमृत भगवान की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन होकर भक्त को उपलब्ध होता है, उसकी तुलना संसार के किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। वह आध्यात्मिक परम आनंद न तो इंद्रियों से जुड़ा होता है और न ही भौतिक साधनों पर निर्भर करता है। यह दिव्य रस हृदय में स्वयं प्रकट होता है, जब भक्त , श्रद्धा और आत्म–समर्पण के साथ हरिभजन का स्मरण करता है।
यह अनुभूति किसी बाहरी उपलब्धि से नहीं मिलती। वह केवल हरि-भक्ति की गहराइयों में डूबने से ही संभव है, भजने से अहंकार गल जाता है और मन शुद्ध होकर आत्मस्वरुप प्रभु में लिन हो जाता है।
इसी उद्देश्य से आपके लिए मैंने यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के चार अत्यंत मधुर भजन प्रस्तुत किए गए हैं, ताकि आप भी इनके माध्यम से आध्यात्मिक आनंद का प्राप्त कर सकें। ये भजन सुनने में जितने सरल और मधुर हैं, उतने ही भीतर से गहरे और आध्यात्मिक बोध पूर्ण हैं। इनमें आत्मबोध, वैराग्य, प्रेम और समर्पण का संदेश सहज रूप से समाहित है।
यदि आप भजन क्यों करें और भजन के लिए आप कैसे तैयार होंगे पढ़ना चाहते हैं।
चार अत्यंत सरल बोल वाले कृष्ण-भजन,
आपके लिए ये भजन जितने सरल हैं, उतने ही मधुर, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी भी हैं। इन्हीं गुणों के कारण भक्त इन्हें सहजता से याद रख सकता है। जब कभी मन प्रभु के स्मरण की ओर आकृष्ट होगा, तब ये भजन बिना किसी प्रयास के आपके हृदय से निकलकर आपकी जिव्हा पर स्वयं आ जाएंगे।
जीवन की व्यस्तताओं, मानसिक अशांति और अंतर्मन की उलझनों के बीच ये भजन प्रभु से जुड़ने का एक सहज मार्ग बन जाते हैं। इन्हें जपने के लिए किसी विशेष विधि, नियम या समय की आवश्यकता नहीं होती। न किसी स्थान की और न किसी बाहरी साधन की। केवल श्रद्धा, और आत्म-समर्पण ही इन भजनों का वास्तविक आधार है।
1. आत्मा रामा आनंद रमना भजन के बोल
आत्मा रामा आनंद रमना
आत्मा रामा आनंद रमना
अच्युत केशव हरि नारायण
अच्युत केशव हरि नारायण
भवभय हरणा वंदित चरणा
भवभय हरणा वंदित चरणा
रघुकुलभूषण राजीवलोचन
रघुकुलभूषण राजीवलोचन
आदीनारायण अनन्तशयना
आदीनारायण अनन्तशयना
सच्चिदानन्दा सत्यनारायण
सच्चिदानन्दा त्यनारायण
अच्युत केशव हरि नारायण
अच्युत केशव हरि नारायण
आत्मा रामा आनंद रमना भजन हरि-भक्तों द्वारा सदियों से भक्ति-परंपरा में गाया जाता रहा है। यह भजन अपने भीतर भगवान के अनेक पावन नामों को समाहित किए हुए है।
इस भजन की पहली पंक्ति आत्मा रामा आनंद रमना का भाव यह है कि भगवान स्वयं आत्मस्वरूप हैं और आनंद के मूल हैं। इसके बाद अच्युत, केशव, हरि और नारायण जैसे नामों का स्मरण किया गया है, जो भगवान के गुणों का बोध कराते हैं।
इस भजन का निरंतर जाप करने से संसार के भय, जन्म-मरण का डर और मन की अशांति से भक्त ऊपर उठने लगता है, भक्त को सच्चिदानंद उपलब्ध होता है।
2. मेरे तो गिरधर गोपाल भजन के बोल
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई
छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई
संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई
अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई
अब तो बेल फैल गई, आनंद फल होई
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई
माखन जब काढ़ि लियो, छाछ पिये कोई
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरि चरणों में लिपटोई
भागवत-प्राप्ति के लिए भक्त का माया से वैराग्य होना आवश्यक है, क्योंकि संसार से लिपटा हुआ मन भगवान को नहीं भज सकता। इस भजन में यही बोध प्रकट होता है।
