क्या आप भी आत्मा को भूत या चुड़ैल मानते हैं? वेदों के सबसे बड़े सत्य के साथ हम क्या कर रहे हैं? आपके अस्तित्व का सबसे बड़ा सत्य और सत्य से संबंधित अंधविश्वास
साधकों, आप शायद जानते होंगे कि आपका भौतिक शरीर एक अस्थायी वस्त्र के समान है, जैसे भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में स्पष्ट किया है। जैसे हम रोज़ पुराने कपड़े बदलकर नए धारण करते हैं, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण कर लेती है।
लेकिन यह जानने के बावजूद कि आत्मा ही हमारा परम सत्य है, हम में से अधिकांश लोग ‘आत्मा’ के वास्तविक अर्थ से बहुत दूर भटक गए हैं। अज्ञानता ने इस पवित्र शब्द को एक ऐसे मायाजाल में फंसा दिया है, जहाँ इसका अर्थ भूत, प्रेत या चुड़ैल से जोड़ दिया गया है।
यह कितनी शर्म की बात है कि जिस राष्ट्र ने संसार को ‘आत्मा’ और ‘परमात्मा’ जैसे अमूल्य शब्द दिए सर्वोत्तम दर्शनशास्त्र दिया , आज उसी राष्ट्र में सबसे बड़े आध्यात्मिक सत्य के साथ अंधविश्वास और मनोरंजन का भद्दा मिश्रण कर दिया गया है।
जब हम भारत के बाहर देखते हैं, तो वहाँ “आत्मा” शब्द का प्रयोग इस तरह के डरावने अर्थों में नहीं होता। लेकिन अज्ञानी लोगों और फिल्मों और स्थानीय कहानियों ने ‘आत्मा’ को एक उड़ती हुई, शरीर में घुसने वाली, और भयभीत करने वाली कोई चीज बना दिया है।
यही कारण है कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सबसे पहली बात, जो एक पढ़ा-लिखा और तर्कशील इंसान के सामने आती है, वह मात्र एक ‘अंधविश्वास’ होती है।
यदि हम आत्मा को केवल एक ‘शरीर से निकलने वाली शक्ति’ या ‘भूत’ मान बैठते हैं, तो हम स्वयं ही अपनी मुक्ति, अपने परम सत्य से दूर चले जाते हैं। हमें इस भ्रम के जाल को तोड़ना होगा और ऋषियों द्वारा दिए गए आत्मा के वास्तविक अर्थ को समझना होगा।
ऋषियों ने ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ और ‘जीवात्मा’ जैसे शब्द किसी मनोरंजक कहानी के लिए नहीं दिए थे। उन्होंने ये शब्द मनुष्य को उसके मन और शरीर की सीमाओं से परे ले जाने के लिए दिए थे। लेकिन जब ये शब्द अज्ञानी लोगों के हाथों में पड़ते हैं, तो उनका मूल अर्थ पूरी तरह विकृत हो जाता है।
यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई मनोरंजन-प्रेमी व्यक्ति कहे कि “मैंने एक किताब पढ़ी”, और कोई ज्ञान-साधक कहे कि “मैंने एक किताब पढ़ी”। दोनों के शब्दों का उच्चारण एक ही है, लेकिन उनका अनुभव, उद्देश्य और परिणाम पूरी तरह भिन्न है। जैसा इंसान होता है, वैसा ही उसका संसार और उसकी समझ होती है।
आत्मा न तो शरीर के अंदर है, और न ही शरीर के बाहर: आत्मा कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो इस भौतिक संसार में किसी स्थान पर ‘पाई’ जा सके। अगर आत्मा का कोई स्थान या सीमा होती, तो वह भी इस नश्वर और सीमित संसार का ही हिस्सा होती।
आत्मा इस संसार की वस्तु नहीं है: यह पूरा संसार, यह शरीर और ये सारी इंद्रियाँ, आपके मन (Mind) का विस्तार हैं। ये मन द्वारा बनाए गए अनुभव हैं। आत्मा को ऋषियों ने ‘अचिंत्य’ (Inconceivable) कहा है – जिसका अर्थ है जिसे इस मन द्वारा निर्मित संसार की सीमाओं में सोचना या लाना असंभव है।
