सच्चा प्रेम और झूठा प्रेम
By Bodhavriksha
हमने सुना है कि प्रेम एक प्यारा अनुभव है। बहुत किस्से-कहानियाँ हैं। लोग कहते हैं, जीवन में प्रेम नहीं पाया तो क्या पाया। कोई पुरुष प्रेम में होगा, कहता होगा कि मैं इस स्त्री से प्रेम करता हूँ, और स्त्री भी यही कहेगी कि मैं इस पुरुष से प्रेम करती हूँ।
प्रेम में आपने देखा होगा, स्त्री और पुरुष साथ में बातें करते हैं, बहुत लंबी-लंबी बातें करते हैं और बहुत समय एक साथ बिताते हैं। कहते हैं कि जब प्रेम होता है, तो एक पल भी उसके बिना रहा नहीं जाता जिससे प्रेम हुआ है। इसलिए वे दोनों जहाँ भी होते हैं, हमेशा साथ ही दिखाई देते हैं।
ये बातें ठीक हैं। जब कोई मन पर छा जाता है, तो हम बिल्कुल उसी ओर जाते हैं, क्योंकि मन ही तो हमारे शरीर में प्रमुख होता है। और वह व्यक्ति-विशेष, जिससे प्रेम हुआ है, पूरे मन में ऐसे समा जाता है कि बाकी बातों या लोगों के लिए जगह ही नहीं छोड़ता। मन में जगह की कमी हो जाती है। तब इंसान क्या करेगा? कुछ दूसरा बचता ही नहीं, इसलिए वह उसी के साथ रहता है।
कहते हैं, Love is Sweet Poison (प्रेम मीठा ज़हर है)। ज़हर का काम होता है इंसान को मारना, तो यह प्रेम भी इंसान को मारता है। लेकिन जब वह मर रहा होता है, तब उसे बड़ा मीठा अनुभव हो रहा होता है। वह उसके मन में इस तरह आ जाता है कि वह अपने बाकी जीवन से अलग हो जाता है। सीधा कहें तो, वह किसी काम का नहीं रहता। वह कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाता। इससे बढ़िया वह कुछ करता ही नहीं, बस उसी के ख़यालों में खोया रहता है। वे ख़याल बड़े मीठे होते हैं, लेकिन बाकी सबसे अलग कर देते हैं। प्रेम को इस अर्थ में ज़हर कहा जाता है।
प्रेम प्रकृति में पहले से फिट है
लेकिन हमारा उद्देश्य इस प्रेम को पाना नहीं है। इस प्रेम को पाने के लिए कुछ खास करना भी नहीं पड़ता। यह ऐसे ही हो जाता है, अपने-आप। इसे करना नहीं पड़ता, बनाना नहीं पड़ता। अगर आप जवान हो गए हैं, तो आपको प्रेम होगा। आज नहीं हुआ तो कल होगा, जब कोई मिलेगा।
हमें इस प्रकृति ने बनाया ही ऐसे है कि एक आयु के बाद किसी साथी की ओर आकर्षित हो जाएँ, उससे जुड़े रहें। वह जीवन में हो और उसके जीवन में मेरा भी होना चाहिए। यह आपके शरीर में पहले से ही फिट कर रखा है। और केवल आपके ही शरीर में नहीं, यहाँ दूसरे जीव भी बहुत हैं। जानवर भी प्रेम में पड़ते हैं। कुत्ता, बिल्ली, बाघ, हाथी, मगरमच्छ—इन्हें भी प्रेम होता है।
झूठा प्रेम: शरीर का प्रोग्राम
लेकिन हम इस सच्चे प्रेम पर बात करने जा रहे हैं। मैं बस आपको यह बताना चाहता हूँ कि जिसे लोग प्रेम बोलते हैं, वह क्या है? वह बस आपके शरीर में फिट किया गया एक प्रोग्राम है। जैसे आपको भूख लगती है, तो आप खाना खाते हैं; वैसे ही जब आपका शरीर संभोग के लिए तैयार हो जाता है, तो आपको प्रेम होता है।
यह प्रेम आपको जीवन की ऊँचाइयों तक नहीं ले जाएगा, न ही जीवन को सार्थक कर सकता है। यह प्रेम बस आपका घर बसा देगा। इसके परिणामस्वरूप आपको बच्चे हो जाएँगे। आपका समय इसी में लगेगा। आप अपने ही मन के, अपनी ही कामना के गुलाम हो जाएँगे। और गुलामी के रूप में आप अपने साथी के साथ इधर-उधर घूमेंगे—कभी पहाड़ों में, कभी रेगिस्तान में, या समुद्र तटों पर। वहाँ जाकर आपका कुछ खास नहीं होने वाला।
जहाँ कुछ दार्शनिकों की शिक्षाएँ चलती हैं, जहाँ विद्वान हैं जिन्होंने प्रेम के बारे में बताया है, वहाँ इस प्रेम को प्रेम नहीं कहा जाता। क्योंकि उन जगहों पर लोगों को इसे प्रेम कहने में भी शर्म आती है। वे प्रेम का इज़हार तो करते हैं, लेकिन उन्हें डर रहता है कि कहीं लोग उन पर हँसेंगे नहीं। इसलिए वे चुपचाप इसे प्रेम कहते हैं, लोगों के सामने नहीं।
भाई, अभी आप अपनी कामना, शरीर में भीतर उठ रही संभोग की उत्तेजना की तुलना संत मीराबाई, संत कबीर, संत तुकाराम और श्रीकृष्ण से कर रहे हैं, तो यह काम दुनिया से छिपकर ही करेंगे न। लेकिन कुछ बेशर्म ऐसे भी होते हैं, जो जानते हैं कि यह केवल कामुक उत्तेजना है, फिर भी ऐसा नहीं कहते। ऊपर-ऊपर से कहते हैं, “I Love You”।
संत किसे प्रेम कहते हैं?
