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जाप कीर्तनभक्तियोगयोग

भगवान का भजन हम क्यों करते है?

भजन क्यों करें?

अगर हमें अभी इसी पल सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण अगर कुछ है, तो वह केवल आत्मिक शांति है। यह शांति न भविष्य की कोई वस्तु है, न किसी उपलब्धि की प्रतीक्षा करती है। आप यह सोच भी कैसे सकते हैं कि यह अहंकार, जो इस भौतिक संसार के सहारे बना है, इसको भगवान के चरणों के सिवा कहीं और ले जाकर शांति और आनंद प्राप्त कर सकते हैं। चाहे वह धन-संपत्ति की कामना हो, सांसारिक सुख-सुविधाएँ हों या फिर भोग-विलास के असंख्य साधन—इन सबका अंत केवल थकान, असंतोष और रिक्तता में ही होता है।

सारी समस्या तो इसी “मैं” और “मेरा क्या है और क्या नहीं है” के भ्रम में जीने में है। यही मूल भ्रांति मनुष्य को सत्य से दूर रखती है। ऐसे जीना वास्तव में जीवन नहीं, बल्कि एक प्रकार की चलती-फिरती मृत्यु है। यानी कि कहने को तो व्यक्ति जीवित है, सांस ले रहा है, कर्म कर रहा है, लेकिन भीतर से वह चेतना के स्तर पर मृतप्राय हो चुका है।

आजकल कुछ अलग ही तरह का भजन देखने को मिलता है, जिसमें लोग बस गाना चला देते हैं, शोर करते हैं और नाचने-डोलने लगते हैं। यह देखने में आकर्षक हो सकता है, परंतु यह भजन नहीं है। यह तो केवल बेहोशी में और गहराई से चिपके रहना है। इसमें न आत्मबोध है, न मौन, न ही अंतर्मुखी चेतना का कोई स्पर्श।

भजन बेहोशी में नाचने-डोलने का नाम नहीं है, बल्कि यह तो समस्त बेहोशियों को ठुकराकर होश में लाने वाली साधना है। अगर आप बेहोशी में जी रहे हैं, अगर आपको लगता है कि जीवन का आनंद कहीं खो गया है, तो इसका मूल कारण कोई बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि आपका अपना ही शरीर और मन है। भजन उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें इस शरीर और मन को संसार से हटाकर, उसके मूल केंद्र में, उसकी जड़ में, आत्मा में वापस लौटा दिया जाता है।

भक्ति और भजन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। ये दो शब्द हैं, परंतु भाव एक ही है। भक्ति में हम भगवत्ता का आवाहन करते हैं और इस आवाहन को हम भजन के द्वारा अभिव्यक्ति देते हैं। भजन मानो आत्मा की वह पुकार है जिसमें वह कहती है “भगवान, आप पधारिए, मैं आपके लिए व्याकुल हो उठा हूँ।”

यह विधि कोई नई नहीं है। यह अत्यंत प्राचीन, परीक्षित और प्रभावी साधना है, जिसे बड़े-बड़े नगरों से लेकर छोटे-छोटे गाँवों तक, हर युग में देखा जा सकता है। इसकी प्रभावशीलता आज भी उतनी ही है, जितनी सदियों पहले थी।

जिन्हें इस सत्य का बोध हो गया है कि वास्तविक शांति केवल भगवान के चरणों में समर्पित होने से ही मिलती है, वे भजन क्यों नहीं करेंगे? सुख और शांति किसे नहीं चाहिए? हर जीव इन्हीं की खोज में तो भटक रहा है।

परंतु विडंबना यह है कि अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता कि सुख-शांति मिलती कैसे है। घोर अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए लोग इसी संसार में शांति पाने के लिए भटकते रहते हैं। जो वस्तु भीतर है, उसे वे बाहर ढूंढते हैं। यह जीवन केवल एक बार मिला है—अब यह आपका चुनाव है कि आप इसे आत्मिक सुख-शांति के साथ जिएँ या फिर दुःखस्वरूप अहंकार को ढोते हुए अज्ञान के सहारे इधर-उधर भटकते रहें।

