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कृष्ण के भक्त “राधे राधे” मंत्र का जप क्यों करते हैं?

“राधे राधे” कृष्ण मंत्र

श्री राधा के नाम की महिमा और राधे–राधे जप के लाभ।

देवी राधा राजा वृषभानु और रानी कलावती की पुत्री हैं। उनका प्राकट्य पवित्र भूमि बरसाना में हुआ, जो सदा से दिव्य प्रेम से जुड़ा हुआ है। प्रारंभ से ही श्री राधा को केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक व्यक्तित्व नहीं माना गया, बल्कि उन्हें शुद्ध, निस्वार्थ प्रेम (प्रेम-भक्ति) का साक्षात स्वरूप माना गया है। वे सदा भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रिय हैं और दिव्य भक्ति की सर्वोच्च आदर्श हैं।

वैष्णव परंपराओं और अनेक पुराणों के अनुसार, श्री राधा भगवान कृष्ण से भिन्न नहीं हैं। उन्हें देवी लक्ष्मी का अवतार तथा स्वयं कृष्ण की आंतरिक आनंद-शक्ति (ह्लादिनी शक्ति) माना जाता है। कहा जाता है कि जब कृष्ण ने अपने ही माधुर्य और प्रेम का रसास्वादन करना चाहा, तब उन्होंने स्वयं को राधा के रूप में प्रकट किया। इस प्रकार राधा ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राधा—दो रूप, एक ही दिव्य तत्व।

इसी गूढ़ आध्यात्मिक सत्य के कारण भगवान कृष्ण के भक्त प्रेमपूर्वक “राधे–राधे” नाम का जप करते हैं। यह नाम मात्र शब्द नहीं, बल्कि एक दिव्य कंपन है जिसमें अपार आध्यात्मिक शक्ति निहित है। राधा के पवित्र नाम का जप हृदय को शुद्ध करता है, भक्ति को जाग्रत करता है और आत्मा को जीवन के परम लक्ष्य—कृष्ण-प्रेम और मुक्ति—की ओर ले जाता है।

आइए, श्री राधा के नाम की महिमा और “राधे–राधे” मंत्र के जप से मिलने वाले लाभों को विस्तार से समझें।

राधे–राधे मंत्र जप के लाभ

राधा के पवित्र नाम का जप भक्ति परंपराओं में अत्यंत मंगलकारी माना गया है। इसके लाभ आध्यात्मिक और मानसिक—दोनों स्तरों पर होते हैं और भक्त के जीवन के हर पक्ष को स्पर्श करते हैं।

1. तीव्र आध्यात्मिक उन्नति

राधे–राधे का नियमित जप आध्यात्मिक प्रगति को तीव्र करता है। आत्मा धीरे-धीरे भौतिक माया से अलग होकर दिव्य चेतना की ओर अग्रसर होती है।

2. कृष्ण चेतना की प्राप्ति

राधा के नाम के जप से स्वाभाविक रूप से कृष्ण चेतना प्राप्त होती है, क्योंकि राधा कृष्ण से अभिन्न हैं। जहाँ राधा का स्मरण होता है, वहाँ कृष्ण स्वतः प्रकट हो जाते हैं।

3. मन और भौतिक इच्छाओं पर नियंत्रण

यह मंत्र चंचल मन, भौतिक इच्छाओं, आसक्तियों और विक्षेपों पर नियंत्रण में सहायता करता है तथा आंतरिक अनुशासन और स्पष्टता प्रदान करता है।

4. माया से मुक्ति

जो भक्त सच्चे हृदय से राधे–राधे का जप करते हैं, वे माया (भ्रम) के प्रभाव से सुरक्षित रहते हैं। देह के साथ झूठी पहचान धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।

5. परम मानसिक शांति

राधा का निरंतर स्मरण हृदय को दिव्य शांति से भर देता है और चिंता, भय व अशांति को दूर करता है।

6. बुद्धि और विचारों की स्थिरता

यह मंत्र बुद्धि को स्थिर करता है और विचारों को शुद्ध करता है, जिससे भक्त सही और आध्यात्मिक रूप से अनुकूल निर्णय ले पाता है।

7. अनावश्यक विचारों का नाश

जप अवचेतन मन को शुद्ध करता है और बार-बार आने वाले नकारात्मक व अनावश्यक विचारों को दूर करता है।

8. मानसिक तनाव से मुक्ति

राधे–राधे का कंपन दिव्य औषधि के समान कार्य करता है और मानसिक तनाव, अवसाद व भावनात्मक पीड़ा को दूर करने में सहायक होता है।