लेकिन संत जिस प्रेम की बात करते हैं, वह तो कुछ और ही है। और आम लोग जिसे प्रेम कहते हैं, वह बिल्कुल अलग है। हम बात करेंगे कि संत किसे प्रेम कहते हैं। आपका प्रेमी होना इस बात पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता कि आपके जीवन में कोई खास व्यक्ति हो—कोई स्त्री या पुरुष।
जब प्रेम नहीं होता, तब कामना होती है। जब प्रेम नहीं होता, तब स्वामित्व होता है। जब हमें किसी से प्रेम नहीं होता, तब हम उसे अपनी इच्छाओं का गुलाम देखना चाहते हैं—वह कहाँ जाए, कहाँ न जाए, क्या करे और क्या न करे, सब हम तय करना चाहते हैं।
और जब यह सब नहीं होता, तब प्रेम होता है। प्रेम भीतर होता है, बाहर उसकी छाया होती है। और उसकी छाया भी ऐसी होती है कि वह जिस पर पड़ती है, उसके भीतर भी प्रेम को प्रकट कर देती है। वह भी वैसा ही हो जाता है, क्योंकि उसके भी पाने योग्य तो वही था।
प्रेम पाने के लिए होता है, किसी और से अपने लिए कुछ पाने के लिए नहीं। खुद प्रेमी बनने के लिए आपको प्रेमी बनना पड़ता है। और ऐसा होने के लिए, जो भीतर अप्रेमी है, उसे समाप्त करना पड़ता है।
आपको कुछ देना होगा। कुछ दो, तो अपने जीवन का जो सबसे अधिक कीमती है, उसे देने के लिए तैयार हो जाओ और इसके बदले कुछ मिले, इसकी कामना मत रखो। बस इतना कि वह उसे मिल जाए। प्रेम में जीवन देना होता है—स्वतंत्र जीवन। न कि आप सामने वाले का जीवन ही बिगाड़ दें। अपने अनुसार बनाने के लिए उसके लिए वह जीवन नर्क की तरह बन जाए।
सच्चा प्रेम: भीतर की शांति और स्वतंत्रता
वास्तव में प्रेम आपके भीतर होने वाली शांति और आध्यात्मिक आनंद होता है। तब आप प्रेम में जी रहे होते हैं। जो भी आपके संपर्क में आता है, वह इस प्रेम की छाया में होता है—चाहे वह कोई स्त्री हो, पुरुष हो या जानवर। सच्चा प्रेम किसी एक खास व्यक्ति के लिए नहीं होता, वह समान रूप से सबके लिए होता है।
क्योंकि हमने कहा, सच्चे प्रेम का अर्थ आकर्षण नहीं होता। वहाँ स्वतंत्र जीवन होता है। जहाँ आकर्षण होता है, दैहिक मोह होता है, वहाँ जीवन किसी का भी स्वतंत्र नहीं होता।
आपके साथ कोई है या आप अकेले हैं, इससे प्रेम का कोई लेना-देना नहीं। यह किसी विशेष व्यक्ति या वस्तु पर निर्भर नहीं होता कि अगर वे हैं तभी प्रेम है, नहीं तो नहीं। ऐसा नहीं होता। प्रेम अपने आप में स्वतंत्र सत्ता है।
हमने कहा, जो झूठा प्रेम होता है, उसमें पड़कर आपका कुछ नहीं हो सकता। इससे आपको कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा, बस कुछ पल का सुख मिलता है। लेकिन हम इसे भी खास नहीं कहेंगे, क्योंकि सच्चे प्रेम में सुख कुछ पल या दो पल का नहीं होता, वह हमेशा का होता है।
प्रेम में त्याग की भावना
जब प्रेम होगा, तब त्याग की भावना आएगी, न कि आकर्षण। और त्याग भी इसलिए नहीं कि घृणा होगी, बल्कि इसलिए कि उसे स्वतंत्र करना है। त्याग उसका नहीं, उसके बंधनों का त्याग। यही प्रेम है, जब आप उसके सुख के लिए उसे आज़ाद कर देते हैं।
