“योग चित्त वृत्ति निरोध का अर्थ है मन की चंचल और परिवर्तनशील वृत्तियों का शांत हो जाना। जब साधक विचारों से तादात्म्य छोड़कर साक्षी भाव में स्थित होता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है।”
योग चित्त वृत्ति निरोध का अर्थ
महर्षि पतंजलि के योगदर्शन का पहले अध्याय का दूसरा श्लोक “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अत्यंत संक्षिप्त होते हुए भी योग के संपूर्ण दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए है। इस श्लोक का सामान्य अर्थ यह बताया गया है कि मन की समस्त परिवर्तनशील अवस्थाओं का रुक जाना या शांत हो जाना ही योग या समाधि कहलाता है। यहां योग को किसी शारीरिक अभ्यास तक सीमित नहीं किया गया है, बल्कि उसे मन की गहराइयों से जोड़ा गया है।
महर्षि पतंजलि हमें यह समझाना चाहते हैं कि योग का वास्तविक उद्देश्य मन की चंचलता को पहचानना और उससे ऊपर उठना है। यदि कोई साधक वास्तव में गंभीर है और केवल बाहरी आडंबरों में उलझा नहीं है, तो इस सिद्धांत को आत्मसात करना उसके लिए कठिन नहीं है। इसके लिए केवल निरंतर अभ्यास और सजगता की आवश्यकता होती है।
हमारा मन स्वभाव से ही निरंतर बदलता रहता है। एक क्षण वह सुख में होता है और अगले ही क्षण दुःख में चला जाता है। मन का विषय मायाजगत है और इसी कारण मन सदैव संसार का दास बना रहता है। उसका अस्तित्व ही विषयों के साथ जुड़ने और उनसे प्रभावित होने तक सीमित रहता है। जब तक मन संसार में रमा रहता है, तब तक वह कभी स्थिर नहीं हो सकता।
क्योंकि मन कभी एक जैसा नहीं रह सकता और वह निरंतर बदलता रहता है, इसलिए उसकी वृत्तियां भी लगातार उत्पन्न होती रहती हैं। जब इन समस्त वृत्तियों को शांत कर दिया जाता है, तब मन का वह स्वरूप समाप्त हो जाता है जिसे हम सामान्यतः मन कहते हैं। इस अवस्था में मन का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रह जाता, क्योंकि उसका आधार ही वृत्तियां थीं।
इसी कारण योग को दूसरे शब्दों में माया की दासता से मुक्ति भी कहा जा सकता है। जब चित्त की वृत्तियां रुक जाती हैं, तब साधक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। उस समय वह केवल देखने वाला और जानने वाला रह जाता है। यही अवस्था मोक्ष की अवस्था कही जाती है, जहां जीवात्मा स्वयं को सीमाओं से परे अनुभव करती है।
योगाभ्यास के माध्यम से ही हम अपने वास्तविक स्वरूप को जान सकते हैं। कोई भी गैर योगी अपने सच्चे स्व को नहीं जान पाता, क्योंकि अज्ञानवश वह इन निरंतर बदलने वाली चित्त वृत्तियों को ही अपना आत्म मान लेता है। यही मूल भ्रम है। मन के भाव, विचार और प्रतिक्रियाएं आत्मा नहीं हैं, लेकिन अज्ञान के कारण व्यक्ति उन्हें ही स्वयं मान लेता है।
उदाहरण के रूप में यदि किसी गैर योगी को क्रोध आता है, तो उस समय वह क्रोध को ही अपना अस्तित्व मान लेता है। वह यह अनुभव करता है कि वही क्रोध है। इसी प्रकार वह अन्य सभी भावों को भी आत्मा समझ लेता है। वह अपने शरीर को, अपनी संपत्ति को, अपने सुख और दुःख को, मान और अपमान को भी समय समय पर अपना आत्म मानता रहता है। यही आत्म अज्ञान की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप से अनजान रहता है।
अगले श्लोक में महर्षि पतंजलि यही स्पष्ट करते हैं कि जब इन वृत्तियों का पूर्ण रूप से निरोध हो जाता है, तब जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेती है। उसी अवस्था में वह परमात्मा के स्वरूप का भी साक्षात्कार करती है। जब चेतना की अशुद्धियां नष्ट हो जाती हैं, तब साधक विशुद्ध चैतन्य में स्थित हो जाता है, जहां कोई द्वैत शेष नहीं रहता।