आप अपनी कल्पना में आत्मा की जो भी तस्वीर बनाते हैं, वह केवल आपके मन की रचना होगी, और मन द्वारा बनाई गई हर चीज़ नश्वर और झूठी होती है।
वास्तव में, आत्मा की चर्चा इसलिए की जाती है ताकि आप अपने मन के परे जा सकें, अपने अहंकार (Ego) को नष्ट कर सकें, और अपने परम सत्य के साथ एकाकार हो सकें।
हमारा मन हमारे अहंकार को केंद्र में रखकर एक संसार निर्मित करता है। यह संसार वास्तविक नहीं होता। यही कारण है कि इस संसार में किसी व्यक्ति को कभी स्थायी शांति नहीं मिलती। यहाँ केवल दुख है, और जीवन के सारे दुख केवल इस ‘अहंकार’ के कारण होते हैं।
अहंकार वह ‘पहचान’ है जो आपने स्वयं को दे रखी है। “मैं यह शरीर हूँ,” “मैं यह नाम हूँ,” “मैं इस समाज का हिस्सा हूँ,” “यह मेरा विचार है” – यही अहंता है, और यह सत्य नहीं है।
जब तक आप खुद को यह अहंकार मान बैठे हैं, तब तक आप जो वास्तविकता देख रहे हैं, वह सत्य नहीं है। जब अहंकार स्वयं ही सत्य नहीं है, तो उसके द्वारा बनाया गया यह संसार कैसे सत्य हो सकता है?
जब एक अहंकारी व्यक्ति इस संसार को देखता है, तो वह इसे ‘जैसा यह है’ वैसा नहीं देखता। वह इसे अपनी दृष्टि, अपने ‘रंग के चश्मे’ से देखता है। तब कुछ चीज़ें उसे प्रिय लगती हैं, कुछ अप्रिय। कुछ डराती हैं, कुछ ललचाती हैं।
लेकिन वास्तविकता में यहाँ केवल प्रकृति का खेल चल रहा है – आत्मा यही वह अहंकार के न होने पर जो शेष रहता है, आत्मज्ञान का अर्थ है इस झूठी ‘अहंता’ का नाश।
तुम अपने आप को जो मान रहे हो – वह अहंता है, और वह सत्य नहीं है। इसे आत्मज्ञान से नष्ट किया जा सकता है।और जो वास्तविकता अहंकार के न होने पर शेष रहती है, वही आत्मा है।
क्या आप मन में कल्पना करके आत्मा को जान सकते हैं? क्या आप अपनी इंद्रियों वाले शरीर के माध्यम से आत्मा को पा सकते हैं? नहीं!
यह पूरा अस्तित्व, जिसे आप जानते हैं, आपके मन का बनाया हुआ है।
इसमें आपने सत्य किसको मान रखा है? अपने अहंकार और देह को।
तो अगर आप इसी संरचना के भीतर आत्मा को ‘बनाने’ की कोशिश करते हैं, तो वह भी आपकी तरह एक झूठी कल्पना ही होगी।
जैसे कोई बात अगर झूठ है, तो उसका एक सत्य पहलू भी अवश्य होता है। यह अहंकार झूठ है। जो सत्य है – वही आत्मा है।
और आत्मा इस झूठ से बने, सीमित संसार में पाई नहीं जाती।
निष्कर्ष:
यदि आप वास्तव में आत्मज्ञान चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने मन में बैठी आत्मा से जुड़ी सारी कल्पनाओं और अंधविश्वासों को तोड़ दें। आत्मा कोई डरावनी, उड़ने वाली या शरीर में घुसने वाली चीज़ नहीं है।
आत्मा ही आप हैं, आपकी शुद्ध चेतना, आपका मूल स्वरूप।
जब आप अपने मन और अहंकार के बंधनों को तोड़कर, झूठी पहचान को हटाकर उस शून्य में प्रवेश करते हैं, जहाँ केवल अस्तित्व की निर्लिप्त उपस्थिति है – वही आत्मा है।
यह यात्रा किसी और लोक में जाने की नहीं है, यह भीतर जाने की है। अपने उस अहंकार-रहित स्वरूप को जानने की है जो सत्य, शांति और आनंद का स्रोत है। आत्मा को जानिए, और अपनी मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़िए।