प्रेम बहुत बड़ा त्याग है। उसकी तुलना कोई नहीं कर सकता। वह दूसरे के कल्याण के लिए सब कुछ त्यागना स्वीकार करता है। ऐसा नहीं होता कि त्याग दिया, अब तुम तुम्हारे रास्ते और मैं मेरे रास्ते। अब बस एक ही रास्ता है—मुक्ति का, परम मुक्ति का।
जो लोग केवल आकर्षण को प्रेम कहते हैं, शरीर का शरीर से आकर्षण, वह बड़ा सुहाना लगता है। क्योंकि उसमें भी एक तरह की आज़ादी होती है। लेकिन यह आज़ादी जिस बंधन से होती है, वह केवल एक भ्रम होता है कि मेरे जीवन में कोई नहीं, जबकि सबके पास कोई साथी है।
आपको जीवन में कौन चाहिए?
जिसे जीवन की कमी महसूस हो रही है, अधूरापन महसूस हो रहा है, उसके अधूरे होने का निर्णय भी आप ही ले रहे हैं। समाज के ऐसे संस्कार हुए हैं, ऐसी सीख दी गई है कि बिना किसी साथी के जीवन अधूरा है। क्या पता, जिसे आप अधूरापन कह रहे हैं, वही बस एक झूठ हो।
और ऐसा ही है। भीतर की दुनिया में जिसे हम जैसा मानते हैं, वह वैसा ही हो जाता है। और लोग इस कमी को भरने के लिए कोई साथी ले आते हैं।
बचपन से ही हमें ऐसा सिखाया गया है। इसलिए जहाँ हम दुखी होते हैं, वहाँ कारण हमारी झूठी मान्यता ही होती है। हम मानते हैं कि जीवन में प्रेम न होना जीवन की कमी है, और फिर इसे कमी के रूप में ही अनुभव करते हैं।
क्या प्रेम जीवन को बदल देता है? हाँ, बिल्कुल बदल देता है। आप अधूरे-अधूरे घूम रहे थे, अब पूरे हो गए। यह भी आपको सिखाया ही गया है कि साथी मिल गया, अब पूरे हो गए, अब आनंद है।
लेकिन यह इतना वास्तविक इसलिए लगता है, क्योंकि इसके पीछे एक दूसरी चीज़ काम करती है—आपके भीतर की संभोग की उत्तेजना। बाहर से अलग कहानी चलती है और भीतर कुछ अलग। बाहर शादी हो रही होती है, फूल खिल रहे होते हैं, संगीत, नृत्य और गान हो रहे होते हैं, और भीतर हार्मोनल गतिविधि चल रही होती है। इसलिए हमें समाज और शरीर—दोनों से एक तरह की राहत मिल जाती है।
सच्चा प्रेम आत्मा की जीत है
सच्चा प्रेम आत्मा की जीत है, जब आप अपने आप को जीत लेते हैं। आपको सामने वाले में केवल शरीर नहीं दिखाई देता। केवल किसी तरह से उसे अपना बना लेना आपका लक्ष्य नहीं होता। यह बहुत बड़े आंतरिक युद्ध का परिणाम है। पहले खुद से लड़ना पड़ता है। भीतर जो पशु है, उस पर पूरी तरह से नियंत्रण पाना पड़ता है।
जब आपको सामने वाले में मुक्ति, शांति और आनंद पाने की उम्मीद नहीं, बल्कि चेतना दिखाई देती है—क्योंकि वह चेतन है, आपको उसमें अपनी ही तरह चेतना दिखाई देती है—तब उसकी पूर्णता की कामना करना ही प्रेम है। उसका लिंग, उसका शरीर, उसकी आयु—इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह चेतन है, अर्थात वह मेरी ही तरह है।
सच्चा प्रेम बहुत विरले लोग ही पाते हैं, क्योंकि यह प्रकृति के अनुकूल नहीं होता। सच्चा प्रेम प्रकृति के उन नियमों के विरुद्ध है, जो जीवों पर लागू होते हैं। जब चेतना इन नियमों का उल्लंघन कर जाती है, इनके पार हो जाती है, तब प्रेम प्रकाशित हो उठता है।
