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‘ओम कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने’ मंत्र सिद्ध कैसे होंगा?

मैं एक कृष्ण भक्त अनुभव करता हूँ कि ‘कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने’ मंत्र का जाप मेरे में भीतर की शांति, आत्मा से प्रेम, आनंद और मानसिक स्पष्टता लाता है। यह मंत्र मुझे संसार की व्यर्थ आसक्तियों से दूर कर, भगवान कृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण और आनंद उपलब्ध करवाता है”

 

मंत्र: ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने॥
प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥

अर्थ: कृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा, शरणागत के क्लेशों को नाश करने वाले गोविंद को बारम्बार नमन।

कृष्णभक्त ‘कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने’ का जाप क्यों करते हैं?

इस संसार में केवल भगवान कृष्ण के चरणों में मस्तक टिकाकर ही परम शांति और अपार आनंद की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। भगवान के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देने में ही जीवन का वास्तविक सार निहित है। मनुष्य बाहर की दुनिया में भटकता रहता है, जबकि जिस शांति, तृप्ति और पूर्णता की उसे खोज है, वह कहीं बाहर नहीं बल्कि भीतर ही विद्यमान है।

यह संसार माया से आच्छादित प्रतीत होता है। अधिकांश लोग इस भ्रम में जी रहे हैं कि जो उन्हें चाहिए, जो उन्हें पूर्ण करेगा, जो उनके भीतर के खालीपन को भर देगा, वह संसार से ही मिलेगा। जबकि अनुभव यह है कि संसार से जितना मिला है, उसी ने अधूरापन भी दिया है। फिर भी मन उसी दिशा में बार बार दौड़ता है, वहीं समाधान खोजता है जहाँ से समस्या उत्पन्न हुई है।

बहुत ही विरले लोग होते हैं जिन्हें भगवान कृष्ण की प्रेम भक्ति प्राप्त होती है। क्योंकि यदि इस जीवन में मनुष्य प्रेम में पूरी तरह नहीं डूबा, तो फिर उसने वास्तव में क्या पाया?

अधिकतर लोग अपने भीतर के अधूरेपन की भरपाई संसार की वस्तुओं, संबंधों, पद, प्रतिष्ठा और सुखों से करने का प्रयास करते रहते हैं। पर यह प्रयास कभी सफल नहीं होता, क्योंकि जो अधूरापन है, वह संसार ने ही दिया है। संसार स्वयं पूर्ण नहीं है, इसलिए वह पूर्णता दे भी नहीं सकता।

जब तक मन में सांसारिक विषय, वस्तुएँ और उपलब्धियाँ प्रधान बनी रहती हैं, तब तक भक्ति का उदय नहीं होता। इसलिए लोग अक्सर कहते हैं कि भक्ति में मन नहीं लगता। वास्तव में यह भक्ति की कमी नहीं, बल्कि मन की दिशा का प्रश्न है। मन संसार का दास बन चुका होता है।

जो मन संसार को भज रहा है, जो इन्द्रिय सुखों और शारीरिक अनुभवों में उलझा हुआ है, वही मन भक्तियोग को व्यर्थ समझाने लगता है। उसे भक्ति में कुछ मिलता हुआ दिखाई नहीं देता, क्योंकि वह अभी भी पाने की भाषा में सोच रहा होता है।

भक्ति, भजन, जाप और कीर्तन इसलिए नहीं होते कि हमें कुछ प्राप्त हो जाए। यह साधन इस लिए नहीं हैं कि इच्छाओं की पूर्ति हो, बल्कि इस लिए हैं कि जो हमारे भीतर बैठा हुआ है, जो स्वयं को भोक्ता मानता है, जिसे निरंतर कुछ चाहिए, वही अस्तित्व धीरे धीरे शिथिल हो जाए। जब तक यह भोक्ता भाव पूरी तरह विलीन नहीं होता, तब तक शांति संभव नहीं है।

‘कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने’ मंत्र का जाप करते हुए साधक अपने भीतर के अधूरेपन को निरंतर देखता रहता है। वह उससे भागता नहीं, न ही उसे ढकने का प्रयास करता है। वह कृष्ण का आवाहन करता है, जिससे उस अधूरेपन के विलीन होने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।

जब मनुष्य अपने मूल स्वभाव शुद्ध चैतन्य से हटकर स्वयं को केवल शरीर और शरीर से निर्मित संसार मान लेता है, तभी भीतर क्लेश उत्पन्न होते हैं। इन क्लेशों का समाधान केवल बाहरी पूजा या औपचारिक समर्पण में नहीं है, बल्कि भीतर से भगवान के चरणों में मस्तक झुकाने में है।

हमें ‘कृष्णाय वासुदेवाय’ मंत्र जाप से क्या लाभ होंगे?