आगे योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने चित्त की पांच प्रकार की वृत्तियों का वर्णन किया है। ये पांच वृत्तियां हैं प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। इन्हीं वृत्तियों के कारण मन सक्रिय रहता है और संसार में उलझा रहता है।
एक एक करके इन पांचों चित्त वृत्तियों को समझना आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं की पहचान के माध्यम से उनका निरोध संभव होता है। यदि कोई साधक योगसूत्र में बताई गई इन पांच प्रकार की चित्त वृत्तियों को विस्तार से समझना चाहता है, तो उसे इनके स्वरूप और प्रभाव को गहराई से जानना होगा।
योगसूत्र में पांच तरह की चित्त वृत्तियां
प्रमाण वृत्ति वह अवस्था है जिसमें इंद्रियों और चित्त के माध्यम से हमें संसार का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। जैसे हम अपनी आंखों से देखते हैं और कहते हैं कि धरती है, आकाश है। उसी प्रकार हम ध्वनि सुनते हैं, सर्दी और गर्मी का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त अनुमान के माध्यम से भी ज्ञान होता है, जैसे किसी को रोते हुए देखकर यह मान लेना कि उसके जीवन में कोई अप्रिय घटना घटी है। आगम भी प्रमाण का ही एक रूप है, जिसमें शास्त्रों या गुरु के मुख से प्राप्त विश्वसनीय ज्ञान शामिल होता है।
विपर्यय वृत्ति मन की वह अवस्था है जिसमें वस्तुओं का सही स्वरूप नहीं दिखता। इसमें संशय और गलत धारणाएं उत्पन्न हो जाती हैं। चीजें जैसी होती हैं, वैसी प्रतीत नहीं होतीं। जैसे कोई प्रेमिका यदि प्रेमी के बात न करने पर यह मान ले कि वह किसी और से प्रेम करने लगा है। या जब माता पिता पुत्र के गलत व्यवहार पर उसे डांटते हैं और वह यह समझ बैठता है कि वे उससे प्रेम नहीं करते।
विकल्प वृत्ति में केवल कल्पनाएं होती हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। जैसे उड़ता हुआ हाथी या दो गधे जो सींगों से लड़ रहे हों। हम जानते हैं कि गधे के सींग नहीं होते, फिर भी मन ऐसी कल्पनाएं कर लेता है। जीवन में भी यह वृत्ति दिखाई देती है, जब व्यक्ति कल्पना करता है कि वह कोई गलत कार्य करेगा और उसका परिणाम अच्छा होगा।
निद्रा वृत्ति भी चित्त की ही एक अवस्था है। निद्रा में मन अज्ञान से आवृत्त हो जाता है और अंधकार में विश्राम करता है। इस समय भी चित्त सक्रिय रहता है, क्योंकि जागने पर व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसने सुखपूर्वक नींद ली।
स्मृति वृत्ति वह अवस्था है जब हम भूतकाल में घटी घटनाओं का स्मरण करते हैं। जैसे कोई व्यक्ति यह याद करता है कि वह बचपन में हिमालय गया था और वहां अत्यधिक ठंड के कारण बीमार पड़ गया था। यह स्मरण भी चित्त की ही एक क्रिया है।
चित्त वृत्ति निरोध अभ्यास कैसे करें?
क्योंकि मन का स्वभाव ही परिवर्तनशील है, इसलिए उसे जबरदस्ती शांत करना लगभग असंभव है। उसे दबाया नहीं जा सकता। मन को केवल समाप्त ही किया जा सकता है और यही इस श्लोक का वास्तविक संकेत है।
मन को समाप्त करने का अर्थ यह नहीं है कि विचार आना बंद हो जाएं, बल्कि इसका अर्थ है उनसे जुड़ना बंद कर देना। साधक को वृत्तियों के साथ तादात्म्य नहीं बनाना है, बल्कि साक्षी भाव में स्थित रहना है। जब योगी ध्यान में स्थित होकर केवल वृत्तियों को देखता है और उनमें उलझता नहीं, तब चित्त वृत्ति निरोध स्वतः घटित होता है।
कई नए साधक जल्दबाजी में मन के द्वारा ही मन को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, जो कि संभव नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो पूरे जीवन में अभ्यास के साथ विकसित होती है। यह कोई ऐसा कार्य नहीं है जो कुछ ही समय में पूर्ण हो जाए, बल्कि यह धैर्य, निरंतरता और जागरूकता की साधना है।