समाज के नियम, उसकी धारणाएँ और प्रकृति के वे बंधन, जो देह के साथ मिलते हैं—जब इनके विरुद्ध विद्रोह उठता है, तब वह प्रेम का रूप ले लेता है। प्रेम बहुत जबरदस्त आंतरिक युद्ध है। इसमें खुद से ही लड़ना पड़ता है, खुद को ही तोड़ना पड़ता है, अपनी ही धारणाओं को और अपने ही अहंकार को। यह कोई करता भी नहीं, क्योंकि यह बहुत कठिन होता है। जब कामना, आसक्ति और अहंकार टूटने लगते हैं, तो लोग तिलमिला जाते हैं। सुविधा पाने के लिए वे ऐसा प्रेम करते ही नहीं, दूर भाग जाते हैं। जहाँ सुविधा है, जहाँ अपने आप से लड़ने की ज़रूरत नहीं, वहीं चले जाते हैं।
हमने कहा था कि Love is Sweet Poison, लेकिन सच्चा प्रेम Sweet Poison नहीं होता, वह अमृत का घड़ा है। उसे पी लिया, तो अमर हो गए। लेकिन उसे पीने के योग्य भी वही होता है, जिसने यह आंतरिक युद्ध जीत लिया हो।
कबीर का दोहा: सिर देने की बात
कबीर कहते हैं— “प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय॥”
अर्थात प्रेम न खेतों में उगता है और न ही बाज़ार में बिकता है। चाहे राजा हो या प्रजा, प्रेम पाने के लिए अपना सिर देना पड़ता है। सिर देने का अर्थ स्पष्ट है—जो आपके सिर, अर्थात आपके मन और मस्तिष्क में भरा पड़ा है, उसे छोड़ दो। आपके मन में केवल स्वार्थ, कामना और अहंकार भरे हैं। इनके साथ रहेंगे तो प्रेमी नहीं बनेंगे, बल्कि पशु बने रहेंगे। क्योंकि शरीर किसका होता है? पशु का। तो उसके साथ जो प्रेम होगा, वह भी पशुता वाला ही होगा।
हम इसे प्रेम ही क्यों कह रहे हैं, जबकि यह प्रेम है भी नहीं? प्रेम तो बहुत ऊँचे दर्जे की बात है। यह तो उसके आसपास भी नहीं है। लेकिन सारी दुनिया इसी को प्रेम कह रही है। यदि हम इसे केवल स्वार्थ, कामना, आकर्षण या हार्मोनल गतिविधि कहेंगे, तो लगेगा कि प्रेम की बात ही नहीं हो रही। इसलिए स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह भी उसी विषय की चर्चा है, जिसे दुनिया प्रेम कहती है, जबकि वास्तविक प्रेम इससे बिल्कुल भिन्न है।
वास्तव में चेतना की सबसे उच्चतम और सबसे शुद्ध अवस्था में जीना ही प्रेम है। जब आप प्रेम में होते हैं, तब आप मोह में नहीं होते। आप दुनिया की कामनाओं की दौड़ से अलग हो जाते हैं।
देखिए, जैसे एक दौड़ लगी हो। सब एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए जी-जान लगाकर भाग रहे हों। और प्रेमी उस सड़क के किनारे खड़ा होकर केवल देख रहा हो कि दुनिया कैसे भाग रही है। उसे दौड़ने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उसे कुछ भी नहीं चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि उसे प्रेम मिल गया, इसलिए उसे सब कुछ मिल गया। अब पाने के लिए कुछ बचा ही नहीं—न कोई व्यक्ति, न कोई वस्तु।
तो आप सोचेंगे कि यह प्रेम किससे होता है? क्योंकि हमें सिखाया गया है कि प्रेम है, तो किसी-न-किसी से ही होगा। नहीं, ऐसा आवश्यक नहीं। सच्चा प्रेम किसी विशेष व्यक्ति से हो, यह ज़रूरी नहीं। वह अपने आप में होता है। और जब होता है, तो सब पर समान रूप से बरसता है। यदि नहीं होता, तो किसी से भी नहीं होता।