“श्रीमद् भगवद् गीता के आध्यात्मिक ज्ञान मानव जीवन के लिए अमूल्य धरोहर हैं। यहाँ मैंने श्रीमद् भगवद् गीता के उन अनमोल वचनों को साझा किया है जो मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान, आत्मबोध और जीवन के सत्य मार्ग का उपदेश देते हैं। ये वचन केवल पढ़ने के लिए नहीं हैं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं।”
भगवत गीता के अनमोल उद्धरण आपके लिए क्यों?
भगवद् गीता के अनमोल उद्धरण हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि श्रीमद् भगवद् गीता हमें जीवन को सही दिशा में जीने की प्रेरणा देती है। यह वह सनातन मार्ग है, जिस पर चलकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन को मानसिक विक्षिप्तता, भय, द्वंद्व और असंतोष में नहीं बिताना चाहता और जीवन के वास्तविक आनंद का अनुभव करना चाहता है, तो उसके लिए धर्मत्व अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
मानव का कल्याण धर्म के अतिरिक्त कहीं भी संभव नहीं है। इसी कारण श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षाओं को आत्मसात करना जीवन के लिए अनिवार्य बन जाता है।
भगवद् गीता विश्व के सबसे श्रेष्ठ और प्रसिद्ध आध्यात्मिक शास्त्रों में से एक है। इसी कारण अनेक दार्शनिक इसे गीतोपनिषद भी कहते हैं।
यह साक्षात् श्रीभगवान की वाणी है, जो प्रत्येक जीव के हृदय में पवित्र आत्मस्वरूप में विराजमान है। हम यहाँ पूरी गीता का वर्णन नहीं कर रहे हैं, बल्कि गीता के उन अनमोल वचनों को साझा कर रहे हैं जो स्वयं भगवान के मुख से निकले हुए हैं और जो गहन आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण हैं।

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को प्राप्त होता है। 2.22
जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार जिसने अपने सभी इंद्रियों को विषयों से हटा लिया है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। 2.28
विषयों का चिंतन करने से मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध जन्म लेता है। क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव उत्पन्न होता है, मूढ़भाव से स्मृति का भ्रम होता है, स्मृति भ्रम से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य अपने पतन को प्राप्त होता है। 2.62, 2.63
जैसे जल में चल रही नाव को तेज वायु बहा ले जाती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से जिस इंद्रिय के साथ मन रहता है, वही इंद्रिय मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है। 2.67
जैसे अनेक नदियों का जल चारों ओर से भरकर भी समुद्र को विचलित नहीं करता, वैसे ही सभी भोग स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी भी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना समा जाते हैं। वही पुरुष शांति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना करने वाला नहीं। 2.70
जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममता, अहंकार और स्पृहा से रहित होकर विचरण करता है, वही वास्तविक शांति को प्राप्त होता है। 2.71

इंद्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं, इंद्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से भी अत्यंत परे आत्मा है। 3.42
मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने स्वरूप की रचना करता हूँ। 4.6, 4.7
हे अर्जुन, मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार भजता हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। 4.11
कर्मों के फल में मेरी कोई स्पृहा नहीं है, इसलिए कर्म मुझे लिप्त नहीं करते। जो मुझे इस तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता। 4.14
जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है। 4.37

इस संसार में आध्यात्मिक ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही कुछ भी नहीं है। 4.38
हे अर्जुन, जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी के समान समझने योग्य है, क्योंकि राग-द्वेष जैसे द्वंद्वों से रहित पुरुष सहज ही संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।
जिसका मन समभाव में स्थित है, उसके द्वारा जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया जाता है, क्योंकि सत्-चित्-आनंद स्वरूप आत्मा निर्दोष और समभावयुक्त है। 5.18
जो इंद्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुष को सुखरूप प्रतीत होते हैं, फिर भी वे दुख के ही कारण हैं और अनित्य हैं। बुद्धिमान पुरुष उनमें रमण नहीं करता। 5.22
अपने द्वारा ही संसार-सागर से अपना उद्धार करो और अपने को अधोगति में न डालो, क्योंकि मनुष्य स्वयं अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। 6.5
जिस व्यक्ति ने मन और इंद्रियों सहित इस शरीर को जीत लिया है, उसके लिए वह स्वयं मित्र है, और जिसने ऐसा नहीं किया, उसके लिए वही मनुष्य अपने ही प्रति शत्रु के समान व्यवहार करता है। 6.6

योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, इसलिए हे अर्जुन, तू योगी बन। 6.46
समस्त योगियों में जो श्रद्धावान योगी मुझमें अंतःकरण से निरंतर लगे हुए मुझे भजता है, वही मुझे परमश्रेष्ठ योगी मान्य है। 6.47

हे धनंजय, मुझसे भिन्न कोई भी परम कारण नहीं है। यह संपूर्ण जगत सूत्र में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें ही गुँथा हुआ है। 7.7
यह मेरी त्रिगुणमयी दिव्य माया अत्यंत दुष्कर है, किंतु जो योगी निरंतर मुझे ही भजते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं। 7.14
नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला मेरा ज्ञानी भक्त अत्यंत उत्तम है, क्योंकि मुझे तत्व से जानने वाला ज्ञानी मुझे अत्यंत प्रिय है और वह मुझे अत्यंत प्रिय है। 7.17
मैं सभी जीवों में समभाव से व्याप्त हूँ। न कोई मेरा प्रिय है और न अप्रिय, परंतु जो भक्त प्रेमपूर्वक मुझे भजते हैं, मैं उनमें प्रत्यक्ष प्रकट होता हूँ।

हे अर्जुन, तू निश्चयपूर्वक जान ले कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। 9.31
मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही यह संपूर्ण जगत चेष्टा करता है। इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान भक्तजन मुझे निरंतर भजते हैं। 10.8
जो निरंतर मेरे ध्यान में लगे रहते हैं और श्रद्धापूर्वक मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं वह ज्ञानरूप योग प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझे ही प्राप्त होते हैं। 10.10
जो भक्त मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन और ध्यान में लगे रहते हैं तथा अतिशय श्रद्धा से मेरे सगुण स्वरूप की उपासना करते हैं, वे मुझे सभी योगियों में परमश्रेष्ठ मान्य हैं। 12.2
हे अर्जुन, जो प्रेमपूर्वक मुझमें चित्त लगाए रहते हैं, उनका मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार से उद्धार करता हूँ। 12.7
जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को प्रकृति द्वारा किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता जानता है, वही यथार्थ देखता है। 13.29
मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी परमात्मा हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ और वेदांत का कर्ता तथा वेदों का जानने वाला भी मैं ही हूँ। 15.15
दंभ, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान ये सब आसुरी संपत्ति से युक्त पुरुष के लक्षण हैं। 16.4

सर्दी-गर्मी तथा सुख-दुख देने वाले इंद्रियों और विषयों के संयोग अनित्य हैं। जो धीर पुरुष सुख और दुख को समान भाव से देखता है और जिसे ये संयोग व्याकुल नहीं करते, वही मोक्ष के योग्य होता है।
कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत बन और अकर्म में भी आसक्त मत हो।
जो पुरुष शुभ और अशुभ की प्राप्ति पर न अत्यधिक प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर मानी जाती है।