विचारों और कर्मों को परम चैतन्य को समर्पित कर देने का नाम ही भजन है। प्रेम की भाषा में भजन एक गीत है, एक पुकार है, एक मौन आह्वान है। यह पुकार उसके लिए है जो आपसे प्रगाढ़ प्रेम करता है, जिसने स्वयं को आपके लिए, आपके जैसा बना लिया है। और गहराई से देखें तो वह कोई दूसरा नहीं

अब उसका आवाहन करने की आवश्यकता है, क्योंकि उसके बिना हमारा कहीं भी, किसी भी स्तर पर, कोई भला नहीं हो सकता। जब आप उसे सच्चे हृदय से पुकारते हैं, तो वह परम आत्मा आपको अपना बना लेता है। इसके लिए किसी बाहरी दिखावे की नहीं, बल्कि केवल अंतर की सच्चाई की आवश्यकता होती है।

भजन कैसे करें?

भजन करना कोई सांसारिक काम करने जैसा कार्य नहीं है। सांसारिक कार्य हम इसलिए करते हैं क्योंकि उनमें हमारा कोई न कोई निजी स्वार्थ छिपा होता है। उस कार्य के केंद्र में हमारा भौतिक अस्तित्व खड़ा होता है—हमारी इच्छाएँ, हमारी अपेक्षाएँ, हमारा लाभ।

लेकिन भजन में ऐसा नहीं है। यहाँ आपको संसार से कुछ पाना नहीं है। यहाँ तो आपको किसी का हो जाना है। यहाँ स्वयं को ही परम चैतन्य रूप में समर्पित कर देना होता है। इसीलिए यह कार्य सामान्य कर्मों से बिल्कुल अलग है। या यूँ कहें कि यह सांसारिक कर्मों का पूर्णतः विपरीत मार्ग है।

अगर आपको भगवान को समर्पित होना है, तो इसके लिए भगवान के प्रति परम प्रेम होना आवश्यक है। अर्थात—सब कुछ बाद में, पूरा संसार बाद में, लेकिन सत्य पहले। और वह सत्य आत्मा है। आत्मा ही वास्तविक ईश्वर है। आत्मा और ईश्वर दो नहीं हैं—यह।

यह बात स्पष्ट रूप से समझ लीजिए कि भजन केवल गाना गाने का नाम नहीं है। यह उससे कहीं अधिक गहरा और सूक्ष्म विषय है। यहाँ आपको अपनी कला, स्वर या प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं करना है। यहाँ आपको इस योग्य बनना है कि आप भज सकें।

अगर भौतिक सुखों के लिए अंततः संसार को ही भजना है, तो ऐसा भजन केवल दिखावा है। माया-जगत से जुड़ा मन स्वयं दुख है—इसे दुख के रूप में जान लेना ही पहला बोध है। जो सुख यहाँ प्रतीत होता है, वह अंततः दुख ही बनकर सामने आता है।

किसका भजन करें?

भजन करने के लिए अपने गुरु का आश्रय लेना अत्यंत आवश्यक है। गुरु ही साक्षात परमात्मा स्वरूप होता है। वही आपको संसार-सागर से पार लगाने में समर्थ होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि श्रद्धा रखने वाले लोग अपने-अपने इष्ट का भजन करते हैं—जैसे कृष्ण, शिव, देवी आदि।

लेकिन यह भी समझ लेना चाहिए कि बहुत सारे गुरु या बहुत सारे इष्ट आवश्यक नहीं हैं। एक ही सच्चा गुरु आपको पार लगाने के लिए पर्याप्त है। अलग-अलग देवताओं या मार्गों में उलझने से बुद्धि बिखर सकती है। तब साधक केवल शास्त्र पढ़ता रह जाता है या गुरुओं के चक्कर काटता रहता है, और अपना वास्तविक लक्ष्य—आत्मबोध—छूट जाता है।

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