9. नकारात्मक गुणों से मुक्ति

काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अहंकार और पुरानी आसक्तियाँ सच्चे जप से धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं।

10. समस्त भय का नाश

मृत्यु, हानि या अनिश्चितता का भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि भक्त में दिव्य संरक्षण पर पूर्ण विश्वास उत्पन्न हो जाता है।

11. हृदय में प्रेम-अमृत की वर्षा

हृदय प्रेम-रस, अर्थात दिव्य प्रेम के अमृत से परिपूर्ण हो जाता है।

12. परम आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति

भक्त संसारिक सुखों से परे, सर्वोच्च आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करता है।

13. देवी लक्ष्मी की कृपा

चूँकि राधा देवी लक्ष्मी का अवतार हैं, इसलिए उनके नाम का जप समृद्धि, ऐश्वर्य और दिव्य कृपा को आकर्षित करता है।

14. सफल और समृद्ध जीवन

राधा की कृपा से जीवन भौतिक और आध्यात्मिक—दोनों रूपों में संतुलित, सार्थक और समृद्ध बनता है।

15. वैकुंठ धाम की प्राप्ति

राधा के नाम के जप से भक्त अंततः भगवान कृष्ण के शाश्वत धाम वैकुंठ को प्राप्त करता है।

16. मोक्ष (उद्धार)

यह जप जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की ओर ले जाता है।

श्री राधा के नाम की महिमा

भगवान कृष्ण और देवी राधा सदा से एक ही हैं। शास्त्र बार-बार यह घोषणा करते हैं कि राधा और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। दोनों समान रूप से पूजनीय और वंदनीय हैं। भक्ति और नाम-जप राधा-कृष्ण को प्राप्त करने के सबसे सरल और शक्तिशाली साधन हैं। शुद्ध भक्ति के माध्यम से भक्त अंततः मुक्ति को प्राप्त करता है।

वेदव्यास जी का कथन:

राधा भजति तं कृष्णं स च तं च परस्परम्।

उभयोः सर्वसाम्यं च सदा सन्तो वदन्ति च॥

अर्थ: राधा कृष्ण की उपासना करती हैं, कृष्ण राधा की उपासना करते हैं, और दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। संतजन सदा कहते हैं कि वे हर दृष्टि से समान हैं।

— ब्रह्मवैवर्त पुराण, खंड 4, अध्याय 52

“रा” और “धा” अक्षरों की शक्ति

ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा नाम में छिपी दिव्य शक्ति का सुंदर वर्णन मिलता है। “रा” कृष्ण के आनंद को पूर्ण रूप से प्रस्फुटित करता है।

“धा” कृष्ण को भक्त के पीछे दिव्य प्रेम में दौड़ा देता है।

स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं कि “रा” सुनते ही वे परम भक्ति प्रदान करते हैं और “धा” सुनते ही वे राधा के प्रेम में स्वयं को भूल जाते हैं।

“रा” दान और दिव्य कृपा का प्रतीक है, जबकि “धा” मुक्ति का सूचक है। इस प्रकार राधा वह करुणामयी देवी हैं जो सहज ही मुक्ति प्रदान करती हैं।

महादेव का कथन

भगवान शिव (महादेव) माता पार्वती से कहते हैं कि कृष्ण रासलीला में राधा की प्रेममयी गतियों का स्मरण करते हैं, इसलिए उन्हें राधा कहते हैं। “रा” का जप करने से दुर्लभ मोक्ष प्राप्त होता है और “धा” का जप करने से भक्त श्रीहरि के चरणों की ओर दौड़ पड़ता है।

संतों की प्रार्थना

“सा राधेति सदा हृदि स्फुरतु मे…” संत प्रार्थना करते हैं कि दो दिव्य अक्षरों से युक्त और परम सत्य का स्वरूप राधा का पवित्र नाम सदा उनके हृदय में प्रकाशित होता रहे।

निष्कर्ष

राधा और कृष्ण सदा से एक हैं, किंतु शुद्ध प्रेम को प्रकट करने के लिए उन्होंने दो दिव्य रूप धारण किए हैं। श्री राधा के पवित्र नाम का जप भक्तों को मोक्ष, आंतरिक शांति, दिव्य प्रेम और परम आनंद प्रदान करता है। राधा के नाम की महिमा ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित अनेक शास्त्रों में गाई गई है।

सच्चे भाव से “राधे–राधे” का जप करने से जीवन सरल, आनंदमय, समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण हो जाता है।

राधे राधे 🌸

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