इसकी आध्यात्मिक साधना से ऐसे लाभ प्राप्त होते हैं, जो हर साधक के जीवन में अत्यंत आवश्यक हैं और जो धीरे धीरे जीवन की दिशा को ही परिवर्तित कर देते हैं।

संसार से आसक्ति समाप्त होगी :

कई बार मन संसार से इस प्रकार आसक्त हो जाता है कि वहाँ से यदि दुःख भी मिल रहा हो, तब भी वह उसे स्वीकार कर लेता है। क्योंकि मन का विषय माया है और माया स्वयं दुःख का कारण होते हुए भी आकर्षक प्रतीत होती है। मंत्र जाप से यह आसक्ति धीरे धीरे शिथिल होती है। संसार वही रहता है, पर उससे चिपकाव कम होने लगता है।

जीवन को सही राह पर लाने में सहायता होगी :

संसार में अनेक ऐसे विषय हैं जो जीवन को पूरी तरह व्यर्थ और बर्बाद कर सकते हैं। इसके बाद भी मनुष्य उन्हीं की ओर खिंचता है। भगवान का स्मरण भीतर से शुद्धि लाता है। जब भीतर पवित्रता आती है, तब विवेक स्वतः जाग्रत होता है। तब साधक स्पष्ट रूप से समझने लगता है कि क्या त्यागने योग्य है और क्या ग्रहण करने योग्य नहीं है।

परम आत्म स्वरूप भगवान का साक्षात्कार :

भगवान कृष्ण कोई दूर, किसी लोक विशेष में स्थित सत्ता नहीं हैं। वे आपके ही हृदय में चैतन्य स्वरूप में विराजमान हैं। जब मन संसार से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है, तब यह अनुभूति गहरी होने लगती है। इस पूरे दृश्य संसार की तुलना भी उस चैतन्य सत्ता से नहीं की जा सकती।

नित्य आनंद :

भगवान को भजना ही वास्तविक आनंद है और संसार को भजना दुःख का कारण है। यदि नित्य आनंद की कामना है, तो साधक के लिए भगवान कृष्ण ही परम प्रिय होने चाहिए और वही जीवन का प्रथम लक्ष्य। जहाँ लक्ष्य स्पष्ट होता है, वहाँ भटकाव स्वतः समाप्त होने लगता है।

सच्चे प्रेम अमृत का स्वाद चख पाएंगे :

दुर्भाग्य से अधिकांश लोग अपने पूरे जीवन में एक बार भी सच्चे प्रेम के अमृत का स्वाद नहीं चख पाते। क्योंकि संसार में प्रेम करने योग्य बहुत कम है। भगवान कृष्ण प्रेम करने योग्य हैं, क्योंकि उन्हें केवल सच्चा प्रेम ही स्पर्श कर सकता है। वहाँ अपेक्षा नहीं, शर्त नहीं, केवल समर्पण है।

‘कृष्णाय वासुदेवाय’ मंत्र सिद्ध होने हेतु क्या तैयारी होनी चाहिए?

वास्तविक तैयारी बाहर से नहीं, भीतर से प्रारंभ होती है। जब मनुष्य स्वयं को देखने लगता है, जब यह समझ आने लगता है कि संसार के क्षणिक और व्यर्थ विषयों से जुड़कर वह बार बार दुःख पा रहा है, तभी तैयारी का वास्तविक आरंभ होता है।

जब अपने भीतर उठते काम, क्रोध, मोह, लोभ और ईर्ष्या जैसे विकार स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं, और यह अनुभव होने लगता है कि इन्हीं के कारण जीवन का सहज आनंद खो गया है, मन भारी और अशांत रहने लगा है, यही वह बिंदु है जहाँ साधक सचेत होता है।

यह आत्मनिरीक्षण दोष ढूँढना नहीं है। यह अपने सत्य को स्वीकार करना है। जैसे जैसे यह बोध गहराता है कि संसार के सहारे स्थायी शांति संभव नहीं है, वैसे वैसे भीतर से ईश्वर की ओर झुकाव उत्पन्न होता है। यही झुकाव इस मंत्र की सबसे बड़ी तैयारी है।

इन विकारों के नाश और भीतर की अशांति से मुक्त होने के लिए भगवान का स्मरण किया जाता है और ‘कृष्णाय वासुदेवाय’ मंत्र का जाप किया जाता है। यह जाप धीरे धीरे मन को संसार के बंधनों से हटाकर परमात्मा की ओर ले जाता है। इससे चित्त शुद्ध होता है, दृष्टि स्पष्ट होती है और साधक मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने लगता है।

और जिनके लिए भगवान स्वयं ही परम प्रिय हैं, जिनका हृदय स्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित रहता है, उनके लिए इस मंत्र के जाप की कोई विशेष तैयारी आवश्यक नहीं होती। उनका जीवन, उनका भाव और उनका प्रेम ही साधना बन जाता है। वे बिना किसी प्रयास के, सहज भाव से कृष्ण का स्मरण करते हैं, क्योंकि उनके लिए कृष्ण कोई साध्य नहीं, बल्कि स्वयं जीवन का केंद्र हैं।

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