यह भजन भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई द्वारा गाया गया है। इसमें मीराबाई के जीवन का, त्याग, और आध्यात्मिक परिपक्वता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई का भाव यह है कि अब इस यह मन का संबंध केवल परमात्मा से जुड़ गया है। संसार के रिश्ते, मान-मर्यादा और लोक-लाज सब पीछे छूट गए हैं।
3. केशव माधव हरि हरि बोल भजन के बोल
मुकुन्द माधव गोविन्द बोल
केशव माधव हरि हरि बोल
राम राम बोल, राम राम बोल
शिव शिव बोल, शिव शिव बोल
नारायण बोल, नारायण बोल
केशव माधव हरि हरि बोल
मुकुन्द माधव गोविन्द बोल
केशव माधव हरि हरि बोल
इस भजन में भगवान के अनेक नामों का एक साथ मधुरता से जाप किया जाता है। यह भजन नाम-स्मरण की सरलता और व्यापकता को दर्शाता है। अलग-अलग नामों के माध्यम से भक्त परमतत्व परमात्मा का हृदय में आवाहन करता है,
4. नारायण भज नारायण भजन के बोल
नारायण श्री नारायण, नारायण भज नारायण
भवभय भंजन, जन मन रंजन, संकट मोचन, पाप विमोचन
हठ योगी अपनी हठ साधे, मन को मारे, तन को बांधे
हरी के मिलन की यह रीत नहीं, हरी के मिलन का एक ही साध,
नारायण श्री नारायण, नारायण भज नारायण
जीवन बलि दे कहे पुजारे, पूरण होवे आस हमारी
हिंसा से हरी दूर रहें हैं, दया अहिंसा हरि मन भावन
नारायण श्री नारायण, नारायण भज नारायण
मात पिता है नारायण, बंधू सखा है नारायण
गुरु की विद्या नारायण, योग तपस्या नारायण
नारायण श्री नारायण, नारायण भज नारायण
नारायण श्री नाथ हरे, नाथ हरे श्री नाथ हरे
नारायण श्री नारायण, नारायण श्री नारायण
नारायण श्री नारायण, नारायण भज नारायण
यह भजन भगवान श्री नारायण की महिमा, करुणा और सर्वव्यापकता को अत्यंत सरल लेकिन गहरे भाव से प्रकट करता है। इसमें भक्त को यह स्मरण कराया गया है कि संसार के भय, दुःख, पाप और संकटों से मुक्ति केवल नारायण के भजन और स्मरण से ही संभव है।
भजन के प्रारंभ में श्री नारायण को भवभय भंजन, संकट मोचन और पाप विमोचन कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि वे जन्म-मरण के भय को नष्ट करने वाले, जीवन के कष्टों को हरने वाले और पापों से मुक्त करने वाले हैं।
आगे भजन यह स्पष्ट करता है कि केवल कठोर साधनाएँ, शरीर को कष्ट देना या मन को जबरन वश में करना ही ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग नहीं है। भजन में दया और अहिंसा को ईश्वर-प्राप्ति का सच्चा साधन बताया गया है।
अंतिम चरणों में श्री नारायण को माता-पिता, बंधु-सखा, गुरु, विद्या, योग और तपस्या के रूप में स्वीकार किया गया है। इसका भाव यह है कि जीवन का प्रत्येक आधार, प्रत्येक सहारा और प्रत्येक साधना स्वयं नारायण ही हैं।
‘गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो’ – भजन के बोल
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो,
राधा रमण हरी गोविन्द बोलो।
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो,
राधा रमण हरी गोविन्द बोलो।
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो,
राधा रमण हरी गोविन्द बोलो।
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो,
राधा रमण हरी गोविन्द बोलो।
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो,
राधा रमण हरी गोविन्द बोलो।
यह भजन भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का सरल और भावपूर्ण वर्णन करता है।
“गोविन्द” और “हरी गोपाल” कहकर श्रीकृष्ण को भक्तों के रक्षक और पालनहार
के रूप में स्मरण किया गया है। “राधा रमण” का अर्थ है राधा जी के प्रिय।